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रविवार, 22 नवंबर 2020

पूरा भारत कभी नही लड़ा

पूरा भारत तो कभी नही लड़ा 
(एक ने और मुट्ठी भर ने ही बदला हमेशा इतिहास और हालात ) 

सैकड़ों साल पहले ही भारत में लिख दिया गया था कि ; कोउ नृप होय हमें का हानि ; । इससे भारत की मिट्टी का मूल चरित्र सिद्ध होता है ।कुछ लोग कह सकते है कि ये गोस्वामी तुलसीदास ने मुगल राज स्थापित होने के बाद लिखा था ,राम के युग मे ही सम्पूर्ण जनता किसी गलत के खिलाफ खड़ी हो गई हो ऐसा तो नही दिखा ,वो चाहे राम को राजा बनने से रोकना हो या फिर सीता की अग्नी परीक्षा या अग्नी परीक्षा के बाद भी उनका वन जाना । विस्तार मे जानाँ विवाद पैदा कर सकता है ।कृष्ण के युग मे कंस हत्याये करता जा रहा था पर कहा कोई आवाज उठी कि ये गलत है ,चाहे राजा हो या जमीदार या कोई बडा नही है उसे अधिकार इस तरह हत्याये करने का । अशोक के काल मे भी कहा जनता ने कुछ भी कहा था ,जनता तो हमेशा ताकत और सत्ता की अनुगामिनी ही बनी रही ।
वरना बस सैकड़ो की तादात में आते थे विदेशी लुटेरे और लूट कर चले जाते थे भारत को । जब कोई आता तो खेती करता किसान हल बैल लेकर किनारे खड़े होकर तमाशा देखता और बाक़ी लोग भी । लड़ता सिर्फ़ वो था जिसे लड़ने के पैसे मिलते थे और ज़्यादातर वो भी सेनापति के घायल होने या मर जाने पर भाग खड़े होते या विजेता से मिल कर उनके लिए लड़ने लगते । भारत पर आक्रमण करने वाला या राज करने वाला कोई भी बड़ी फ़ौज लेकर नहीं आया था सबकी लड़ाई  और राज भारतीय लोगों के दम पर ही चला । भारत के नागरिक पर जुल्म हो या हत्या सब यही के लोगो ने किया या तो डर कर या फिर बिक कर और विदेशियों को बुलाकर लाने वाले भी भारतीय थे , रास्ता बताने वाले या कमजोरी बताने वाले सारे विभीषण भी भारतीय थे । मैंने कई बार कहा है उदाहरण के लिए की जब सोमनाथ को लूटा जा रहा था तो वहाँ के सारे पंडे और दर्शनार्थी बैठ कर पूजा करने लगे की अभी भगवान का प्रकोप होगा और सब लुटेरे भष्म हो जाएँगे । पर वो करने के बजाय अगर उन्होंने अपने थाली लोटे से भी आक्रमण कर दिया होता तो सोमनाथ नहीं लूटा होता , भगवान की मूर्ति और मंदिर की शक्ति का भ्रम भी बना रहता और लुटेरे टुकड़ो मे मुर्दा पड़े होते  और उससे भी बड़ा काम ये हुआ होता की आइंदा कोई भी भारत पर आक्रमण करने से पहले सौ बार सोचता की भारत का या उसके किसी भी हिस्से का हर आदमी अपने राज या जमीन के लिए लड़ने को खड़ा हो जाता है  । 
आगे भी पूरा देश तो कभी खड़ा नहीं हुआ बल्कि थोड़े से लोग खड़े हुए किसी भी लड़ाई में वो अन्दोलन चाहे आज़ादी का रहा हो और चाहे आपातकाल से पहले का । जिन लोगों ने भी हिंसा का रास्ता अपनाया उनके साथ बहुत कम लोग खड़े हुए । गांधी जी इस मिट्टी की तासीर को अच्छी तरह समझ गए थे इसीलिए उन्होंने अहिंसा का रास्ता अपनाया और इस रास्ते से वो लाखों या करोड़ों जोड़ने में कामयाब हुए पर पूरे देश को नहीं जोड़ पाये वो भी ।
अंग्रेजो के समय भी पूरी जनता तो इसी कोऊ नृप वाले भाव की थी तो बहुत से लोग अंग्रेजो का साथ दे रहे थे ,बहुत से प्रशंसक थे तो हाथो मे हथियार लेकर जलियां वाला बाग से होकर पूरे देश मे गोली लाठी चलाने वाले ,आजाद को गोली मारने वाले ,भगत को फाँसी लगाने वाले और सुभाष की सेना पर गोली बरसाने वाले सब तो भारतीय ही थे केवल आदेश देने वाला अन्ग्रेज होता था और मुखबिरी कर आज़ादी के लिए लड़ने वालो की पकड्वाने वाले भी भारतीय ही थी ।सभी के खिलाफ अंग्रेजो के पक्ष मे मुकदमा लड़ने वाले भी भारतीय थे और गवाही देने वाले भी भारतीय ही थे ।
आज भी वही हालत है जो भारत की तासीर है ।बंद जगह पर छिप कर विरोध करना हो या छुपा कर बटन दबा कर सत्ता बदल देना हो बशर्ते बटन दबाने वाले हिसाब से ही परिणाम दे तो इतना तो अधिकतम भारतीय कर सकता है पर खुले मे आकर चुनौती देना भारत के आवांम की आदत नही है ।इतिहास मे भी भारत ने कभी भी किसी मजबूत को चुनौती नही दिया । ये हमारा चरित्र है गुलाम होना या गुलाम बनाना ।संमता मे हमारा विश्वास ही नही है ।कमजोर को मारना और मजबूत के सामने दुम हिलाना । 
अगर आज भी देश अपने अहित और बुरे भविष्य पर मुखर नही होता तो ये बहुत चिंता की बात नही है ।अगर आज भी सोमनाथ की तरह देश का बडा हिस्सा मन्दिर मे अपना सुख और भविष्य देख रहा है तो इसमे आश्चर्य की कोई बात नही है ।छोटे स्तर पर भी लोग कहा निकलते है बिजली या पानी नही मिलने पर ,सड़क के लिए या किसी भी बुनियादी समस्या के लिए ।पडोस पर हमला होने या बच्चा उठने या बलत्कार होने पर खिड़किया और पर्दे बंद कर जोर दे टीवी चला देने या कान मे रुई ठूस लेना ज्यादा मुनासिब लगता है । पानी नही दे सरकार तो अपना जेट पंप लगा लिया , बिजली के लिए अपने जेनरेटर लगा लिया । जितना सहनशीलता है भारत के समाज मे । पर ऐसा भी नही कि कभी नही निकलते ।जरा किसी धार्मिक स्थल को कुछ हो जाये ,किसी के चित्र या प्रतिमा से कुछ हो जाये या दो जानवरो मे से किसी का कुछ हो जाये तो निकलते है पर फिर भी मुट्ठी भर और बच बच कर कि कोई खतरा तो नही और नही है तथा सामने वाला कमजोर या कम है तो कायरता पूरी ताकत से क्रूरता दिखाती है और चीख की आवाज भी बुलंद होती है ।
दूसरी तरफ राम भी तो तीन ही थे जिसमे से एक व्यव्स्था के लिए और दो युद्द के लिए और दो साम्राज्य पराजित कर आये थे । कृष्ण ने अकेले केवल दिमाग और जुबान का इस्तेमाल कर भारत को  महाभारत तक पहुचा दिया ।बुद्ध निकले तो अकेले थे पर दुनिया के बड़े हिस्से को जोड़ लिया ।ईसा ने सूली पर लटके लटके ही दुनिया के बड़े हिस्से  को अपने सामने झुका दिया और करबला मे कहा करोडो थे पर करोडो को अपना अनुयायी बना दिया ।गांधी अफ्रीका मे भी अकेले थे और भारत भ्रमण पर भी अकेले ही निकले और ऐसा निकले कि बिना हथियार के ही इतने बड़े दुश्मन को देश से निकाल दिया ।उसके बाद भी किसी एक ने ही सत्ताए बदली है भारत की । आज फिर भारत आज़ादी बनाम गुलामी, लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद ,संविधान बनाम प्रधान की इच्छा , कानून बनाम सता की लाठी के बीच झूल रहा है ।अधिकांश कोऊ नृप होय वाले है तो बहुत से अज्ञात कारणो से प्रशंसक है तो बहुत से गली गली मे मुखबिर और बहुत से लाठी बन्दूक और कानून की किताब के साथ इनके साथ खड़े है तो बहुत से चाहे कलम से या कला से ,जुबान से या आंखो की भाषा से लडाई भी लड़ रहे है सच की ,ईमान की ,लोकतंत्र की संविधान की और अन्त मे यही जीत जायेंगे सारे जुल्म के बावजूद क्योकी हमेशा ही ये मुट्ठी भर लोग ही जीते है ।
इतिहास तो यही बताता है । बस देखना इतना है की वो एक कौन होगा इस युद्ध का नायक और क्या कोई  सम्पूर्ण भारत को कभी निकाल सकेगा चाहे जिसके खिलाफ चाहे जब और चाहे जो भी गलत हो ? क्या कोई बदल पायेगा ये आवाज "कोऊ नृप होंय हमे का हानी "से "को नृप होय ये हम ही जानी" मे ।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

