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रविवार, 23 जुलाई 2017

कौन उबरेगा मेरे शहर को इस श्राप से इन्तजार है आगरा को भी और मुझे भी |

कुछ लोग श्रापित होते है जैसे मैं वैसे ही लगता है की कुछ समाज ,देश और कुछ शहर भी श्रापित होते है | उसी में एक शहर है आगरा यानि मेरा शहर इतना ज्यादा श्रापित की कुछ भी कर लो इसका श्राप मिटता ही नहीं है | सालो हो गए पानी के लिए तरसते हुए ,एक अदद हवाई अड्डे के लिए तरसते ,किसी कारखाने के लिए तरसते ,तो कभी पासपोर्ट ऑफिस और कभी हाई कोर्ट के लिए लड़ते पर क्या करे श्राप आड़े आ जाता है |
वो श्राप ही शायद कारन है की आगरा के द्वारा बनाये गए सभी प्रतिनिधि को बढ़ाते और फलते फूलते जाते है पर आगरा सूखता जाता है |
श्राप जो है
कौन उबरेगा मेरे शहर को इस श्राप से
इन्तजार है आगरा को भी और मुझे भी | 

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

असंम में फिर बढ़ और लाखो लोग परेशानी में | हर वर्ष ही करेब करीब देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में आता है वो चाहे बंगला देश की नदियों के कारन हो या अपने देश की नदियों के कारन ,वो भरी बारिश के कारन हो या बांधो के पानी छोड़ने के कारन पर तबाह तो हर साल vaइ लोग होते हैं |
कितने करोड़ लोग कुछ फिन बेघर हो जाते है तो कितने बंधो ,ऊचैयियो और सड़को पर प्लास्टिक के टेंट लगाकर कर तब तक की जिंदगी गिअरते है जब तक बाढ़ ख़त्म नहीं हो जाती है | बढ़ के बाढ़ यही लोग महामारियो और बीमारियों के शिकस होते है |
कभी कोइं जाकर तो देखे की कितनी मुश्किल और तबाह जिंदगी जीती है देश की ही बड़ी आबादी और इसमें बड़ी संख्या हिन्दू की ही होती है | ये अलग बात है की बाढ ही,आगजनी हो या कोई और आपदा मरता तो देश का गरीब ही है और ये आपदाए जाति और धर्म देख कर भी नही आती पर जाती और धर्म के गौरव का एहसास कर जबी वोट मिल जाता हो और पांच साल की सरकार बन जाती हो तो उनकी समस्याओ और जिंदगी के लिये कुछ करने की जरूरत भी क्या है |
आज़ादी के इतने साल बाद भी हम इन आपदाओ से अपनी जा नता को बचाने का रास्ता नहीं तलाश कर सके है | हमें फुर्सत ही नहीं है बड़े शहरो को और संवारने से और बड़ो को बनाने तथा बचने और बढाने से |
वक्त बहुत ध्यान से देख रहा है की ये उंच नीच की खाई ,उनसे ये दोहरा व्यवहार ,सत्तावो का ये दोहरा चरित्र ,कब तक चलेगा और देश सम्पूर्ण रूप से करवट कब लेगा जब उंच नीच की खाई कुछ कम हो सके और न्याय तथा सत्ता और सम्पत्ति तथा संसधानो बटवारा समानता से होगा |
फिलहाल तो मैं उन करोडो के प्रति संवेदना उअर दुःख ही व्यक्त कर सकता हूँ |
जय हिन्द |

मंगलवार, 27 जून 2017

कल अपने मित्र प्रोफ डॉ आर सी मिश्र नयूरो सर्जन जिन्हें मैं अपने क्षेत्र का जीनियस मानता हूँ से काफी दिन बाद मिलने गया | बहुत व्यस्त रहते है वर्ना तय तो ये था की वो मेरे घर आयेंगे और कुछ लम्बी चर्चा होगी बिना बाधा के |
पर उनकी मजबूरी है की उनका असमय उनका रहा ही नहीं | अच्छा भी रहा बहुत कुछ ज्ञान मिला और कभी मन में पीड़ा आ जाती है कई तरह की तो मैं लोगो से कहता रहां हूँ की कुछ देर किसी खतरनाक बीमारी के अस्पताल में बैठ जाओ और लोगो को देखो शायद अपनी पीड़ा बहुत छोटी लगने लगेगी |
यही मेरे साथ हुआ उन दो घंटो में जब तक वो मरीज देखते रहे और मैं तरह की मर्ज और पीडाएं देखता रहा |
और
सोचता रहा की इश्वर ने खुद मनुष्य को बनाया है अपनी कारीगरी से और पैदा किया है माँ पिता को माध्यम बना कर फिर सही सलामत क्यों नहीं पैदा किया है इतनी बीमारियाँ क्यों दे दिया है इन्सान को |
या तो पैदा ही मत करो इश्वर या फिर पूर्ण स्वस्थ ,पूर्ण सुखी ,सिर्फ अच्छाइयों के साथ सब पापा और बुराइयों से दूर क्यों अनहि रखते सभी इंसानों को ? क्यों दे दिए इतनी तरह के कष्ट की कष्ट भी शायद जार जार रो पड़ता होगा देख कर |
मुझे तो कुछ ऐसा ही लगा |
और मुझे अपनी दिक्कते बहुत छोटी लगने लगी फिर कुछ समय उनके साथ चाय पर अकेले थोड़ी सी अन्य चीजो पर चर्चा हुयी |
उनकी दी गयी जानकारियां और मेरी जानकारियां तथा वर्षो से बनी मेरी धरना बिलकुल विपरीत थी |
मुझे लगता है उसके लिए उनके साथ कुछ अधिक समय बैठने की जरूरत है |
क्योकि जरूरी नहीं की जो हम जानते है वही सत्य हो और वो नहीं सत्य कुछ और है तो स्वीकार कर लेने में बुराई भी क्या है |
देखते है क्या निकलता है और क्या होता है |
पर एक सच्चाई जरूर बता दूँ की उनकी कही काफी बाते सत्य साबित हुयी है पूर्व में |
ना ना ज्योतिष नहीं ज्ञान ,अनुभव और हजारो लोगो से मिलकर प्राप्त जानकारियों के कारण और इसके लिए उन्हें सलाम |