#जिंदगी के झरोके से ,राजेन्द्र शर्मा और शकील

जिंदगी_के_झरोखे_से

#दो_घटनाए_जो_मेरा_अवगुण_बताती_है_और_नेता_से_दूर_करती_है

1--मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और एक सेठ के बुलावे पर आगरा आये जो मेरी निगाह मे निरर्थक और गैर राजनीतिक फैसला था ।उससे तुरंत पहले पार्टी के महानगर अध्यक्ष की मा का देहांत हो गया । अध्यक्ष मुलायम सिंह द्वारा सीधे बनाये हुये थे जिनका राजनीति से कोई सम्बंध नही था पर वो आयकर के वकील थे और है ।ना मेरा तब सम्बंध था और ना फिर कभी मुलाकात हुयी आजतक उस वकील साहब से पर मै पागल आदमी हूँ ।
मुलायम सिंह यादव उस सेठ के घर दूर गाँव के इलाके मे गये और जब किसी के घर मुख्यमंत्री आ रहा हो और वो भी सेठ तथा व्यापारी के घर तो भव्य कार्यक्रम तो होना ही था और फिर भव्य दोहन भी होना होता ही है ।
उनके कार्यक्रम मे महानगर अध्यक्ष के घर जाने का कोई कार्यक्रम नही था और उस वक्त पार्टी मे मुह लगे लोग भी इस विचार के नही थे की वो किसी के घर जाये चाहे कोई भी मर गया हो ।
पर मुझे ये बात पार्टी के सिद्धांतो और मुलायम सिंह यादव के बारे मे जो वर्षो मे हम लोगो ने इमेज बनायी थी उसके खिलाफ लग रही थी ।
लखनऊ वापस जाने के लिए मुलायम सिंह एयरपोर्ट आये उसके पहले ही मैने डी एम संजय प्रसाद से कह कर रूट साफ करवा लिया । ज्योही मुलायम सिंह जहाज की सीढ़ी की तरफ बढे मैने रोक कर अपने उद्गार व्यक्त कर दिये कि ये आप की पहचान के खिलाफ है कि आप किसी सेठ के घर आकर वापस चले जाये और पार्टी अध्यक्ष की मा का निधन हुआ है और वहा दो मिनट भी न जाये ।
तो वो थोडा झुझलाये पर विचलित भी हुये और बोले की अब देर हो गई है और जाना भी चाहे तो 2 घन्टा समय चाहिये । मैने कहा नही मुश्किल से 30 मिनट जाना आना और 5 मिनट रुकना तो बोले पूरी सड़क भरी होगी और वो आप के घर के पास ही तो रहते है कैसे पहुच जायेंगे ? तो मैने कहा की मैने पहले ही रूट लगवा दिया है ।फिर नाराज हुये की हमसे पूछे बिना कैसे करवा दिया और डी एम की तरफ देखने लगे ।संजय प्रसाद ने आंखे झुका लिया और बोले की हा सर इन्होने कहा की चल सकते है तो इन्तजाम कर दिया गया ।
और फिर वही हुआ और 40 से 45 मिनट मे अध्यक्ष की इज्जत और मन भी रह गया और मुख्यमंत्री की  इज्जत भी  रह गई ।पर मुलायम सिंह ने मुझसे कोप तो पाल ही लिया ।
2--मुलायम सिंह यादव इटावा से दिल्ली जाते हुये मेरे घर पर प्रेस से मिल कर जाने वाले थे जो अकसर होता था । एक हमारा कार्यकर्ता था शकील जो खन्दारी बूथ का मजबूत कार्यकर्ता था उसके घर मे मौत हो गई थी । वो स्कूटर मकेनिक था और पास के चौराहे पर जमीन पर ही बैठता और काम करता था । मैने उसको खबर करवा दिया कि वो अपने घर पहुच जाये और दो और उसी मुहल्ले के कार्यकर्त्ताओ को भी भेज दिया ।
जब मेरे घर से चाले तो मै गाडी मे था और मैने मुलायम सिंह जी से कहा की एक मजबूत कार्यकर्ता है उसके साथ ऐसा हो गया है और उसका घर रास्ते ने पड़ेगा । तो वो बोले की गाडी वहा तक जायेगी ।मैने कहा की थोडा सा पैदल चलना होगा पर जरूरी है ।
वहा पहुच कर हम लोग उतरे और करीब 5/ 600 मीटर पतली सी गली मे पैदल चले ।ये बस्ती बघेल मुस्लमान जिनको मैने पार्टी से जोड़ लिया था और दलितो की बस्ती है । ब्लैल कैट कमांडो और हम लोगो को देख कर पूरी बस्ती मे मिंनटों मे बात फैल गई । उस कार्यकर्ता के घर मे मुलायम सिंह को बैठाने के लिए कुछ नही था ।5 मिनट खड़े खड़े हाल चाल हुआ और जब हम लोग उसके घर से निकले तो सारी छते और पूरी गली भरी हुयी थी और अगले दिन ये किस्सा शहर भर मे चर्चा का विषय बन गया था कि मुलायम सिंह तो छोटे से छोटे कार्यकर्ता का भी ध्यान रखते है ।
समाज मे किसी को नेता बनाना और उसकी छवि बनाना आसान काम नही होता है और उसके लिए बडी सोच और बडा दिल रखना पडता है और कोपभाजन का शिकार भी होना पडता है ।
शायद इन्ही अवगुणौ के कारण बड़े नेता मुझसे नाराज ही रहते थे और कार्यकर्ता भी आप का वजन देखकर ही आप के साथ रहता है ।
पर मैं जैसा हूँ ठीक हूँ 

#जिंदगी_के_झरोखे_से#पता_नही_कितने_लोग_मरे_होते

#जिंदगी_के_झरोखे_से

#पता_नही_कितने_लोग_मरे_होते 

हमारी सरकार थी और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे ।सरकार के खिलाफ दिल्ली से गली तक विपक्ष मुखर था । कुछ मामलो को लेकर मुलायम सिंह यादव जी ने उत्तर प्रदेश बंद का आह्वान कर दिया , जिससे मैं पूरी तरह असहमत था और मैने उनसे विरोध भी व्यक्त किया कि हमारी सत्ता है प्रदेश मे और हम ही बंद काल करे इसका क्या मतलब ? अगर लोगो से लड़ना ही है तो लखनऊ या दिल्ली मे रैली के द्वारा अपना संदेश दिया जा सकता है ।मेरा एतराज इसलिए भी था की हम लोगो जैसी सभी पार्टिया प्रशिक्षित संगठन वाली नही है बल्की भीड वाली है और भीड अनियंत्रित होकर कुछ भी कर सकती है ।
मुख्यमंत्री नही माने और एलान हो गया । 
पार्टी पदाधिकारी होने के कारण मुझे उसे सफल भी करना था और दूसरी तरफ मेरी कोशिश थी की मेरे जिले तो सब शान्ती से हो जाये ।इसके लिए मैने संगठन की बैठक कर काम बाटा एक मेटाडोर पर माइक लगाकर शहर भर मे छोटी छोटी नुक्कड़ सभाए कर और व्यक्तिगत रूप से बाजार कमेटियो के लोगो से बात कर सहयोग भी मांगा । 
बंद के लिए काफी जगह बंद किया लोगो ने लेकिन आरएसएस और भाजपा के लोगो की दुकाने पूरे शहर मे खुली रही । अन्य शहरो मे तो नारा लगा था कि बंद दुकान तुम्हारी और खुली दुकान हमारी और इस नारे के साथ जो जो हुआ उससे सरकार और पार्टी बदनाम हुयी , यहा तक की इलाहबाद मे हाई कोर्ट की घटना ने हमारे चेहरे पर कालिख पोत हमे पूरे देश मे बदनाम भी किया और न्यायालय ने भी हम लोगो पर कड़ा रुख अपनाया ।
पर मेरा मानना था की अपील करना हमारा काम , अपना मुद्दा समझाना हमारा काम और साथ देना या ना देना लोगो का अधिकार है इसलिए उस दिन मैं घर पर ही बैठा था । तुलसीराम यादव सहित कुछ लोग मेरे घर पर मौजूद थे और हम लोग जगह जगह से पता लगा रहे थे की बंद कितना सफल है । पार्टी मे कुछ लोग अति उत्साही थी उनको लेकर मेरा मन शंकित था और मैने घर पर मौजूद लोगो से कहा भी मुझे लग रहा है कि आज फला फला लोग कही घायल न हो जाये अपने कारणो से ।
तब तक तो फ़ोन आया एक कार्यकर्ता का कि फला फला लोगो की भाजपा के लोगो ने बहुत पिटायी कर दिया है और वो लोग जिला अस्पताल ले जाये गये है ।
तुरंत मैने गाडी मे सभी मौजूद लोगो को बैठाया और अस्पताल पहुचा और उन लोगो से घटना की जानकारी लिया और मेरा सोचा ही सच हुआ था ,ये लोग भाजपा और आरएसएस का गढ माने जाने वाले बेलनगंज और रावतपाडा मे जबर्दस्ती दुकाने बंद कराने पहुचे थे और सत्ता के नशे मे थे ।डाक्टर लोगो से इन लोगो के समुचित इलाज की बात किया और प्रशासन से मुकदमा कायम करने के बारे मे बात किया ।
तब तक खबर आयी की पार्टी के लोग किले के पास अम्बेडकर मैदान मे एकत्र हो रहे है तो हम लोग भी उधर के लिए निकल लिए ।
वहा पहुचे तो देखा की अच्छी खासी भीड आ चुकी है और नारे लगाते लोग चले आ रहे है ।
आगरा मे जामा मस्जिद से लेकर कलक्ट्री तक घना मुस्लिम इलाका है और जामा मस्जिद के बाद पूरा हिन्दू बाजार । ताजमहल के आगे बरौली अहीर क्षेत्र पूरा यादव लोगो का है ।उधर ये खबर पहुची की सपाइयो पर हमला हो गया है तो उधर से गाँव के इलाके के लोग जिसको जो सवारी मिली उसी से चल दिया अम्बेडकर पार्क की तरफ और शहर से भी लोग वहा आने लगे । एक दिन पहले अम्बेडकर पार्क मे कोई कार्यक्रम हुआ था तो उसका पंडाल और मंच अभी मौजूद था ।
इन्दौर के पूर्व सांसद कल्याण जैन आगरा मे थे तो वो भी वहाँ पहुच गये ।मुस्लिम समाज के बहुत ही लोकप्रिय नेता हाजी इस्लाम कुरेशी आ गये । आसपास के इलाके मे भी खबर हो गई थी की सपाई इकट्ठे हो रहे है और शायद बाजारो पर हमला कर दे तो पास के बाजारो मे लोगो ने मोर्चाबंदी कर लिया था और ईंट पत्थर के साथ अन्य हथियार लेकर लोग छतो पर जम गये थे और ये बात उधर से आये हुये एक कार्यकर्ता ने मुझे कान मे बता दिया था की माहौल बहुत खराब है ।
मंच से गर्मा गर्म भाषण शुरू हो गये ।भीड जोश मे थी और अनियंत्रित होती जा रही थी तभी हाजी साहब जो सुलझे हुये इन्सांन थे पर उनको पता नही क्या सूझा की उन्होने कह दिया की चलो रावतपाडा और बेलनगंज और आज हिसाब हो ही जाये । भीड हमेशा ऐसी ही बाते पसंद करती है ,ये भीड का मनोविज्ञान होता है ।
मुझे झटका लगा और मैं मंच पर चढ़ गया और जोर से मुलायम सिंह जिन्दाबाद का नारा लगाने लगा जिसमे सारी भीड शामिल हो गई ।
फिर मैने सीधे एक सवाल किया कि क्या आप लोग मुलायम सिंह को कल्याण सिंह बनाना चाहते हो जिन्होने सर्वोच्च न्यायालय में हलफ़नामा देकर भी अयोध्या मे इमारत गिरवा दिया ? हमारी सरकार है और हम एक एक बूद खून का हिसाब करेंगे पर दंगा कर के नही कानून का इस्तेमाल कर के , और मैने थोडा लम्बा भाषण दिया ।जब समझ लिया कि अब जो चाहे करवा सकता हूँ (वैसे भी आम आदमी और आम कार्यकर्ताओ का स्नेह और सम्मान मुझे हमेशा मिला) तब मैने आह्वान कर दिया की हमारा जुलुस रावतपाडा और बेलनगंज नही बल्की कलक्ट्री जायेगा और उसका रास्ता वही तय किया जो पूरा मुस्लिम क्षेत्र मे होकर जाता था और ये भी एलान किया कि यदि 24 घंटे मे सभी हमलावर गिरफ्तार नही हुआ तो अगला जुलुस उन इलाको मे जायेगा जहा मार पीट हुयी ।
बस मैं मंच से उतरा और नारा लगाता हुआ अपने निर्धारित रास्ते पर चल दिया और पीछे पीछे पूरी भीड जिसमे कुछ लोगो ने फिर भी कोशिश किया की भीड दूसरी तरफ मुड़ जाये पर अब वो भीड मेरे असर मे थी ।इस बीच इंटेलीजेंस और पुलिस के लोग भी आ गये थे और मैने उनसे प्रशासन को खबर करवा दिया की सारी भीड आ रही है और अधिकारी वहा मौजूद रहे बात सुनने और अपनी बात कहने के लिए ।
हम लोग कलक्ट्री पहुचे वहा फिर मौने कार्यकर्ताओ के मन वाला जोशीला भाषण दिया और प्रशासन को खूब सुनाया भी ।प्रशासन ने तुरंत सख्त कार्यवाही का आश्वासन दिया तब मैने हाथ जोड़ कर सबको घर जाने और 24 घन्टा समय देने के लिए कहा और लोग शान्ती से अपने घर चले गये ।
बाद मे डी एम और एस एस पी ने मुझे धन्यवाद दिया और बताया की आज कितनी बडी घटना होने से मैने बचा लिया वर्ना पता नही कितने लोग मरते और पूरा शहर दंगे की चपेट मे आ जाता और पुलिस को भी दंगा रोकने को सब कुछ करना पडता सामने चाहे जो भी होता ।
खुद को संतुष्टी मिलती है जब आप कुछ सार्थक और अच्छा कर देते है ।
क्या पाया क्या खोया ये एक तरफ है पर आप ने क्या किया ये भाव आप को सुकून देता है ,अच्छी नीद देता और अपने ऊपर मुस्कराने की हिम्मत देता है ।

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

बचपन वाला चंदा मामा

#बचपन_वाला_चंदा_मामा

(समय हो तो जरा पढ कर कुछ लिखिए इस पर )

रात को खाना खाने के बाद टहलने निकला तो आसमान में कुछ चमकता सा दिखा , गौर से देखा कि अरे ये तो अपना बचपन का दोस्त चाँद है जिसे मैं जब गांव में रहता था तब रोज देखता था , आसमान साफ था इसलिए दिख गया चाँद वर्ना कहा दिख पाते है चाँद  सितारे शहर में।  सचमुच शहर बहुत सी चीजों को पाता है तो बहुत सी चीजों से मरहूम रह जाता है खासकर प्रकृति के साथ से। शहर में भी आ गया था तो जब तक छत वाला घर घर था या वो कालेज वाला का घर जहां गर्मियों में बाहर चारपाई बिछा कर बिना डर के सो सकते थे तब भी कई बार देखा था चाँद को ।  हा चाँद देखने को शहर वालो को किसी त्यौहार या आयोजन का इन्तजार करना होता है ,महिलाये करवा चौथ पर देख पाती है तो कुछ लोग रोजा तोड़ने के लिए तो बाकि लोग पता नहीं क्यों चंद्र ग्रहण देखने के लिए। आगरा के लोगो का तो उत्सव होता था शरद पूर्णिमा में ताजमहल जाना ।  शरद पूर्णिमा के दिन चाँद पूरा निखरा हुआ होता है जिसे कहते है फूल मून और पहले इस दिन ताजमहल रात भर खुलता था और लाखो लोग ताजमहल जाते थे और इतनी ज्यादा भीड़ होती थी की भारी पुलिस लगानी होती थी और एक तरफ से आने और दूसरी तरफ से जाने का इंतजाम करना होता था ,सीढिया छोटी पड़  जाती थी तो नए रास्ते बनाने होते थे और मचान टाइप फिर भी शरीर से शरीर टकरा कर चलते थे और कई बार तो लगता था की कही रेला लोगो को गिरा न दे वर्ना न जाने कितने लोग घायल हो जायेंगे पर अधिकतर लोग परिवार के साथ पहले ही जाकर खाना पीना साथ लेकर ताजमहल के सामने के लान में जगह घेर लेते थे क्योकि तब तक ये सब मना नहीं था और वही बैठे बैठे निहारते थे ताजमहल और चद्नी या प्रचलित नाम चमकी ।  दरअसल ताजमहल में ऊपर चारो तरफ ऐसे पत्थर लगे है जो चाँद की रौशनी पड़ने पर चमकते है या रौशनी को परवर्तित करते है और ये तो पूरी रात शेर होता था की ;वो चमकी ; ये शोर कुछ लोग तो सचमुच जो देखने गए होते थे उसके लिए करते थे पर नौजवान अक्सर क़िसी लड़की को देख कर हल्ला करते थे और कुछ हरकते भी ।  काफी लोग पुलिस का लॉकअप भी देख लेते थे इस चक्कर में । चांद का करिश्मा देखिये की दुनिया में मशहूर ताजमहल की भीड़ भी उस दिन बढ़ जाती थी जब चाँद चार चाँद लगा देता था । उस वक्त जब चांद से सामना हुआ इतने लम्बे अरसे बाद तो लगा की चाँद शिकायत कर रहा है और उसका मुँह फूला हुआ है कि तुम तो हमें भूल ही गए ।  थोड़ा शर्मिंदा तो हुआ मैं फिर खो गया उन बचपन की यादो में जब रोज ही चाँद देखता था मैं और साथ ही तारे भी।  तारो को गिनने की कोशिश करना और गिनने की दूसरो को चुनती देना और सबका ही हार जाना हमेशा ही होता था।  वो सप्त ऋषि यानि सात तारो को ढूढना भी कितन अच्छा लगता था और आश्चर्य होता था की उनका क्रम बदलता ही नहीं ,लगातार बिलकुल उसी क्रम में और वैसे ही कोण पर मौजूद है सातो ।  पुंछल तारा भी तो दिखता था कभी कभी और उसकी तरह तरह की कहानिया सुनाते थे बुजुर्ग लोग।  ये बाते तो अक्सर होती थी कि किसी की  हाल में ही मृत्यु हुयी हो तो वह उन्हें किसी नए तारे के रूप में खोजता था और बताता था अपनों को कि देखो वो है तुम्हारी नानी नाना दादा दादी या जो भी रिश्ता रहा हो।  मैंने भी जब बाबा से पुछा था की आजी कहा गयी तो वो किसी तारे को दिखा देते थे की वो है भगवांन के पास। 

चाँद भी क्या है की बचपन में माताए चंदा मांमा दूर के पुए पकाये बूर के आप खाये थाली में मुन्ने को दे प्याली में प्याली गयी रूठ मुन्ना गया रूठ गा गा कर धीरे कौर कौर ठूसते ठूसते पूरा खाना खिला देती थी बच्चे को पर बच्चे भी कहा मानने वाले थे वो मैया मोरी चंद खिलौला लैहों कहने लगते और चाँद की मांग लेते खेलने को तो बहलाना पड़ता था गरीब और भूखे बच्चे को चाँद को रोटी बता कर तो बाकी बता कर की देखो वो बुढ़िया चरखा कात रही है और कपङा बना लेगी तो तुमको देगी ,पर चंदा भी कम थोडे है तभी तो ठंढी हवा की शिकायत कर -हठ कर बैठा चांद एक दिन माता से यह बोला सिलवा दो मा मुझे ऊँन का मोटा एक झिंगोला , मांगने लगा । चांदनी रात में नौका विहार पर निबंध भी खूब लिखवाया गया तो प्रेमियों के लिए आकर्षण की चीज रहा है चाँद ,;आजा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले तो ; तो किसी को यही चाँद  दर्द भी देता रहा है ,केदार नाथ सिंह को अँधेरे  पाख  का चाँद अच्छा लगा तो त्रिलोचन ने कल्पना किया कि ;अगर चाँद मर जाता ,विजय कुमार को चाँद अघोरी लगा तो अवतार को अमावस का चाँद अच्छा लगा ,नरेश सक्सेना ने सुना की आधा चाँद मांगता है पूरी रात ;तो राजेंद्र रहबर की किसी से शिकायत थी की ईद का चाँद हो गया कोई ,वैसे इसका इस्तेमाल तो कई तरह करते रहे लोग कोई शिकायत के लिए तो कोई ताने के लिए ,गणेश पण्डे को सदेश देना था तो उन्होंने ;उस चाँद से कहना ;से भिजवा दिया संदेश ,विष्णु नगर को भी ;एक दिन चाँद ; दिखा ,राघवेंद्र अवस्थी को ;मेरे चांद पर बने बंगले पर हलचल दिखी ,ज्योति खरे कोने में बैठ गयी चाँद से बतियाने ,धर्मवीर भारती को मदभरी चांदनी अच्छा लगी ,तो जावेद अख्तर को दरिया का साहिल हो और पूरे चाँद हो और तुम आओ में कुछ कुछ हुआ ,तो कुंवर नारायण को कुछ ऐसा क्यों लगा ;रात मीठी चांदनी है मौत की चादर तनी है ,और वासना के ज्वार उठ चन्द्रमा तक खिंच रहे ,बालकवि बैरागी ने चंदा से कहा ,तू चंदा मैं चांदनी तू तरुवर मैं शाख रे ,केदार नाथ अग्रवाल को चाँद अकेला दिखा ,तो बच्चन को चांदनी फैली गगन में चाह मन में लगी ,किसी को चाँद उगने का इंतजार रहता है तो किसी को चांद तू जा में रूचि है ,बशीर बद्र का चाँद कही राहो में खो गया ,तो राकेश कौशिक को चाँद बूढ़ा लगा मुक्तिबोध को चाँद का मुँह टेढ़ा दिखा , तो दिनकर जी की रूचि चाँद के कुर्ते में भी थी , मीना कुमारी को चाँद बहुत तनहा तनहा लगा तो शकेब जलाली की शिकायत है की;गले मिला न कभी चाँद वख्त ऐसा था ,बच्चन जी ने बताया की मुझसे चाँद कहा करता था तो साहिर लुधियानवी को चाँद के मद्धम होने से शिकायत है ,किसी को गुलाबी चाँद ने याद किया तो शीन काफ को घाटी का चाँद अच्छा लगा ,शमशेर बहदुर सिंह ने चाँद से थोड़ी गप्पे मारी ,किसी को चाँद झुका दिखा तो किसी को सदियो से चांद  की पीड़ा दिखी किसी को झुरमुट में अटका चाँद दिखा तो मुक्तिबोध को इंतजार था की डूबता चाँद कब डूबेगा ,किसी को लगा कि चाँद सुरागकशी करने निकला है ,बच्चन ने आह्वान किया की चाँद सितारों मिल कर गाओ ,तो निसार अख्तर को उम्मीद है की सौ चाँद चमकेंगे।  बस चाँद एक अनबूझ पहले की तरह साहित्य के इस कलम से उस कलम तक इस पन्ने से उस पन्ने तक सफर कर रहा है लगातार। 