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

बहुत चिंतित हूँ कि क्या होगा भारत के लोकतंत्र का । जिस विचारधारा का भारत की आज़ादी की लड़ाई से कोई सम्बंध नहीं , जिनकी लोकतंत्र ,इंसान की आज़ादी और संविधान में आस्था नहीं वो जुमलों और अफ़वाह के दम पर लगातार मज़बूत होते जा रहे है और दूसरी तरफ़ अन्य राजनीतिक ताकते या तो व्यक्तिगत का शिकार हो या परिवार वाद का शिकार हो और नितांत निजी स्वार्थों में लिप्त हो सीमित दायरों  में क़ैद होती जा रही है या सीमित सोच में क़ैद है या अपने इन्हीं कारणों से अयोग्यता ,अदूरदर्शिता और अल्पज्ञानता  के बोझ तले दम तोड़ रही है और भविष्य का न तो चिंतन है उनके पास न ही वैकल्पिक संघर्ष का माद्दा ही ।
राष्ट्रीय आंदोलन से निकली कांग्रेस भी पहले ही अहंकार तले छिननभिन्न होती दिख रही  है और लगातार उसके स्तम्भ गिरते जा रहे है । जबरन अयोग्य नेतृत्व को थोपने की कोशिश और नितांत असुरक्षित लोगों का उसी को सुरक्षा कवच की तरह प्रयोग आत्मघाती बनता जा रहा है । दशकों से कांग्रेसी रहे लोग उसे छोड़ते जा रहे है और उन्हें सत्ता में बैठे  लोग लोग तो लपक ले रहे है पर कांग्रेस को कोई चिंता नहीं । कश्मीर से कन्यकुमारी तक , बंगाल से लेकर पंजाब तक और सुदूर पूर्व से लेकर गुजरात तक मजबूर मजबूर कांग्रेसियों को भगाया गया है कंफ्यूसिया कांग्रेसियों द्वारा ।
ऐसा लगता है की शतरंज के खिलाड़ी की कहानी दोहरायी जा रही है कांग्रेस में भी और बाक़ी कुछ अन्य वैसे ही नेताओं के यहाँ जिनकी आत्मप्रशंसा और सनक देश के प्रति कर्तव्यों पर भारी पड़ रही है ।
कुछ दिन पहले ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने कांग्रेस छोड़ और आज पता चला की गिरधर गोमांग भी सत्ता दल में है तो मैं हिल गया । कुछ और नामो के बारे में सुन रहा हूँ ।
पूर्व में ममता बनर्जी हो या मुफ़्ती मोहम्मद सईद या शरद पवार पूरे देश में अनगिनत लोगों को कांग्रेस ने खोया जो ख़ुद को साबित कर बड़े नेता सिद्ध हुए और उनके प्रदेश में उन्हें भगाने वाले बौने साबित हुए ।
पर लगता है की किसी आत्मचिंतन की ज़रूरत हीं नहीं समझती है कांग्रेस और आज़ादी के लिए तथा उसके बाद देश के लिए क़ुरबानी देने वाले अब देश ,लोकतंत्र , संविधान और आज़ादी की क़ुरबानी करने पर उतारू है ।
यही हालत अन्य नौजवान नेताओं की भी दिख रही है जो देश के पैमाने पर खड़े हो सकते थे ख़ुद भी और खड़ा कर सकते थे विकल्प भी लेकिन अयोग्यता या हीन भावना और प्रारम्भ में ही बुराइयों का शिकार होकर एक अंधेरे रास्ते पर चल पड़े है ।
समझ नहीं आता क्या होगा मेरे देश का ? क्या इसी सब को देखने के लिए लाखों लोगों ने क़ुरबानी दिया था ?
मन बेचैन है । क्या कोई बदलाव आएगा ? क्या कोई रास्ता निकलेगा ? क्या कोई विकल्प बनेगा ? 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

बड़े भाई
हां छोटे भाई
ये क्या कर रहे हो ? काम की बाते और विकास की बाते ?
क्या छोटे क्या ये ठीक नहीं
अरे क्या गजब कर रहे हो लोग गाँव घर के बाहर और अन्दर झांक कर देख रहे है और पिचले चुनाव के वादों को भी याद कर रहे है | हम दोनों कही के नहीं रहेंगे | क्या जवाब देंगे ?
तब क्या करें भाई ?
ये फालतू की बातें छोड़ो और कुछ और सोचो जिससे लोग गाँव और पड़ोस की सड़क ,नाली ,पानी ,सफाई ,नौकरी ,महंगाई ,देश के जवानों की हत्या १५ लाख ,काला  धन , नोट्बंदी सब भूल जाये | न आप का कुछ याद रहे और न मेरा |
बही तुमने तो चिंता में डाल दिया | ये तो जनता हम दोनों को सबक सिखा देगी और कोई विकल्प ढूढ़ लेगी |
कही ऐसा न हो की बिना पैसा खर्च करने वाले निर्दलीय इम्नादार लोगो को वोट देना सीखा जाये और हम लोगो की राजशाही ख़त्म हो जाये |
हां भाई बहुत बुरा हो जायेगा |
फिर
फिर क्या
वही पुँराना शुरू करते है | जातियों में जाती और गोत्र के गौरव का भाव जगाते है |
धर्म को धर्म का डर दिखाते है | धर्मस्थलो का सवाल उठाते है | धर्म की घृणा बांटते है |
हो गया काम
लेकिन ये हथकंडे तो जनता जानती है ,कही नहीं फंसी जाल में तो फेल हो जायेगा फार्मूला
तो नया शुरू करते है
कुछ नए शब्दों निकालते है की मजबूरी हो जाये लोग उसी के इर्द गिर्द चर्चा करने को |
अच्छा क्या ?
गदहा
आतंकवादी
चोर
गुंडा
जितनी गन्दी से गन्दी बात हो सके नहीं तो भद्दी भद्दी गलिया देने लगेंगे हम दोनों जोर जोर से दोनों एक दूसरे को
और इतना शोर करेंगे और करते ही रहेंगे की जनता बस तमाशबीन हो जाये
बस
इसी में वोट का टाइम निकल जायेगा
अच्छे लोग भी इस शोर में खो जायेंगे
और हम लोगो को गलियों की पसंद और नापसंद में एक बार और जनता को लामबंद करने में कामयाब हो जायेंगे ,
हम दोनों में से ही कोई जीतेगा |
हाथ मिलाओ
हां हां हां हां हां हां हां
जनता क्या हमसे ज्यादा दिमाग रखती है
जनता कही की
अरे पूरा पांच साल बचा है ,अपराध ,नाली ,पानी सड़क ,बिजली रोजगार विकास की चर्चा के लिए ,देश की सुरक्षा ,जवानों की हत्या ,आतंकवाद ,काला धन ,नोट ,रोजगार इत्यादि
कम से कम चुनाव में तो ये बाते जनता को भूल ही जाना चाहिए
बड़े बतमीज है ये जनता के लोग की एक डेढ़ महीना ये सब भूल कर केवल हम लोगो के जुमलो और झटको को सुनना चाहिए
चुनाव ख़त्म हो जाये तो फिर अपनी बैठक और चाय की दुकान और काफी हाउस में बैठ कर ,चौपाल पर खूब चर्चा करना इन  मुद्दों की और हमें खूब गालियाँ दे देना ,
वहा सुन ही कौन रहा है | तुम ही बोल रहे हो और तुम ही सुन रहे हो
सा ;;; चुनाव में याद करने लगते है | ये भी कोई तरीका है
जहा सी तमीज नहीं है इन कीड़ो मकोडो में
जाने दो भाई नाराज मत हो | अभी तो गधो को बाप बनाने का वक्त है \
एक महीना बना लो फिर इन गधो पर राज करो
अच्छा पैग बनाओ
इस नए झकास आइडिया पर ; चियर्स .
किसी ने हमें मिलते देखा तो नहीं
या बात करते सुना तो नहीं
तो तय रहा
यहाँ से निकलते ही एक दूसरे को गन्दी से गन्दी गलिया देनी है ,बिना संकोच ,बिना लिहाज
हां हां हां हां हां हा
लोकतंत्र की जय .भीडतंत्र जिंदाबाद |
इति कथा सम्पन्नम | 