ऐसा नहीं की कविता तक सीमित है चाँद झूम कर तो कभी ग़मगीन होकर खूब गाया भी गया है चाँद , खोया खोया चाँद , खुला आसमान , आँखों में सारी  रात जाएगी की तकलीफ तो चलो दरदार चलो चाँद के पार चलो की ख्वाहिश , चाँद छुपा बादल में तो चाँद सिफारिश जो करता हमारी तो देता वो तुमको बता कह कर भी कह दी गयी बात अपनी ,और ये भी तो कहा  गया बडी शिद्दत से की चौदवी का चाँद हो या आफताभ हो जो भी हो खुद की कसम लाज़वाब हो ,मैंने पुछा चाँद से गाया गया तो आजा सनम मधुर चांदनी में हम तुम ;तो गली में आज चाँद निकला हो ये रात ये चाँद ,सब जगह चाँद ही मिला अपनी बात कहने को शिकायत करने को ,प्रेम का इजहार करने को या दिल टूटने की शिकायत करने को। 

बाकी आरे  आवा पारे आवा नदिया किनारे आवा जैसे गाने भी सुने थे बचपन में तो आजा रे चांदनी हमारी गली चाँद ले के आजा ,आधा है चन्द्रमा रात आधी , ऐ चाँद तेरी चांदनी की कसम ,मेरा चाँद मेरे पास है गाकर कैसा गरूर दिखा दिया चाँद को ही ,चाँद आहे भरेगा फूल दिल थम लेंगे ,चाँद एक बेवा चूड़ी की तरह ,,चाँद जाने कहा खो गया ,तो चाँद जैसे मुखड़े पर बिंदिया सितारा नजर आया और गा दिया किसी ने ,तो चाँद के पास जो सितारा है वो सितारा हंसी लगता है गाकर भी चांद को ही चिढा दिया  ,चाँद की कटोरी है रात ये चटोरी है ,चाँद ने कुछ कहा रात ने कुछ सुना  गाने मे अलग अंदाज से बात कही तो चाँद  निकलेगा जिधर हम न देखेंगे उधर क्या बात है इस गाने में , चाँद  निकला मगर तुम न आये का दर्द भी उड़ेल दिया प्रेमी ने गाकर ,चाँद सा मुखड़ा क्यों शरमाया , आंख मिली और दिल घबराया ,चाँद से पर्दा कीजिये कही चुरा न ले चेहरे का नूर ,चाँद सी महबूबा हो मेरी  कब ऐसा मैंने सोचा था जैसे गाने में चाँद ने खूब धूम मचाई तो माँ ने ;चंदा है तू मेरा सूरज है तू गाकर बच्चे को रिझाया ,चाँद को ढूढने सभी तारे निकल गए ,चंदा मांमाँ से प्यारा मेरा मामा ,चाँद वो चाँद किसने चुराई तेरी मेरी निदिया ,चंदा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे , चंदा रे चंदा कभी तो जमीन पर आ , चंदा रे जा मेरा सन्देश पिया से कहियो ,चंदा से मेरी पतिया ले जाना , चंदा तोरी चांदनी में जिया जला जाए ,धीरे धीरे चल चाँद गगन में , तो गगन के चंदा मत पूछ हमसे कहा हूँ मैं दिल मेरा कहा , जब तक जगे चाँद गगन में मेरे चाँद तुम सोना नहीं ,वो चाँद जहा वो जाए तू भी साथ चले जाना ,रात के मुसाफिर चंदा जरा बता दे मेरा कसूर क्या है तू फैसला सुना दे ,तुझे सूरज कहु या चंदा ,तुम  चन्द्रमा हो मैं धरा की धूल हूँ ,उस चाँद से प्यारे चंदा हो तुम आकाश पे जो मुस्कराता है, वो चाँद जैसी लड़की इस दिल पे छा रही है ,वो चाँद खिला वो तारे हसे ये रात अजब मतवाली है ,ये चाँद सा रोशन चेहरा ,ये वादा करो चाँद के सामने भुला तो न दोगे मेरे प्यार को ;,इस तरह बहन हो बेटी हो ,बेटा हो ,प्रेमी हो प्रेमिका हो ,प्रेम का प्रस्ताव हो ,प्रेम की शिकायत हो , प्रेम का ताना हो या दूरी का दर्द हो ,प्रेम की ख्वाहिश हो या दिल के टूटने का बयां हो इंसान ने सबमे या तो माध्यम बनाया चाँद को या उसी के सर पर धर दिया सब शिकायत और उलाहना । 

कवियताये हो ,फ़िल्मी गीत हो या अन्य भी साहित्य की रचनाये , पेंटिंग हो या फोटोग्राफी सबके आकर्षण का केंद्र और रचना का आधार रहा है चाँद और चाँद केवल इंसानो को ही नहीं प्रभावित करता रहा बल्कि चकोर भी उसका दीवाना है तो इतना बड़ा अथाह समुद्र भी चाँद के प्रेम में पागल है ,ज्योही चाँद थोड़ा पास आता है समुद्र उछल पड़ता है उसे पाने को इस बात की परवाह किये बिना की उसके ज्वार में न जाने कितनो का क्या हो जायेगा । दूसरी तरफ वही इंसान चन्द्रमा पर पैर रख आया और उस दिन मेरे मन में आया था की अब चाँद की पूजा करने वाले क्या करेंगे क्योकि वो भगवान् नहीं रहा अब ,जो उसे देख कर रोजा तोड़ते है और जो उसे छननी में देख कर और पति को देख कर व्रत तोड़ती है वो अब क्या करेंगी पर मेरा डर निर्मूल निकला सब उसी तरह चल रहा है। सोचा मैने ये भी था की अब प्रेम कैसे होगा और चाँद कैसे मदद करेगा जब उस पर बस्ती बस जाएगी तो आजकल चंदा पर नए गाने और कविताये दिख नहीं रही है ,शायद साहित्य को विज्ञानं ने थोड़ा भ्रम मे डाल दिया है ,विज्ञानं भी जरूरी है पर ये क्या की सारी कल्पनाओ पर धूल डाल  देता है जबकि कल्पनाये ही विज्ञानं का आधार है पर ! ये विज्ञानं और साहित्य की लड़ाई पुरानी है और चलती ही रहेगी पर भावनाओ बिना ,प्रेम बिना इंसान क्या ?

तो मैं तो कल्पना के साथ हूँ ,भावना के साथ हूँ प्रेम के साथ हूँ ,विज्ञानं मेरे लिए प्रयोग की चीज है और प्रेम तथा भावना जीने की चीज है कल्पना जीने लिए भविष्य की ताकत और प्रेरणा की चीज है । तो चाँद मैं तो तुम्हे वैसे ही देखूंगा जब मौका मिलेगा और कोई मुफ्त में घर देगा तो भी तुम्हारी ऊपर वाली बस्ती में मैं तो नहीं जाऊंगा ,मै नहीं  मानता की बुढ़िया चर्खा  नहीं कात रही है ,मैं नही मानता की गरीब की रोटी की आस नहीं हो तुम ,मैं नहीं मानता की बिना छत  फुटपाथ और मैदान मे सोने वालो  का सहारा नहीं हो तुम ,मैं नहीं मानता कि बात नहीं करते हो तुम ,अभी बात ही तो कर रहा हूँ चाँद से मैं । और फोटो खींचने के पहले टहलना छोड़कर निहारता रहा मैं अपने बचपन के दोस्त चाँद को देर तक और बाते भी करता रहा जिसमे सवाल और जवाब दोनों मेरे ही मन के थे।  क्या आप चाँद को देखते है ? नहीं तो निकलिए घरो से और जैसे सूरज के सामने पीठ कर बैठते है स्वस्थ रहने को वैसे ही चांद  को सामने से निहारिये वैसे भी आप चाँद के लिए खीर बना कर रख देते है न पूरी रात की चाँदनी उतर आएगी उस खीर में और वो अमृत हो जाएगी बीमारियों से मुक्ति दिलाएगी तो चाँद को खुद ही निहार लीजिये रोज या जब दिखे खूब देर तक और अपनी शिकायत ,अपना दर्द सब उसी से कह दीजिये अकेलापन परेशांन नहीं करेगा और  आप आत्महत्या का विचार  क्यों लाते है और क्यों सोचते है की आप ही दुखी है ,बस चाँद की तरफ देखिये उससे प्रेम करिये और उसी से शिकायत फिर चादर तान कर रात के लिए सो जाइये ताकि सुबह जग सके नई ऊर्जा ,उत्साह और संकल्प के साथ।  अच्छा चाँद अभी के लिए विदा कहता हूँ ,कल फिर मिलेंगे।

सोमवार, 16 नवंबर 2020

1977 शिक्षा मंत्री से चर्चा

#जिन्दगी_के_झरोखे_से--

आज से #43_साल_पहले का यह #1977_का_समाचार है जब ड़ा शिवानंद नौटियाल उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री थे रामनरेश यादव जी की सरकार मे मेरे नेत्रत्व मे छात्रो का प्रतिनिधि मंडल मिला था उनसे आगरा के कुलपति को बर्खास्त करवाने को ।
बाद मे हम लोगो ने उत्तर प्रदेश के राज्यपाल एम चन्ना रेड्डी को घेर लिया आगरा के सर्किट हाऊस मे ,लाठीचार्ज हुआ पर हटे नही हम लोग और सुबह से रात हो गयी तो सर्किट हाऊस की लाईट बुझा कर उन्हे पीछे के रास्ते से निकाला गया ।
दूसरे दिन राज्यपाल ने उस कुलपति को बर्खास्त कर दिया ।
इसके पहले एक दिन कुलपति को उठा कर मैं उनकी कुर्सी पर बैठ गया और आदेश शुरू कर दिये ।एस पी ए एन सिंह और ए डी एम सिटी राम कुमार कुंवर मे बाहर लाठी चार्ज कर छात्रो को तीतर बितर कर दिया और अंदर आकर मुझसे उठने का आग्रह किया पर तब भी मैने इस शर्त  पर उठना मंजूर किया की कुछ घंटे का ही सही मेरे कुलपति होने पर पहले चाय पिए सब लोग तब उठ जाऊंगा ।
और वही हुआ ।किसी पर कोई मुकदमा कायम नही हुआ ।
कुलपति बहुत भ्रष्ट था एक तरफ हम लोगो को लालच देता था और दूसर तरफ कुछ पालतू गुंडो जिसमे से एक सरगना को ओ एस डी बना लिया था उनसे धमकवाता था ।पर उस जमाने मे गुंडो की हैसियत ही नही थी कि सामना कर सके ।