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

यदि वक्त हो तो पढ़िए ---

कृष्ण को फिर से आना ही होगा|                                                                                                                                                           आज कृष्ण को फिर से आना ही होगा| अब कब आयेंगे कृष्ण ?.वो कब मानेंगे की पाप का घड़ा भर गया ?कब मानेंगे की समाज व्यवस्था को गालियों  की संख्या सौ नही करोडो से ज्यादा हो चुकी है ?कब मानेंगे की एक द्रोपदी नही बल्कि रोज कही ना कही हजारो द्रोपदियों का चीरहरण हो रहा  है ?अब कब मानेंगे की चारो तरफ केवल पाँच  भाइयों का नही बल्कि करोडो  का अधिकार छीना जा रहा है ?केवल एक अभिमन्यू नही करोडो अभिमन्यू घेर कर धोखे से मारे जा रहे है |कब मानोगे कृष्ण की जमुना का पानी फिर जहरीला  हो गया है |तुम्हारे लोग उतने आजाद नही रहे की कही भी कुञ्ज गलियों में या उन खेतो और बागो में जब चाहे भ्रमण कर सके ,उन पेड़ो पर या उसके नीचे वैसे ही जा सके जैसें तुम्हारे साथ जाते थे  |तुम्हारी प्यारी नदी जिसके जहरीली हो जाने पर तुमने काली नाग का बध किया था ,वह और ज्यादा  जहरीली हो गयी है ,आदमी क्या पशु भी उसका पानी नही पी सकते है |तुम्हारा प्यारा दूध और मक्खन,उसमे भी लोग जहर मिलाने  लगे है |तुम तों सर्वज्ञ  हो तब तों निश्चित ही तुम्हे यह सब पता ही होगा |फिर भी संकट में घिरी द्रौपदी की तरह ही मै तुम्हे आवाज लगा रहा हूँ की अब तों आओ ना कृष्ण  |तुम सब जानते हो फिर भी आर्द्र स्वर पुकारेगा तों कुछ तों कहेगा ना ,कुछ तों शिकायत करेगा ना ,कुछ तों बताएगा ना और कुछ तों रूठेगा ना |कब आ रहे हो कृष्ण ?क्या तुम देख रहे हो उन लाखो लोगो को जो किसी भी उम्र के है ,पर तुम्हे बुलाने के लिए मीलो लम्बी परिक्रमा करते है ,कभी गोवर्धन की तों कभी वृन्दाबन और कभी बरसाने की |कुछ लोग तों पूरे ब्रज की परिक्रमा कर डालते है |ऐसे भी तों है लाखो जो तुम्हे बुलाने को जमीन पे लेटे लेटे ही पूरी परिक्रमा कर डालते है मीलो की |जो चलते है छाले तों उन सबके पैरो में भी पड़ते है ,पर कभी सोचा की वह छोटा सा बच्चा ,वह कमजोर या भारी  भरकम औरत या आदमी जो ठीक से चल भी नही पाते है ,जब जब वे लेटे लेटे ही पलटी मारते हुए तुम्हे बुलाने के लिए यह मीलो लम्बी परिक्रमा करते है तों उनका बदन कितना छिलता है और कितना दुखता है ?तुमने ही तों उस महाभारत के  मैदान में अपना विराट स्वरुप दिखया था और कही दूर आती हुई तुम्हारी आवाज ने कहा था की दुनिया में जो भी है  वह तुम हो या वह सब तुममे  ही समाहित है |सब तुम ही कर रहे हो |सब तुम ही हो तों जब इन सबके शरीर घायल होते है तों तुम भी तों घायल होते होगे |वह सारा दर्द तुम भी तों महसूस करते होगे फिर भी ???और कृष्ण  जब सब तुम्ही हो और तुम्ही करते हो तों तों यह बिलकुल अबोध बच्चो का अपहरण ,हत्या ?द्रौपदियो का केवल चीरहरण ही नही बल्कि बलात्कार ?ये सारी मिलावट ,जमाखोरी ,अन्याय ,जुल्म ,शोषण ,गैर बराबरी क्या यह सब तुम्ही करते हो ?नही तों तुम्हे अब  इन सब कृत्यों पर  क्रोध नही आता ?क्या तुम्हारा न्याय का संकल्प कुछ कमजोर हुआ है या तुमने उस युग में इतनी मेहनत कर दी की इस कलयुग में लम्बे विश्राम का फैसला कर रखा है |जरा एक बार देखो तों अपने ही विराट स्वरुप के इन हिस्सों को भी | अगर कही ऊपर रहते हो तों एक बार झांक कर देखो अगर नीचे रहते हो तों उठ कर देखो और अगर हर जगह रहते हो तों जाग कर देखो आँखें खोल कर देखो तुम्हारा भारत बिना तुम्हारे चाहे और रचे ही महाभारत में तब्दील हो चुका है |देखो हर घर  में महाभारत ,हर गाँव में महाभारत ,हर जाति  और धर्म में महाभारत |पहले एक महाभारत हुई था तों सब ख़त्म  हो गया था और युधिस्ठिर रोये थे की ऐसा राज्य लेकर क्या करूंगा ,तुम भी जरूर अन्दर अन्दर बहुत रोये होगे ,क्योकि चारो तरफ कटे फटे ,टुकड़े टुकड़े मरे और घायल तुम्ही तों पड़े थे |पर अब तुम्हारे भारत में चारो तरफ महाभारत हो रही है ,की चाहे कितने भी मर जाये पर राज हमारा हो ,चाहे कितने  भी मर जाये नकली दवाई  से लेकर तमाम तरह की चीजे खा  पी कर पर सारी दौलत हमारी हो |कितना बदल गया ना तुम्हारा भारत कृष्ण ?क्या तुम आओगे या आज के कंसो  ,आज के दुर्योधनो से तुम  भी डरने लगे हो ?कुछ तों बोलो कृष्ण !