रामगोपाल का पहला चुनाव

#जिंदगी_के_झरोखे_से-'
#रामगोपाल_यादव_का_पहला_राज्यसभा_चुनाव

ये 1992 की बात है । मैं मुलायम सिंह यादव के घर गया था उनके बुलाने पर । तब वो 5 विक्रमादित्य मार्ग पर अकेले रहते थे और नीचे कोने मे छोटे से कमरे मे जगजीवन बैठता था जो तब तक टाईपिष्ट , खजांची ,व्यक्तिगत टेलिफोन ओपरेटर सहित सब बन चुका था और नीचे पायजामा तथा ऊपर कमीज पहनता था ।
बाहर गेट पर छोटी सी गुमटी बनी थी जिसमे सुरक्षा बैठती थी ।
मेरे लिए कोई रोक टोक नही थी कही भी जाने की ।
गेट पर राम अवतार शाक्य विधायक मिला जो अंदर से आ रहा था और उसकी आंखो मे आँसू थे । मुझे देख कर रुक गया ।मैने पूछा कि क्या हो गया तो बोला की मुलायम सिंह यादव ने डांट कर भगा दिया जबकी वो कुछ जरूरी बात करने आया था और आज पार्टी बुरी दशा मे है फिर भी ये बेइज्जती तो कोई पार्टी मे क्यो रहे ? मैने उसकी पूरी बात सुना और फिर बाहर ही उसे रोक दिया की वो मुझसे बिना मिले नही जायेगा ।मेरी आदत थी ये सबको जोडना । 
मैं अंदर गया ।मुलायम सिंह यादव तनाव मे टहल रहे थे । मैने पूछा कि क्या हो गया ? वो बोले की चंद्रशेखर जी के 4 विधायक पार्टी छोड गये और उन्होने अपने भाई को राज्य सभा उम्मीदवार घोसित कर दिया है अब क्या राजनीति करेंगे और क्या मुह दिखाएँगे ।
मैने कहा की पार्टी चंद्रशेखर जी के लोगो ने छोडा है और गुस्सा आप अपनो पर उतार रहे है इसका क्या मतलब है ।तो बोले की मूड ठीक नही फिर भी लोग चले आ रहे है ।मैने कहा उनको क्या पता ,आप गेट पर बोर्ड लगवा दीजिये मूड़ ठीक नही ।
तो चुप हो गए । मैने कहा की राम अवतार शाक्य को मैने रोक दिया है बाहर पहले उसे बुलाइए और अच्छी तरह बात करिए फिर बात करते है ।
उन्होने उसे बुलाया ,खेद व्यक्त किया और मिठाई खिला कर विदा किया ।फिर हम दोनो ड्राइंग रूम में बैठ गये ।
मैने कहा हमारे पास 25/26 विधायक बचे है , यदि मैं 2 विधायक का इन्तजाम कर दूँ तो क्या आप और बाकी लोग मिल कर 2/4 का इन्तजाम नही कर सकते ?  वो बोले की आप कैसे करेंगे ? बहुत पैसा मांगेंगे लोग और हम कहा से देंगे ? 1989 की सरकार मे उन्होने लूट नही किया था । मैने कहा की एक भी पैसा मेरे लोगो को नही देना होगा ।मैने कहा की अकसर आखिरी व्यक्ति 30 के आसपास वोट पर जीत जाता है । वो बोले की कोई निर्दलीय पूंजीपति खड़ा हो गया तो नही होगा ।
तब मैने कहा की काशीराम जी फला तारीख को कानपुर आ रहे है आप भी चले जाईये और यूँ ही उनके रूंम मे चाय पीने चले जाईयेगा सर्किट हाउस में ।
उन्होने कहा की काशीराम ने बयान दिया है कि वो चुनाव मे हिस्सा नही लेंगे ।
मैने कहा की बयानो का क्या अर्थ आप जाईये तो और मिल गया तो सीधे 11/ 12 वोट मिल जायेंगे ।
फिर हम लोगो ने चाय पिया और वही हुआ ।मुलायम सिंह जी की काशीराम की बात हो गई और वही 1993 मे दो दलो के समझौते की बुनियाद बनी ।
इस बीच जीवन मे पहली बार मैने गाडी के शीशो पर काली फिल्म लगवाया जो चुनाव के बाद हटा दिया ।
जनता दल के विधायक चन्द्रभान मौर्य और ओम प्रकाश दिवाकर को काली शीशे वाली गाडी मे ले जाकर मैने मुलायम सिंह यादव से मिलवाया और फिर कुछ और लोगो को भी ।
और अन्ततः रामगोपाल यादव अच्छे वोट से जीत गये ।
मुझे वो दृश्य भी याद है जब चुनाव जीतने के बाद सब लोग विधान सभा से राज भवन कालोनी के दफ्तर तक पैदल गये थे और मैं मुलायम सिंह यादव के साथ गाडी मे ।
पार्टी ऑफिस मे छोटा सा तखत लान मे रखा था उस पर मुलायम सिंह यादव ,राम सरन दास सहित हम कुछ लोग बैठ गये और बाकी सभी सामने नीचे लान मे जमीन पर और रामगोपाल जी सबसे पीछे ।
मैने उस कार्यक्रम का संचालन कर रहा था ।मैने मुलायम सिंह यादव से धीरे से कहा की रामगोपाल को मंच पर बुला ले आज उनका दिन है तो उन्होने मुझे धीरे से डपट  दिया की वही बैठने दो ,दिमाग खराब मत करो और मैं चुप हो गया ।
इससे पहले बैकग्राउंड ये है कि एक दिन दिल्ली के अशोका होटल मे चाय पीते हुए मुलायम सिंह यादव ने अचानक कहा की सी पी राय क्या आप को पता है कि रामगोपाल के बेटे भूखे मर रहे है ?
मैने कहा की वो तो डिग्री कालेज मे टीचर है और गाँव मे खेतो भी है तो भूखे कैसे मर रहे है ? फिर उन्होने ना पचने वाले तर्क दिये और मैं बात समझ गया और कह भी दिया कि भाई साहब आप उन्हें राज्य सभा देना चाहते है तो देगे ही पर उसके लिए ये सब बाते करने की क्या जरुरत है ।
मुझे अगली बार दे दीजियेगा । जो मौका कभी नही आया 
और रामगोपाल ने जिदंगी भर पता नही किस बात की मुझसे दुश्मनी निभाया की फिर कुछ मिलने ही नही दिया जो मेरा हक था और जिससे पार्टी का भी भला  ही  होता ।