तुमने कहा था की मनुष्य केवल चोला बदलता रहता है और बदल कर फिर पृथ्वी पर जन्म लेता है |देखो जरा गौर से देखो कही तुम्हारी सबसे ज्यादा प्रिय राधा भी तों कही किसी रूप जन्म लेकर किसी मुसीबत में तों नही है ,कही उसके साथ कुछ बुरा तों नही हो रहा है |तुम्हारी जोगन मीरा ,तुम्हारा दोस्त जिसे उस युग में तुमने सब दे दिया था ,इस युग में किस हालत में है |देखो वह द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य अपनी भूमिकाये बदल तों नही चुके |अर्जुन रक्षा के स्थान पर कुछ और तों नही कर रहे ?भीम की ताकत कही लोगो की मुसीबत तों नही बन गयी है ?उस युग में जूए में सब हर जाने वाले राजपाट और पत्नी तक वो युधिस्ठिर कही तुम्हारे भारत की पीठ में छुरा तों नही घोंप रहे है ?तुम्हे तों सब याद होगा कृष्ण क्योकि जब सब तुम्ही से आते है और सब तुम्ही में विलीन हो जाते है तों तुम तों हर समय सबको देखते ही रहते होगे कृष्ण ?कुछ तों बोलो कृष्ण ,एक बार फिर वही विराट स्वरुप  दिखाओ और बताओ की अब क्या होने वाला है ?ये सब जो हो रहा है ,इसका क्या मतलब है ?व्याख्या  तों करो कृष्ण !तुम्हारा गीता का उपदेश बहुत पुराना पड़ चुका है |वह अब भारत को दिशा नही दिखा पा रहा है कृष्ण |देखो सभी तुम्हारे तुमसे रूठ जायेंगे और तुम भी कैसे हो गए हो ?उस समय तों छोटी छोटी बातो पर प्रकट हो जाते थे कही भी ,किसी की भी मदद करने को किसी को भी उबारने  को |तों अब क्या हो गया है? कोई नाराजगी है तों वह बताओ ना !देखो सब अधीर है तुम्हारे लिए की तुम कब आओगे ,कब उबारोगे भारत को इन ना ख़त्म होने वाली महाभारतो से |तब तों एक दो मौको पर ही झूठ और छल का सहारा लिया गया था ,अब तों केवल झूठ और छल से ही सब हो रहा है |ऐसा लगता है कि तुम्हारे   बारे में  नई दृष्टि से देखने तथा नए ढंग  से सोचने की जरूरत  है . क्योकि  कृष्ण तुम्हारा  मतलब तों था की  वो जो सदैव दूसरो का था ,दूसरो के लिए था .जिसकी जन्म देने वाली माँ पीछे छूट गयी  और पालने वाली बाजी मार  ले गई  ,जिसके दोस्त की चर्चा कही बहुत ज्यादा हुई  और भाई पीछे छूट गया था ,जिसकी पत्नी या पत्नियों को उनकी दोस्त राधा  से बड़ी जलन हुई थी  और हो सकता है आज भी हो रही हो ,जो एक साथ सोलह हजार को अपना लेने की क्षमता  रखता था  ,जो सत्ता को चुनौती देने की क्षमता   रखता था  और जिसने उस युग में एक युद्ध छेड़ दिया था  की जो खा नही सकता उस भगवान को क्यों खिलाते हो ,शायद सूघ भी नही सकता ,इसलिए लाओ मै खा सकता  हूँ मुझे खिलाओ और उन सब को खिलाओ जिन्हें भूख लगती है .केवल चुनौती ही नही दिया था  वरन जब मुसीबत आई थी तों सभी की रक्षा में आगे आकर खड़ा हो गया था यह तुम्ही तों थे कृष्ण  | .मै सोचता हूँ की इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिए तुमने  कैसे अपनी छोटी सी उंगली पर इतना बड़ा पहाड़ उठाया होगा ,तुम्हारी  उंगली दुखी तों जरूर होगी और शायद आज भी दुख रही है कही इसोलिये तों नही तुम नही  आ रहे हो की उंगली पर पट्टी बांध कर बैठे हो  .लेकिन ऐसा लगता है की  उस पहाड़ के उठाने से ज्यादा तुम्हारे  नाम पर किये जा रहे पापो के बोझ से तुम्हारा  सर और पूरा शरीर दुख रहा है .कितना पैदल  चले थे तुम  कृष्ण ,नाप दिया पूरब से पश्छिम तक भारत को ओर दो छोरो को जोड़ दिया ,परिचय करा दिया इतने बड़े हिस्से का एक दूसरे से.कभी सोचता हूँ की यदि जूआ नही होता रहा होता तों क्या होता ,यदि द्रौपदी की साड़ी  भरी सभा में नही खींची गई होती तों क्या होता ,इतिहास कौन सी करवट लेता.भारत ,महाभारत होता या फिर भी भारत में तब भी  महाभारत होता ,सवाल बड़ा है जवाब आसान नही है .लेकिन कृष्ण तुम  आज मंदिरों में  फूल मालाओ ,भारी भारी  कपड़ो और बड़े बड़े मुकुटों के नीचे दब कर कराह रहे हो ऐसा लगता है कभी कभी | .कृष्ण तुम्हारा मतलब ही था  बड़े दिल वाला ,दूसरो को अपनाने वाला ,हर अन्याय से संघर्ष करने वाला आज अपने अस्तित्व के लिए कही तुम्ही  जूझ रहे हो कृष्ण |तुम्हे इस  संघर्ष से निकलना ही होगा और आकर फिर से कहना ही  होगा ;रे दुर्योधन मै जाता हूँ ,तुझको संकल्प सुनाता हूँ ,याचना नही अब रण होगा .जीवन जय या की मरण होगा ;तुम्ही बताओ की   कैसे तुम्हारी  दुखती उंगली का दर्द घटे ,कैसे तुम्हारे  सर और शरीर का बोझ हटे और सम्पूर्ण कलाओं का मालिक कृष्ण ,संघर्ष और न्याय का प्रतीक कृष्ण स्वतंत्र होकर फिर हमारे  सामने हो |विराट स्वरुप दिखाता हुआ ,आज के सन्दर्भ में गीता का ज्ञान देता  हुआ ,और इस सभी  तरह की महाभारतों से निकाल कर फिर से भारत को भारत बनता हुआ |अब तों आ रहे हो ना कृष्ण ,कृष्ण तुम आओ ना ,देखो सुनो मीरा कही अब भी गा रही है  और मीरा क्या उसके स्वर में स्वर मिला कर सब गा रहे है :मेरे तों गिरधर गोपाल दूजो ना कोय :

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

ये लिखना मजबूरी हो गया

आज बहुत मजबूर होकर ये उन लोगो के लिए लिख रहा हूँ और उन बड़ी संख्या में अति उत्साही लोगो के लिए लिख रहा हूँ जिन्होंने कोई संघर्ष और तकलीफ देखा ही नहीं ।समाज के उंच नीच को झेला ही नहीं और इस तरक्की तथा वैज्ञानिक युग में पैदा होने के नाते जिनसे अपेक्षा होती है की वो जातियो को तोड़ेंगे तथा जातियो की बात करने से भी घृणा करेंगे पर जो पिछली शताब्दियों से भी ज्यादा जहरीले जातिवादी होते दिख रहे है । ऐसा लग रहा है कि कट्टरवादी आतंकवादी मुसलमानो की तरह कोई कट्टरवादी जातिवादी जेहाद छेड़ा जा रहा हो ।

हम तो बचपन से लड़ रहे थे की वंचितो को न्याय मिले पर किसी के साथ अन्याय न हो । वंचित में सभी जाति और धर्म की महिलाओ को भी शामिल किया डॉ लोहिया ने और हम लोगो से नारा लगवाया : संसोपा ने बांधी गांठ ,पिछड़े मांगे सौ में साठ : और इस साठ में सम्पूर्ण स्त्री समाज को शामिल किया गया ।

हमने सीखा की घृणा नहीं करना है किसी से पर जो आगे बढ़ गए है उनसे कहा जाय की थोडा धीरे चलो, पर पूरी तरह रुक जाने और मृतप्राय हो जाने को नहीं कहा और जो पीछे छूट गए है उन्हें रफ़्तार दिया जाये और सम्भव समानता लायी जाए ,पर समानता उन समाजो और जातियो तथा धर्मो के अंदर भी लायी जाये ।
पड़ी खड़ी लकीर को पड़ी लकीर बनाना केवल अगड़ी और वंचित जातियो के लिए नहीं सोचा गया था बल्कि वंचितो में भी सभी को और वंचित जातियो में भी सभी को सामान भाव से अवसर मिले ये चिंतन था ।ऊच नीच की खायी को कम किया जाए ये चिंतन था ।

पर घृणा किया जाए और अन्य को खत्म किया जाए या बिलकुल पीछे कर दिया जाए ये चिंतन की बुनियाद नहीं थी ।
पर अब तो दिख रहा है की सबको खत्म कर दिया जाए और हम कुछ लोग सब पा जाये ,सब कुछ पर कब्ज़ा कर ले । ये चर्चा बंद कमरो में होती रणनीति बनाने को तो भी अलग था ,खुले आम एलान देकर चट्टी चौराहे और हर सार्वजानिक फोरम पर डुगडुगी पीट कर हो रही है ।

ये तब है जब आज जो पहले दबंग थे अब डरे रहते है ,जो पहले शासक थे अब शोषण के शिकार और याचक बने है और समाज की प्रकृति पूरी तरह उलट चुकी है ।

क्या हम जैसे लोग छले गए ? क्या हमने अपने पैरो पर खुद कुल्हाड़ी दे मारी ?क्या हम सिद्धांतो की आड़ में लोगो का हथियार बन गए सिद्धांतो के ही खिलाफ नहीं बल्कि मानव जाती और सम्पूर्ण समाज के खिलाफ ? बहुत से प्रश्न यक्षप्रश्न बन कर खड़े है ।

और इस सच्चाई से भी नकारने और सिर्फ जाती के नाम पर बाकि सबसे घृणा करने की आत्मघाती कोशिश नहीं करनी चाहिए की समानता और वंचितो के लिए लड़ने वाले सभी महापुरुष अगड़े और सुविधा सम्पन्न लोग थे ,पुराने इतिहास में देखे या नए में महात्मा गांधी से लेकर  डॉ लोहिया,जयप्रकाश ,आचार्य नरेन्द्र देव राजनारायण मधु लिमये सहित सैकड़ो लोग ।इन लोगों ने समाज में चेतना फ़ैलाने के लिए और वंचितो को जगाने के लिए अपने को दाव पर लगा दिया ।
इस देश में राजनारायण जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जोतने वालो को खुद अपने खेत दे दिया और वही पहले थे जो हजारो दलितों को लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर में घुसे और उसके से संघियो ,पंडो और पुलिस ने उन्हें मिल कर पीटा था पर वो रुके नहीं और जिंदगी के अंतिम दिन तक लड़ते रहे सिद्धान्तों के लिए । पर आज उनको साल में एक माला और उनके लोगो को गाली तथा उपेक्षा ।उनके लोगो को ठोकर मारी जा रही है और उनसे घृणा करते हुए खत्म किया जा रहां है तो मानव स्वाभाव का चिंतन का भाव और आत्मरक्षा तथा स्वाभिमान की रक्षा के प्रति चैतन्य हो जाना स्वभाविक ही है और आत्मरक्षा तथा आत्मसम्मान की रक्षा का अधिकार तो सनातन काल से दिया गया है ।