#जिंदगी_के_झरोखे_से अयोध्या अन्दोलन का सच

#जिंदगी_के_झरोखे_से--
#अयोध्या_आंदोलन 

1990 - 25 सितम्बर को गुजरात के सोमनाथ से अडवाणी जी ने रथयात्रा शुरू कर दिया था ।अडवाणी जी देश के लोकतंत्र की एक राष्ट्रीय पार्टी के दो बड़े नेताओ मे से एक और उसके अध्यक्ष थे जिसकी जिम्मेदारी देश के भविष्य के लिए लड़ने और शैडो गवर्नमेंट बना कर वैकल्पिक विकास का एजेंडा शिक्षा स्वास्थ्य कृषी सुरक्षा इत्यादि होना चाहिये था वो इन मुद्दो के लिए नही बल्की मंदिर बनाने के लिए माहौल बनाने निकला था । उनको 30 अक्तूबर को अयोध्या पहुचना था पर 23अक्तूबर को उनको लालू यादव ने समस्तीपुर मे गिरफ्तार कर लिया और फिर उनका रथ वाहि थाने मे ही सड़ गया किसी को उसकी याद नही आई ।
काश अडवाणी जी देश की समस्याओ के लिए रथ लेकर निकले होते गरीबी और बेरोजगारी के खिलाफ निकले होते , गांव की बदहाली के खिलाफ निकले होते , अशिक्षा और अभाव मे मौत के खिलाफ निकले होते तो शायद हम जैसे लोग भी साथ हो लेते पर !
कहानी के विस्तार मे नही जाकर मुद्दे पर आता हूँ जिसके लिए आज लिख रहा हूँ 
राम लला हम आयेंगे ,मंदिर वही बनायेंगे 
बच्चा बच्चा राम का जन्मभूमि के काम 
इत्यादि नारे लगवाये जा रहे थे 
आरएसएस और भाजपा तथा विश्व हिन्दू परिसद ने कार सेवा का एलान किया । 21अक्तूबर से ही देश भर से ये सब संगठन मिल कर लोगो को विभिन्न रस्तो से अयोध्या के 100 किलोमीटर के दायरे मे चारो तरफ लाने लगे ।
और अन्ततः 30 अक्तूबर  और फिर 2 नवम्बर  को इस तरह कूच किया जैसे किसी दूसरे देश मे विजय प्राप्त करने क
जा रहे हो ।
अयोध्या मे पूजा और दर्शन होता था उस समय भी पर विवाद अदालत मे था ।
मैं उस वक्त पार्टी का प्रदेश महामंत्री और प्रवक्ता था हम लोगो ने दो प्रस्ताव किया यह कहते हुये की दर्शन और पूजा सबका अधिकार है पर संविधान और कानून से खिलवाड़ सरकार मे बैठा हुआ और उसकी शपथ लिया कोई भी व्यक्ति नही करने देगा और हम भी नही ।
पर हमारे दो प्रस्ताव है --
हम मध्यस्थता करने को तैयार है दोनो पक्ष साथ बैठ जाये और सहमती से तय कर ले क्या होना चाहिये सरकार उसी को मानेगी 
2--यदि सहमती नही बनती है तो फिर एक ही तरीका है की अदालत जो तय करे वो माना जाये ।
कोई तीसरे तरीके को संविधान और कानून से चलने वाले देश मे किसी भी हालत मे नही स्वीकार किया जा सकता है और न किसी हालत मे स्वीकार किया जायेगा ।
तब इन लोगो ने जवाब दिया था जो आज पूरे देश को जानना चाहिये -
कि 
"यह अदालत और कानून नही बल्की हमारी आस्था का सवाल है और इसे हम खुद हल करेंगे "
बड़े नेताओ ने आफ द रिकार्ड यह कहा था की सिर्फ साफ सफाई करेंगे और घोषणा हो चुकी है तो दर्शन कर लौट जायेंगे ।
लाखो की भीड खेतो मे होकर अयोध्या पहुची और रोकने पर पुलिस तथा प्रशसनिक अधिकारियो पर हमलावर हो गई । अधिकारियो ने बहुत समझाने का प्रयास किया की शान्ती से दर्शन करे और वापस चले जाये पर भीड उग्र हो गई जिसके लिए पीछे से सिखा पढा कर लाया गया था ।
भीड गुम्बद पर चढ़ गई और तोड़फोड़ करने लगी 
मजबूरन पुलिस को बल प्रयोग करना पडा और उसमे 16 लोगो की जाने गई जो बहुत अफसोसजनक है क्योकी वो सब इसी देश के नागरिक थे और अपने परिवारो के प्रिय थे । किसी भी हालत मे कभी भी अपने ही नागरिको पर पुलिस की लाठी और गोली चले यह लोकतंत्र के बिल्कुल खिलाफ है और जिम्मेदार राज्य की अवधारणा के भी खिलाफ है । मरने वाले अधिकतर पिछड़े वर्गो के जवान थे ।ये भी सच है की उन मृतको के परिवारो का इन संगठनो और इनकी सरकारो ने फिर कभी हालचाल भी नही पूछा ।
आरएसएस के झूठ तन्त्र ने फैला दिया की हजारो जाने चली गई और सरयू का पानी लाल हो गया और एक खून खौला देने वाला वीडियो भी बना दिया इन लोगो ने 24 घन्ते मे और देश भर मे बांट भी दिया जैसे अन्ना के आन्दोलन मे मिंनटो मे झंडे और मशाले बट जाती थी ,बस आप दोनो को एक साथ रख कर देख्ते जाइए । मैने दिल्ली मे किसी संघी के घर वो वीडियो देखा ,पूरी पिक्चर थी सारे इफेक्ट डाल कर बनायी गई जिसमे लाशे ही लाशे दिखाई गई ,नाली मे खून बहता दिखाया गया , पहले सोमनाथ से लेकर बाबर तक पता नही क्या क्या बताया गया और उसमे एक हेलिकोप्टर उड़ता दिखाया गया था जिसमे बैठे मुलायम सिह यादव को मशीन गन से लोगो पर गोली चलते दिखाया गया था ।
हमने चुनौती दिया की आप मृतको के नाम बताओ ।  ये लोग जो भी नाम बताते हम पूरा सिस्टम लगा कर उनको ढूढ लाते और मीडिया के सामने पेश कर देते । इंनकी सारी लिस्ट और बात फर्जी नकलती गई और अन्त मे वो 16 लोग बचे जो सचमुच मरे थे और उनकी मौत पर हम सबको अफसोस तब भी था और आज भी है ।
पर यह भी उल्लेखनीय है की कल्याण सिंह की भाजपायी सरकार मे जब सरकारी तौर पर फिर लाखो की भीड आई और विवादित ढांचा तोड गया तो उस पर चढे तमाम लोग उसी के नीचे दब गये थे पर सत्ता का नशा और इस विश्व विजय के जोश मे वो बेचारे समचार की सुर्खिया नही बने ।
उसके बाद अयोध्या से ही मार काट लूट शुरू हो गई और यहा तक की खुद भाजपा का अल्पसंख्यक सेल का अध्यक्ष चीखता ही रह गया की मैं तो आप की पार्टी के इस पद पर हूँ, पर ? (इसका ब्योरा उस दिन के हिन्दू के मौके पर मौजूद रिपोर्टर की रिपोर्ट मे मिल जायेगा ।
कैसे लोग आये थे ये धार्मिक काम करने इसी से समझ लीजिये की रुचिरा गुप्ता इनकी भीड मे ही थी तो उसके शरीर से कपडे गायब हो गए और ये देख कर बी बी सी के रिपोर्टर मार्क टूली ने उसे अपना कोट पहनाया और पिटता रहा पर किसी तरह रुचिरा को भीड से निकालने मे कामयाब रहा ।
दंगो मे 2000 से ज्यादा जाने गई ,हजारो करोड़ की सम्पत्ती नष्ट हुई और उठान लिए हुये विकास का पहिया बैठ गया और सालो पीछे चला गया ।
दंगो मे इन लोगो ने क्या किया था आतंक फैलाने को सर्फ इस बात से जान लीजिये की एक टेप बनाया था जी किसी छत पर अचानक काफी तेज आवाज मे चीखता --बचाओओ ओ ,भागो ओ ओ ,आ गए हजारो मुस्लमान ,अरे मार दिया अरे एक और मार दिया भागो ओ ।
और हम लोग जो आगरा के कालेज कैम्प्स मे रहते थे उसके लोग भी अपने हथियार लेकर निकल आये और छपने की जगह ढूढ़ने लगे ,मैने कहा की यहा कहा कोई मुस्लमान है आसपास पर कोई सुनने को तैयार नही था ,आगरा का लाजपत कुन्ज और ऐसी तमाम कालोनी जो मुस्लिम इलाको से 8 से 10 किलोमीटर दूर है लोग रात रात भर पहरा देने लगे ,रास्तो पर बड़े बड़े पत्थर और पुराने टायर रख दिये इत्यादि 
और मुसलमान अपने मुह्ल्लो मे दुबका था की निकले नही की पी ए सी आयेगी और फिर सिर्फ गोलियो की आवाज होगी ।
(दंगो मे क्या क्या हुआ और कौन लोग मरे , किनके साथ क्या क्या हुआ और क्या क्या कर्म करते हुये महान लोग जय श्रीराम के नारे लगते थे और राम का नाम कर बडा कर रहे थे और कौन सी संपत्तियाँ नष्ट हुई इत्यादि तमाम आयोग और जांच कमेटी की रिपोर्ट अब सार्वजनिक है और हो सचमुच देश के वफादार और जिम्मेदार लोग है उनको सब पढ़ना चाहिये और सब जानना चाहिये ।
हर दंगे के बाद भाजपा की सीटे बढती गई ।
और 
इसी बीच विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अडवाणी जी के अभियान के मुकाबले मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर दिया ।उनकी सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया और चंद्रशेखर जी प्रधान मंत्री बन गए ।
# बीच मे ये भी जान लीजिये की विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को भाजपा का समर्थन था और भाजपा के प्रिय जगमोहन कश्मीर के राज्यपाल थे जब कश्मीरी पंडीत कश्मीर छोड कर गए ,पर उस वक्त भाजपा ने न उसे मुड़दा बनाया और न कश्मीरी पण्डितो के सवाल पर उस सरकार से समर्थन ही वापस लिया#
हा तो चंद्रशेखर जी के अटल बिहारी वाजपेयी श्रीमति सिंधिया , भैरोंसिंह शेखावत सहित काफी भाजपा नेताओ से अच्छे सम्बंध थे और उनकी सरकार मे हम लोगो के युवा राजनीती के मित्र सुबोधकांत सहाय गृह मंत्री थे ।
(  मन्दिर सम्बन्धी हिन्दू परिसद और इन लोगो की बैठक और प्रधान मंत्री से मिलकर बात करने की इच्छा पर चंद्रशेखर जी का उनकी बैठक मे श्रीमति सिंधिया के यहा खुद पहुच जाना और फिर उन्होने क्या सुना और क्या कहा तथा फिर मुस्लिम पक्ष से क्या कहा जानने के लिए Chanchal Bhu की वाल खंगालिए थोडा समय निकाल कर )
अन्त मे चंद्रशेखर जी विवाद का एक सर्वसम्मत हाल निकाल ही लिया अपनी दृढता और दूरदर्शिता से जिसपर अंदर सब सहमत थे और वो फौसला करीब ऐसा ही था जो उसके बाद इतनी बर्बादी और दंगो तथा नफरत की खेती के बाद अन्ततः अदालत ने ही दिया # फिर याद रखिये की हमने कहा था की या तो बातचीत से हल कर लो या अदालत को करने दो और तब आस्था के नाम पर अदालत को मानने से इंकार कर दिया था इस जमात ने #
और अपनी सरकार बन जाने पर उसी अदालत को माना भी और दिन रात देश से भी कहते रहे की अदालत को सभी माने मिलजुल कर और पूरे देश ने माना मुसलमान ने भी । पूरा देश शान्त रहा पर यदि अदालत का फौसला इसका उल्टा होता तो क्या होता ,कल्पना से रूह काँप जाती है ।
प्रधान-मंत्री चंद्रशेखर के निवास से विश्व हिन्दू परिसद वाले यह कह कर निकले की थोडी देर मे आपस मे राय कर के आते है और फिर आये ही नही ।
अब पाठक ध्यान से पढे और समझे इस जमात के इरादे की , आदत को , रणनीति को ,इच्छा को , इनके हथकण्डे को , देश के प्रति जिम्मेदारी को , देश के भविष्य को लेकर चिंतन को , चिंता को और इनके देश के लिए सपने ,सिद्धांत और सक्ल्प को । 
( लखनऊ से दिल्ली तक की सत्ता के करीब रह कर , निस्पक्ष रूप से जागृत रह कर जो देखा , जो जाना , जो समझा सब लिख दिया क्योकी जो अब 45 साल के है तब स्कूल मे पढ रहे होंगे और 1990 मे पैदा लोग अब 30 साल के हुये होगे ।देश की 65%आबादी 35 साल के नीचे की है इसका मतलब ये है की उनको जो बताया गया होगा शाखा मे ता सन्घ के प्रचार ने वो उसी को सच मानते है ।इसलिए सभी जागरूक और सच्चे देशभक्तो की जिम्मेदारी है की पूरे देश को सच की तस्वीर दिखाए बड़े पैमाने पर और देश को फसीवद की तरफ जाने से बचाए ।
आज इसिलिए मैने एक पोस्ट मे लिखा था की देश दो पाटो के बीच फंस गया है -एक जो सच है और दूसरा आरएसएस का सच । देखे ईश्वर कैसे बचाता है मेरे देश को ।
जो सच्चे हिन्दू है और सचमुच मे राम कृष्ण और शिव को मानते है और चाहते है की समाज इन तीनो के नाम पर घृणा और दंगे मे न फंसे बल्की इनके जो गुण और ज्ञान आज को और भविष्य को अच्छा बनाते हो और भारत को तथा भारत वासियो को अच्छा बनाते हो उनका प्रसार हो उनकी भी जिम्मेदारी है की देश और समाज को सही धर्म का ज्ञान कराये ,स्वामी विवेकानन्द से लेकर गांधी जी और डा लोहिया तक के धर्म और इन लोगो के बारे मे लिखे का ज्ञान कराने का अभियान चलाये ।
अदालत का फौसला आया , मन्दिर बनेगा , देश मे सब उसके पक्ष मे है पर उसे धार्मिक आयोजन ही रखा जाता और उसमे राजनीती नही की जाती तो भारत बनता 
लेकिन इन लोगो को भारत बनाना ही कब था या है इन्हे तो बस वोट और सरकार बनाना है सब बेच देने के लिए ।