खैर भारतीय समाज की बड़ी विशेषता है की जब भी किसी ने भी समाज का संतुलन बिगाड़ा और अपनी मर्यादाये पार किया या तानाशाही और अहंकार पूर्ण व्यवहार शुरू किया इस सम्पूर्ण समाज ने उसे सबक देने और किनारे लगाने का काम किया ।ये कल भी हुआ था ,ये आज भी होगा और कल भी होता रहेगा ।

शायद कुछ लोग खुले आम गालिया देना और घृणा करना बंद करे ,शायद कुछ लोग सार्वजानिक तौर पर जातिगत जेहाद छेदना बंद करे इस उम्मीद के साथ ।

या फिर मुझे भी खुलेआम गाली दें जो वो कर ही रहे है सबके साथ ।

बुधवार, 2 मार्च 2016


मैंने प्रारम्भ में जो कवितायेँ लिखी है उन्हें जला देना पड़ेगा वर्ना मुझे देशद्रोह में जेल भेज देगा संघ परिवार ।
आज़ादी और लोकतंत्र तथा शांति से जीने के लिए चाहिए आई एस और संघ मुक्त भारत ।

आज अनोखा नाटक था :सलाखों के पीछे : मेरे मित्र सुशिल सरित का लिखा हुआ । जेल में बंद कैदियों की कहानी और उनके अंदर की आवाज ,विसंगतियां भी और कानून ,न्याय तथा समाज और देश पर सवाल उठती हुयी । बिलकुल पहली बार अभिनय करने वाले कलाकार जबकि अधिकांश के साथ ऐसा लगा नहीं की पहला नाटक है ।
बल्कि उड़ीसा से आकर 20 साल के एक कैदी की भूमिका करने वाले एक वर्तमान ए आर टी ओ ने तो जब अपनी बेटी को याद करना शुरू किया तो मुझे तो इतना रुला दिया की जब मुझे नाटक के अंत में नाटक पर बोलने के लिए मुझे बुलाया गया तब तक भी मैं सम्हल नहीं पाया था ।
बहुत शानदार था नाटक और ये संदेश देता हुआ की पहली और आकस्मिक गलती पर सजा मत दो बल्कि सुधार का और नया जीवन जीने का मौका दो ।

पाकिस्तान की सीमा पर लाश पड़ी है अपने जवान की और कोई पाकिस्तान से गले मिल रहा हो और कोई पाकिस्तान पर वाद विवाद कर रहा हो ।
बड़ा गद्दार कौन ????

मोदी जी और बीजेपी के जुमलों और नारो की तरह आज का बजट भी छलावा और जुमला ही है और दिशाहीन बजट है ।
दो वर्ष से कुछ बड़े पूंजीपतियो की तिजोरी भरने वाली सरकार ने किसानो और मध्य वर्ग को जुमला देकर उस पाप से मुक्ति चाहा है ।
ये सरकार अभी तय ही नहीं कर पायी है की वह देश की अर्थ व्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहती है ।
दो साल में विदेश व्यापार करीब 18 % घट गया तो कृषि उत्पादन वृद्धि जो पिछली सरकार में 4.1% रहती थी वो 1/2 % हो गयी है और इन्ही का आर्थिक सर्वे बता रहा है की किसान की आमदनी 20 हजार रुपया प्रति वर्ष है यानी करीब 1600 रुपया महीना उसे पाँच से में दोगुना करने का वादा किया गया है पर आधा प्रतिशत वृद्धि के ये दावा केवल छलावा है ।
गामीण सड़को के लिए 4000 करोड़ रखा गया है ।इतने कम पैसे से क्या होगा ।
दूसरी तरफ शिक्षा और स्वस्थ्य इत्यादि के बजट से कटौती जारी है ।
मनरेगा इत्यादि में भी बढ़ोतरी मामूली है ।
आयकर के छूट के अपने पुराने वादे से सरकार फिर पीछे हट कर वादाखिलाफी कर गयी है ।
जो छूट स्वाभाविक तौर पर जनता को मिलनी चाहिए थी और जिन पर विपक्ष में रहने पर बीजेपी हमलावर रहती थी वो जनता को नहीं देकर भी धोखा ही दे रही है जैसे पेट्रोलियम और जिंस के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार घटने पर भी जनता को उसका लाभ नहीं दिया जा रहा है ।
ये बजट बस छलावा है ।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

क्या मिला है किसी भी देश के चरमपंथियों को आजतक कुछ बेगुनाहो की हत्या कर के और देशो को युद्धों से ही क्या हासिल।हुआ है तबाही के सिवाय ।इतिहास और अनुभव तो यही बताता है की कुछ भी हासिल नहीं हुआ है तो फिर ये सब क्यों जारी है लगातार ।
बहुत हो गया अब बंद होना चाहिए शैतानियत का ये तमाशा ,मौत का खेल और खून की ये होली ।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

भारत का लोकतंत्र सबसे असफलतम प्रधानमन्त्री के नीचे कराह रहा है |इतनी दिन में ही मोदी जी की असफलता ,अज्ञानता और हीन भावना तथा अल्पदृष्टि सामने आ चुकी है जिसे ढकने के लिए इनका थिंक टैंक और संघ मिल कर नए नए सस्ती लोकप्रियता के आयोजन कर और इवेंट मैनेजमेंट कर जनता का ध्यान इनकी असफलतावो और वादा खिलाफी से हटाना चाहते है ,,पर अगले ६ महीने में ये सभी चीजें जनता में नफ़रत पैदा करने लगेगी |
इसलिए बस जरूरी ये है की हर वक्त सिद्धांतो ,,पर खास कर ,भारत के इतिहास और अस्मिता से जोड़ कर इन्हें कठघरे में खड़ा किया जाये | तब ये बौखालायेंगे और और बड़ी गलतियाँ करेंगे तथा लोकतंत्र पर हमला करने की कोशिश करेंगे और वही अवसर लोकतान्त्रिक शक्तियों के खड़े होने का होगा |
देखे कौन कौन क्या करता है ?? ये भी मेरा राजनीती शास्त्र के विद्यार्थी के रूप में व्यक्तिगत बयांन है |
फर्जी आंकड़े और हवाबाजी तथा उसकी आड़ में मोटा घोटाला करने में प्रशासन तंत्र को महारत हासिल है ।रोज करते है और कल भी ऐसा ही कुछ करेंगे ।
इनका राज जानना है की ये हर प्रधान मंत्री ,मुख्यमंत्री और मंत्री को कब्जे में कैसे ले लेते है और फिर हारने के दिन तक नहीं निकलने देते है ।
हारने के बाद पहचांनते ही नहीं है ।
आप इनसे जायज काम भी बिना घूस दिए नहीं करवा सकते । आप दे दो तो कानून और नियम की दूसरी व्याख्या और न दो तो बिलकुल उलट व्याख्या ।
या फिर इनका बड़ा नुक्सान करने की ताकत हो आप में ।
देश की आज़ादी इन्ही के लिए आई और राजा खत्म हो गए पर लोकतन्त्र में ये नए उनसे ज्यादा आततायी और मजबूत तथा उनसे ज्यादा बुराइयो से युक्त राजा पैदा हो गए है और भारत इनके जुल्मो से और भरस्टाचार से कराहने लगा है ।
नेहरू जी ने सबसे बड़ा पाप इनको 1947 में 15 अगस्त को ज्यो का त्यों स्वीकार कर के किया था और वो आज़ादी के बाद की सबसे बड़ी भूल थी जिसका खामियाज़ा देश पता नहीं कब तक भुगतेगा ।
पता नहीं कब कोई पैदा होगा इंदिरा गांधी की तरह जिसने राजाओ की हैसियत को खत्म किया था और बो इन राजाओ को खत्म करेगा ।
राजनैतिक आकाओ की अपने प्रति हींन भावना तथा इन लोगो के प्रति कॉम्लेक्स कब ख़त्म होगा ।
#OROP जींद की सैनिको की रैली ने मोदी के पक्ष में पहला माहौल बनाया था और वहा साहेब ने वन रैंक वन पेंशन की बात कहा था और सरकार बनते ही कर देने का वादा किया था |
पर आज डेढ़ साल से अधिक हो गया और साहेब भूल ही नहीं गए बल्कि इदेश के लिए जिंदगी देने वाले लोग महीनो से जंतर मंतर पर बैठे है चाहे मौसम कैसा भी हो और सरकार के पास इनके लिए समय नहीं है |
कितना शर्मनाक है की देश के लिए ]बहादुरी से लड़ने वालो पर घूसखोर कायरो से लाठियां चलवाई गयी |
अपने सैनिको की इज्जत न करने वाली सरकार को धिक्कार है |
कुछ देश के साथ द्रोह तथा जनता के साथ वादा द्रोह करने वालो के कर्मो और संकुचित विचारो के विरोध को हिन्दू विरोध बता कर इनके कुकर्मो को ढकने की भरपूर कोशिश हो रही है |
इन मुट्ठी भर का विरोध १२०.९९ करोड़ महान हिन्दुओ का जो इनके विचारो के खिलाफ है और इंसानियत तथा हिंदुस्तानियत में में यकीन करते है उनका विरोध कैसे हो जाता है |
अब ऐसा भी मजाक मत करो भाई लोग |

सोमवार, 21 सितंबर 2015

कृपया महान नेता जी सुभाषचंद्र बोष को बदनाम मत करिये और उनको कायर तो किसी हालात में मत सिद्ध करिये ।

जो व्यक्ति इतनी बड़ी ब्रितानिया सरकार से नहीं डरा बल्कि बिना साधनो के फ़ौज खड़ी कर दी और इतने राष्ट्रों को साथ खड़ा कर लिया तथा भारत की भूमि पर झंडा फहरा दिया , जो भारतीयो के दिलो पर राज करता था ।

अगर वो जीवित होते तो छुपते नहीं बल्कि देश के किसी कोने से भी आवाज लगा देते की मैं यहाँ हूँ तो करोडो देशवासी उधर ही दौड़ पड़ते और पूरा देश उन्हें सर पर उठा लेता ।

और किस देश की आज़ादी के बाद आज़ादी के लिए लड़ने वालो को युद्ध अपराधी कह कर किसी देश को सौपा गया है कि ये मुद्दा जेरे बहस हो ।

बल्कि मेरा विश्वास है की तत्कालीन सभी नेता भी उनकी अगवानी में खड़े हो गए होते क्योकि वो आदर्शो का युग था और संघर्ष का साथ खून के रिश्तों से भी पक्का और मजबूत होता है ।

इसलिए मेरी विनती है की अपने को नेताजी का कहने वाले या उनको बिलकुल नहीं जानने वालो दोनों लोग ही मेरी जिंदगी के पहले आदर्श और नेता को बदनाम न करे और कायर सिद्ध न करे ।

देश ,समाज और जनता को इतिहास और आदिकाल के मुद्दों पर उलझा कर रखो और उन्ही पर विवाद चलाते रहो ताकि वर्तमान पर चर्चा न हो और भविष्य की चिंता न हो और आप जो चाहे निर्द्वंद करते रहे।

किसी हालात में भूख ,गरीबी ,अशिक्षा ,बेकारी और बीमारी सहित किसान ,मजदूर और बेरोजगार नौजवान पर बात न हो ।

बल्कि इनका गुस्सा न फुट पड़े इसलिए इन सभी को इतिहास में अपने अपने गौरव तलाशने को मजबूर करते रहो और आपस में बांटते रहो

पर कब तक ? कभी तो ये सभी समझ जायेंगे इस चाल को और मिलकर खड़े हो जायेंगे सरोकारों पर सरकारो को सोचने और करने के लिए ।

बुधवार, 2 सितंबर 2015

मैं वर्षो से कह रहा हूँ की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारत के संविधान को नहीं मानता तथा लोकतंत्र को नहीं मानता बल्कि हिटलर के शासन को आदर्श मान वही स्थापित करना चाहता है ।

आज फिर सिद्ध हो गया ।

वर्तमान केंद्र सरकार देश की जनता के भावनात्मक वोट से बनी है और सरकार की जवाबदेही केवल भारत और इसकी जनता के प्रति है ।

ये संघ के प्रति जवाबदेही देश का देश के स्वतन्त्रता संग्राम का जिसमे संघ ने गद्दारी किया था तथा भारत के संविधान का और भारत की महान जनता का अपमान है ।

क्या सोचता है भारत ?