वो बच्चा और राम

#जिंदगी_के_झरोखे_से

आज कुछ झलकियाँ जानी, देखी या भोगी हुई   -  वो बच्चा 

1-वो भी बच्चा था , तब गाँव मे रहता था और गाँव मे आप किसी भी जाती मे और किसी भी स्तर के परिवार मे पैदा हुये हो गाय भैस को अन्य बच्चो के साथ चराने या तालाब मे नहलाने ले जाना एक काम होता ही था जैसे खेत के काम मे हाथ बताना, अगर घूरा उठ रहा है तो ,अगर गन्ना पेरा जा रहा हो या पानी के लिए रहट चल रही हो तो बैलो के पीछे पीछे घंटो चलना ,गुड बनते वक्त आग मे ईधन झोंकना , दवाई के समय खलिहान मे बैलो को हाँकना , कटाई पर चाहे छोटा बोझा ही लेकर आना ,मक्के की बाल छीलना , चारा काटना, खेत की रखवाली के लिए कुछ देर मचान पर बैठना , गाय बैल भैस को दाना पानी देना इत्यादि सब मे लगना ही होता था ।शायद फिल्मो वाले गाँव के जमीन वाले किसानो के परिवार भी कही होते होंगे ही । ये बच्चा भी सब करता था ।  उसको भी खेलना अच्छा लगता था और खेलते वक्त गाँव मे बच्चो मे जाति की रेखा नही थी । लाखन पाती , पेड पर चढ़ दूसरे को छू लेना , गिट्टी फोड ,गिल्ली डंडा ,कुश्ती और कबड्डी ही खेल थे गाँव के ।
उस दिन शाम को दो टीम बन कर कबड्डी हो रही थी खलिहान मे और खेल खत्म होते होते सूरज डूबने लगा था । सब बच्चे साथ साथ लौटे और वह बच्चा भी लौटा । और बच्चो के पिता किसान थे पर उस बच्चे के पिता अध्यापक थे । उन्होने जोर से चीक कर पूछा कहा थे ? बच्चे ने जवाब दिया -खलिहान मे सब फला फला थे और आज कबड्डी थी ,अभी खत्म हुई ।उसके पिता ने कहा की अब तो अन्धेरा होने को है पहले क्यो नही लौटे ? इस पर वह बच्चा चुप हो गया क्योकी इसका कोई जवाब उसके पास नही था । फिर सवाल आया कि बोलते क्यो नही ? फिर भी जवाब नही था ।
बस पास मे रखी लाठी पिता के हाथ मे थी और उस बच्चे के शरीर पर अनगिनत निशान छोड कर ही लाठी वापस अपने स्थान पर गई । निशान भी ऐसे की रात को सोते वक्त चारपाई भी सजा दे रही थी ।
बाकी किसी भी बच्चे के घर से कोई चीख सुनाई नही पड़ी ।  हो सकता है उन बच्चो को घर के अंदर ले जाकर सजा मिली हो ।
2-वो बच्चा शहर आ गया था अपने पिता के साथ । गाँव से आया था और गाँव मे सर पर चुटिया रखना शायद कोई धार्मिक मजबूरी थी या परम्परा थी या पंडीत जी द्वारा पैदा किसी अन्धविश्वास की उपज थी ।
शहर मे स्कूल के बच्चे उस बच्चे पर हंसते और उसका मजाक ही नही उडाते बल्की जब तक पीछे से चुटिया खींच देते थे ।
बाल कटवाने का दिन आया ।घर के पास ही नाई था । पिता वहाँ बैठा कर और काटने का पैसा देकर घर चले गए ।बाल काटने का नम्बर आया तो काटते हुये नाई ने पूछा की चुटिया छोड़ना है या काटना है ? वो बच्चा मौन रहा और मौन को सहमती मांन नाई ने चुटिया भी काट दिया ।बच्चा अंदर से खुश कि अब स्कूल मे कोई तंग नही करेगा । 
घर पहुचा और मासूमियत से बता दिया की चुटिया नाई ने काट दिया लेकिन अच्छा ही हुआ क्योकी स्कूल मे उसके साथ ये सब होता है ।
बात पूरी हुई भी नही की पिता के हाथ मे डंडा था और उस बच्चे शरीर पर निशान ही निशान और उसकी चीखे ।
3-वो बच्चा अपने छोटे भाई को बहुत प्यार करता था और हर उसको लेकर खेलना और गोद मे लेकर घुमाना उसे अच्छा लगता था । पिता के पास साइकिल थी जिसमे उस जमाने मे आगे हैंडिल मे कंडीया लगी होती थी ।छोटा भाई इतना छोटा था की उस कंडीया मे बैठ जाता था और वो बच्चा मुहल्ले मे छोटे भाई को उस कन्डिया मे बैठा कर घूमाता था ।एक दिन शाम को भी घर पास उसे घुमा रहा था कि कन्डिया किसी तरह हैंडिल से गिर गई और छोटे भाई को चोट लग गई ।वो बच्चा घबरा गया और साईकिल घर के बाहर खड़ा कर छोटे भाई को लेकर परेशान हाल इधर उधर दौडने लगा उसके घाव को हाथ से दबा कर की खून रुक जाये पर कब तक ? घर तो जाना ही था ।
घर मे जब पिता को पता लगा ये तो फिर पिता की मार और बच्चे के शरीर पर निशान लेकिन इस बार एक निशान शरींर पर नही बल्की मन पर भी लगा और  बहुत गहरा लगा जो कभी खत्म ही नही हुआ जब पिता ने उस छोटे से बच्चे से कहा की हाँ तुम मार देना चाहते हो छोटे को ताकी गाँव की जमीन जायदाद सब तुम्हारी हो जाये ।
वो बच्चा एक कोने मे रोता रहा लगातार और बार बार ।
4-उस बच्चे को उसके पिता शायद बहुत चाहते थे और चाहते थे कि जो वो नही बन पाये वो बच्चा बन जाये और खुद की इच्छा उसपर थोपने के चक्कर मे शायद कुछ ज्यादा कर जाते थे -
जैसे उस बच्चे को सिखाया की राम की स्पेलिंग आर ए एम होती है और साथ ही की आर ए एम ए रामा होता है पर क्यो होता है और कैसे बनता है शब्द बस यह ही नही बता पाये पिता ।अक्सर पूछ लेते राम की स्पेलिंग बताओ तो वो बच्चा बता देता आर ए एम तो उसे पक्का करने को तुरंत घुडक देते थे वो पिता की आर ए एम होता है ? और बच्चा घबरा जाता और आर ए एम ए बोल देता और फिर बच्चे के शरीर को मजबूत करने का अवसर नही गंवाते वो पिता और इस राम और रामा ने उस पिता को 50 से ज्यादा ही मौके दिये बच्चे के शरीर को मजबूत बनाने के ।
इसी तरह यदि वो बच्चा गडित कर रहा होता तो सवाल होता की अंग्रेजी कब पढ़ोगे और अंग्रेजी पढता तो गडित कौन पढेगा जैसे सवाल सभी विषयो पर होता और बच्चा लगातार शारीरिक रूप से मजबूत होता रहा  ।
5-ऐसा नही की हमेशा पिता ने उस बच्चे के शरीर को मजबूत करने का ही काम किया बल्की एक बार थोडा बडा हुआ था वो बच्चा और बच्चो के साथ साथ देखा देखी मे एक गलती कर बैठा ।इस बार पिता ने डंडा नही उठाया बल्की अपनी आंखे गीली कर लिया कुछ कह कर और इस बार उस बच्चे को ये सजा कही ज्यादा भारी पड़ी और फिर दुबारा इस बच्चे ने वो गलती कभी नही किया ।
6-एक बार बच्चे को कुछ पैसे की जरूरत पड़ गई और पिता से ही मांगना था । पिता अब डंडे से नही शब्दो से मारने लगे थे । बोले की जब जरूरत हो तो पिताजी ? 
बस उस दिन से उस बच्चे ने कभी ना मुह खोला और ना हाथ फैलाया ,यहाँ तक की जूता टूट जाने पर कुछ दिनो तक नंगे पैर गया स्कूल ।
फिर वो बच्चा बडा हो गया और जब भी उसके पिता देख रहे होते तो वो उपन्यास पढने लगता और जब वो नही देखते तो कोर्स पढने लगता क्योकी अब उस बच्चे के शरीर को मजबूती की जरूरत नही थी और पिता भी अब थक चुके थे ।

सोमवार, 2 नवंबर 2020

आगरा रामलीला मैदान देवीलाल की रैली

#यादो_के_झरोखे_से

एक #पुरानी_याद #1988_की ।
आगरा के सर्किट हाउस की एक फोटो प्रेस कांफ्रेंस के समय ।
हरियाणा के मुख्यमंत्री चौ #देवीलाल की रैली थी आगरा के रामलीला मैदान में ।मैंने #ओमप्रकाशचौटाला को यू पी भवन में #मुलायम सिंह यादव के कमरे में और देवी लाल जी को हरियाणा भवन में मना किया था की जो रैली करवा रहे है एक हज़ार आदमी भी नहीं ला पाएँगे सभा में 
पर वो गुप्ता जी थे और मुलायम सिंह यादव ने उनको चेयरमैन बनवा दिया था तो उनकी बात का वजन ज़्यादा था 
और 
उस वक्त सम्पूर्ण विपक्ष की धुरी तथा उम्मीद की किरण देवीलाल जी आए भी 
रामलीला मैदान बिलकुल ख़ाली । 
देवीलाल जी फ़ॉर्मैलिटी पूरी कर नाराज़ हो वापस चले गए हरियाणा सरकार के स्टेट प्लेन से और बाक़ी सब लोग सर्किट हाउस आ गए #जनेश्वर_मिश्रा , #शरद_यादव , मुलायम सिंह यादव इत्यादि ।
गुप्ता जी ग़ायब , खाने तक का भी इंतज़ाम नहीं । एक तनाव था सब के अंदर की देवीलाल जी को क्या मुह दिखाएँगे । 
मुलायम सिंह में मुझसे अकेले में बात किया की इज्जत कैसे बचाई जा सकती है ? क्या अख़बार में कुछ ऐसा हो सकता है की देवीलाल जी को दिखाया जा सके ?
मैंने कहा कोशिश करता हूँ । 
फिर मेरे निमंत्रण पर सब लोग मेरे निवास पर आए जहाँ मेरे फ़ोन कर देंने के बाद मेरी पत्नी ने जल्दी जल्दी में पूरी सब्जी और पुलाव तथा रायता बना लिया था और उसके बाद  चाय । 
सभी नेता जनेश्वर जी शरद यादव , मुलायम सिंह और अन्य ने वही भोजन किया । 
मुलायम सिंह यादव बोले की जल्दी चला जाए ताकि सी पी राय भी फ़्री होकर उस ज़रूरी काम में लगे जो उन्हें दिया गया है 
और 
सबको बिदा कर मैं काम में लग गया । अखबार के दोस्तो ने सिर्फ इतनी दोस्ती निभा दिया की केवल मंच की फोटो छापा और देवीलाल जी तथा अन्य नेताओ का भाषण और भीड की चर्चा तथा फोटो छोड दिया ।अगले दिन देवीलाल की की सभा #एक_सफल_सभा थी ।
हा हा हा हा । 
जय हिंद ।