कृपया संघी जवाब नहीं दे ।

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

आर एस एस पूरी तरह मौका पाते ही अपने भविष्य की रणनीति पर लग गया है ।

जहा बाकी दल कुछ लोगो या जातियो के चक्कर में पड़े है संघ लोकतंत्र के हर खम्भे में अपने लोगों को भेजने ने लगा है ।

1977 में मीडिया में अपने लोगो को घुसाया तो आज पूरा मिडिया संघी हो गया ।

राज्यपाल से कुलपति तक और शिक्षा नीति निर्धारक  से शिक्षक तक बनाया तो वहां पौधशाला तैयार हो गयी ।

सरकार बनाते ही सभी मंत्रियो को जबरन ओ एस डी से लेकर ए पी एस तक संघ के स्वयं सेवक थमा दिए गए तो इतिहास ,संस्कृति और साहित्य से लेकर शिक्षा और फ़िल्म तक संघी बैठाये जा रहे है ।

अब नयी बात पता लगी -

संघ ने कोचिंग खोल दिया है संकल्प के नाम से जहा आई ए एस से लेकर हर तरह के नौकरशाह तैयार किये जा रहे है ,जज तैयार किये जा रहे है ।

और

शारीरिक मेहनत के साथ तैयारी करवा कर संघी फ़ौज की तीनो शाखाओ और पुलिस में जहा संभव है भेजे जा रहे है ।

वाकी नेता और दल केवल देश बचाने का भाषण दे रहे है और फासीवाद अपनी जडे ज़माने में पूरी ताकत से लगा है।

मैं तो लोकतंत्र का चौकिदार हूँ इसलिए आवाज लगा दे रहा हूँ की जागते रहो ।

जागो या मत जागो आप की मर्जी ।

बुधवार, 19 अगस्त 2015

पुराने ज़माने से हमें सिखाया गया की राजनीती और शासन में लोकलाज बहुत महत्वपूर्ण है और ये भी की जनभावना का आदर किये बिना नहीं चला जा सकता ।
जनभावना वाले सवाल पर मेरा एतराज था की लीडर को लीड कर करना चाहिए और चाहे जितना नुकसान हो जाये समाज के साथ भावना में बहने लगने के स्थान पर सही स्टैंड पर कायम रहना चाहिए ।

पर लोकलाज का मैं समर्थक हूँ ।

लेकिन बहुत अफ़सोस के साथ लिख रहा हूँ की बहुत से बड़े लोगो ने ही लोकलाज को ताक पर रख देने का जैसे बीड़ा ही उठा लिया है और वो समझ ही नहीं रहे है की आज का समाज कहा पहुँच गया है और उनका कदम और वक्तव्य आत्मघाती है ।

पर मुझे क्या । अदना सा आदमी हूँ । लिख कर कर्तव्य पूरा कर दे रहा हूँ ।

कोई खास सन्दर्भ नहीं बस यूँ ही ।

अंधभक्त कैसे भी हो राजनीतिक जातिगत धार्मिक या सामाजिक और किसी के भी हो वो लोकतन्त्र को बर्बाद करते है और विकास के रस्ते को भी अवरुद्ध करते है ।
सबकी बात कर रहा हूँ ।स्वस्थ और खुली बहस और गलत के खिलाफ जब चुनौतीपूर्ण अलीचना बंद हो जाती है तो आप जिसके भी भक्त है उसे तानाशाही पूर्ण व्यवहार करने की तरफ खुद धकेल रहे होते है ।
(आज के चिंतन से और चिंता से )

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

हमें पता है भक्त अंधे है और नहीं होते तो आज़ादी की लड़ाई के खिलाफ गद्दारी ही क्यों किया होता ।

हमें पता है की अन्धो को आईना दिखाने का कोई फायदा नहीं पर सच और इन्साफ के लिए तथा इंसानियत और हिन्दुस्तानियत बचाने के लिए, लोकतन्त्र और संविधान की रक्षा के लिए हम चीखते भी रहेंगे और व्यवस्था के मेज पर हथौड़े भी पटकते रहेंगे ।

शायद अन्धो को एहसास हो ही जाये की वो गलत है ।

सोमवार, 17 अगस्त 2015

#मोदी साहेब आप #पाकिस्तान से #युद्ध करेंगे पर #चुनाव के फायदे के लिए ठीक उसके पहले और मैं आज ही निर्णायक युद्ध चाहता हूँ ।

मेरे जवान यूँ ही खड़े खड़े शहीद हो जाये मुझे मंजूर नहीं बल्कि वो लड़ कर शहीद हो और 100 /100 को मार कर शहीद हो ये मैं भी चाहता हूँ और देश भी चाहता है ।

पर आप जवानो को खड़े खड़े मारने दोगे और चुनाव का इन्तजार करोगे मैं जानता हूँ ।

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

आर एस एस वाले डींग हांकते है की अगर वो अच्छे नहीं है तो नेहरू जी ने उन्हें 26 जनवरी में क्यों बुलाया ।

आज़ादी ली लड़ाई में गद्दारी गांधी जी की हत्या का जख्म बहुत गहरा था पर नेहरू जी प्रगतिशील डेमोक्रेट और बड़े दिल के आदमी थे ।

उन्होंने प्रयास किया की शायद संघ आज़ादी का और देश का अर्थ समझ सके और 26 जनवरी को देख कर उनका दिल बदल सके और वो अपना पुराना सोच और रास्ता छोड़ कर मुख्य धारा में शामिल हो जाये ।

पर अफ़सोस नेहरू की आत्मा आज रो रही होगी