सोमवार, 22 जून 2020

चीन और नेपाल के बहाने

भारत के एक जिम्मेदार नागरिक के रूप मे लिख रहा हूँ 
कि 
चीन ,नेपाल पाकिस्तान तीनो मोर्चो को एक साथ खोले रखना ठीक नही है ।
अन्धे होकर अमरीका की गोद मे बैठ जाना भी ठीक नही है 
और इस चक्कर मे विश्वसनीय दोस्त रहे रुस को दूर कर देना भी ठीक नही हुआ और न ईरान के साथ संबंधो मे परिवर्तन ।
आसपास के बहुत से देश तबाह है तो मजबूत दिखने बाले देश भी अंदर से आज खोखले है ।
हम आज अर्थिक सँकट और कोरोना सँकट मे है और चारो तरफ से घिरे है तो चीन भी चारो तरफ से घिरा है और सँकट मे है ।चीन ने अर्थिक विस्तार इतना ज्यादा कर लिया है की तमाम जगह अपने को अर्थिक रूप से फंसा लिया है ।चीन आज लड़ाकू योद्धा नही बल्की ऐसा व्यापारी बन गया है जो अपने घर और व्यापार की रक्षा के लिए सुरक्षा भी रखता है ।
नेपाल की अपनी जरूरते और मजबूरिया है और जब हम अपनी तरफ से जाने वाली पाइप लाईन काट काट देंगे तो वो पानी पीने कही तो जायेगा ही ।लेकिन लाख मावोवादी शासन आ गया हो पर आज भी नेपाल हिन्दूओ का देश है और पशुपति नाथ से लेकर सीता मा तक का घर है और इन लोगो के होते हुये उसे इतनी आसानी से और इतनी जल्दी भारत से काटा नही जा सकता है ।नेपाल की अच्छी खासी निर्भरता भारत पर आज भी है तो भारत की सेना मे तैनात इतनी बडी संख्या मे नेपाली गोरखा जहा हमारी फौज का मजबूत आधार है वही यदि हम सचेत नही रहे और चीजो को ठीक से नही देखा समझा तो आने वाले समय मे वे आत्मघाती भी साबित हो सकते है ।
पाकिस्तान की हकीकत सिर्फ इतनी है की सेना के राज के करण वो पिछड गया है और अर्थिक बदहाली का शिकार है और तमाम अर्थिक स्रोत पर काबिज उनकी सेना और बड़े नेता तथा ठेकेदार लोगो की रुचि पाकिस्तान की बनाने मे कम और दूनिया के दूसरे देशो मे सम्पत्तियाँ बनाने और अपने परिवारो का वहा सुरक्षित इन्तजाम करने मे अधिक रही है ।
पर किसी भी पाकिस्तानी से कही मुलाकात हो जाये तो वो भारतीय से प्रेम से मिलता है ।
हर देश की कुछ कमजोरिया है और अन्तर्विरोध है पर दुर्भाग्य से भारत के दूतावासो ने और सभी खुफिया संगठनो ने पिछ्ले कुछ सालो मे लगता है की सिर्फ ऐश किया है और अपनी जिम्मेदारियो का निर्वाह नही किया है ।
जब सरकार मे बैठे लोगो की निगाह और लक्ष्य इन चीजो की तरफ होता है और उसमे गम्भीरता होती है तो वैसे ही लोग विभिन्न देशो और स्थानो पर लगाये जाते है और उन्हे पता होता है की उनका उद्देश्य क्या है क्योकी उनको स्पष्ट निर्देश रहता है की अगले कुछ सालो का लक्ष्य क्या है । सरकार भले बदल जाये पर देश का लक्ष्य नही बदलता यह किसी देश की तरक्की और मजबूती की मुख्य बुनियाद है इसिलिए बुनियाद यह भी है की सिर्फ चुनाव के 3/4 महीने कोई कुछ भी कर ले और बाकी दिनो भी विपक्ष अपनी धारदार भूमिका निभाए चाहे जब चाहे जो हो पर सभी मुख्य बड़े नेताओ , पूर्व राष्ट्रपति,पूर्व प्रधानमंत्री,
पूर्व विदेश मंत्री,पूर्व रक्षा मंत्री,पूर्व गृह मंत्री ,पूर्व वित्त मंत्री और पूर्व सेनध्य्क्ष ,और खुफिया विभागो के भी पूर्व काबिल लोगो की लगातार ऑफ द रिकॉर्ड चर्चा और विचार विमर्श ,सूचनाओ और भविष्य की योजनाओ पर गोपनीय रणनीतियो का निर्धारण लगातार होते रहना जरूरी है क्योकी देश सबका है और लोकतंत्र है तो कोई भी कभी भी सत्ता मे हो सकता है और कोई भी विरोध मे । और चूँकि सभी के कुछ अनुभव भी है और कुछ भविषय के सपने भी तो देश उन सभी विचारो और रणनीतियो का लाभ क्यो न पाये या उनसे वंचित क्यो रहे । आदर्श व्यव्स्था तो यही है ।
नेपाल से लड़कर नही मिल कर और उनकी तथा वहा के समाज की जिन्दगी ने घुस कर और जनता से जनता के संवाद को बढा कर बहुत कुछ ठीक भी किया जा सकता है और हासिल भी किया जा सकता है ।
पाकिस्तान के अन्तर्विरोधो पर निगाह भी और दखल भी और वहा की जनता चाहे बलूच हो या सिन्धी या भारत से गए लोग जो आज भी दोयम दर्जे के नागरिक है क्या हम उनको जोड़ सकते है ? क्या हम उनकी आँखो मे कुछ सपने जगा सकते है ?  और भी बहुत कुछ पर उनका इस्तेमाल राजनीती के लिए करेंगे तो कुछ नही होगा सिर्फ कुछ वोट हासिल करने के अलावा ।
भुटान के बारे मे थोडे कम से समय की और दूसरी थोडी दूरगामी रणनीति तय करनी होगी ।
श्रीलंका,मालदीव ,म्यांमार,बंगला देश के मामले मे भी कही रस्सी या तो कमजोर पडी या ढीली पड़ गई ।हा इतनी भी न खिंच जाये की टूट ही जाये ।
सिर्फ दलाई लामा को शरण देकर भूल जाना भी तो बडी भूल साबित हुई । अगर पीओके पर दूनिया मे चर्चा हो सकती है , फिलिस्तीन को मान्यता मिल सकती हौ और इस्राईल को मान्यता मिल सकती है तो बौद्ध धर्म तो पूरी दूनिया के तमाम देशो मे है ,तिब्बत की आज़ादी या दलाई लामा और इनके लोगो के लिए चीन जमीन खाली करे इसपर लगातार मुद्दा क्यो नही रह सकता है ।हम लोग मानवता और लोकतंत्र के ठेकेदार है तो तिनामिन चौक पर बच्चो पर टैंक चढाये गए तब या होंगकोग मे जो आन्दोलन चल रहा है उस पर हमारा देश और बड़े नेता मुखर क्यो नही है ? तिब्बत बचाओ आन्दोलन क्यो मरने दिया गया । आसपास के देशो का ढीलाढाला महासंघ को ये सपना आसपास के सभी देशो की आवांम देखने लगे इसके लिए सभी दल सयुक्त रूप से डा लोहिया के इस सपने पर काम क्यो नही कर सकते । इन चीजो के दूरगामी परिणाम हो सकते थे और है । विभिन्न देशो के साथ मैत्री संघ और शैक्षिक संस्कृतिक आदान प्रदान के कार्यक्रम क्यो बंद हो गए और क्यो नही चलाये जा सकते है रणनीतिक रूप से ।
जहा तक अभी के हालात का सवाल है उसे सरकार का नही बल्की देश का सवाल बना देना चाहिये ।
1-अर्थिक मोर्चे के लिए एक सर्व्दलीय और सर्वकालिक जानकार लोगो का समूह बने ।
2-नेपाल के लिए एक समूह बने जिसमे उसकी जानकारी तथा वहा से अच्छे सम्बन्ध रखने वाले नेता किसी भी दल के , विदेश, बड़े धर्म गुरु , नेपाल के एक्सपर्ट  विदेश सेवा के लोग , वहा काम कर चुके खुफिया विभाग के लोग इत्यादि हो ।
3-बंगला देश , भुटान , श्रीलंका सहित अलग अलग देशो के लिए भी ऐसा ही हो ।
4-पाकिस्तान के लिए उसको हैंडिल कर चुके और सफलता से चीजो को अंजाम दे चुके लोगो का समूह बने ।
5-चीन के लिए प्रधानमंत्री के नेत्रत्व मे एक सर्व्दलीय प्रतिनिधिमंडल चीन से वार्ता करे और साथ साथ अपनी क्षमता और रणनीति के अनुसार सेना अपना काम तत्काल शुरू करे और भारत लाईन ऑफ कन्ट्रोल का एक नक्शा तत्काल जारी करे उसके अनुसार चीन को वापस जाने को मजबूर करे अन्यथा फिलहाल जहा भारत के पक्ष मे परिस्थितिया हो उन इलाको मे उससे ज्यादा किलोमीटर अंदर तक जाकर बैठ जाये ।।
साथ ही विएतनाम , जापान सहित जिन देशो से चीन के हित टकराते है उंन सभी देशो के लिए तत्काल मंत्री या पूर्व मंत्री के नेत्रत्व मे प्रतिनिधिमंडल भेज कर आक्रमक रणनीति अपनाने का संदेश दे ।
पर अब जो भी करना है मजबूती से करना है और स्थाई करना है ।
रुस ईरान इत्यादि के साथ हुई गलती का सुधार भी जरूरी एजेंडा होना चाहिये ।
देश सँकट मे है तो चुनाव और राजनीती संगठन के लोग देखे चाहे सत्ता हो या विपक्ष पर सत्ता के पड़ो पर बैठे लोग और विपक्ष मे बैठे ये जिम्मेदारियां निभा चुके लोग फिलहाल देश बनाने और बचाने के काम मे जुटे ।

बुधवार, 21 अगस्त 2019

वो अकेला बुजुर्ग पडोसी

वो अकेले बुजुर्ग पडोसी
__________________

मेरे पड़ोस में रहते है

वो अकेले बुजुर्ग इंसान

बहुत दिनो क्या सालो से

जानता हूँ उन्हें मैं

और

बहुत अच्छी है उनसे पहचान

पहले उनका घर भरा भरा था

फिर

धीरे धीरे खाली होता चला गया

कुछ चाहे और कुछ अनचाहे

अचांनक अकेले हो गए वो
कभी बैठने लगे मेरे साथ

और बताने लगे

अपनी पूरी बात

पहले

उनके पास बहुत लोग आते थे

जब वो कुछ थे

और बहुत लोग

उनकी उंगली पकड़ कर

क्या क्या हो गए

तब तो हालत ये थी

किसी के घर मौत भी

हुयी हो

तो फोन करता था

की आप जल्दी आइये

अर्थी उठने वाली है

आप का ही इन्तजार है

शादी हो या कुछ

कितने लोग बुलाते थे

वो लोग जो कहते थे कि 

आप का ज्ञान रौशनी देता है

और आप के बिना तो

कार्यक्रम हो ही नहीं

सकता

पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए

अब कोई नहीं आता
कोई नहीं बुलाता

सबको बना दिया

पर ये जहा के तहा रह

गए

जब कोई उनका अपना

धोखा देता या

कर देता पीठ पर वार

तो ये रहते थे बहुत दुखी

और बेक़रार

फिर झाड कर गम की धूल

लग जाते थे फिर उसी काम में

पर

तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो

मैने देखा है

बहुत ही संघर्ष किया उन्होने

पर जब अपने साथ थे

क्या मजाल उनके चेहरे पर

शिकन भी आई हो कभी

लेकिन

बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे

जब से अकेले हो गए वो

उनके बच्चे भी चले गए दूर

अपनी अपनी जरूरी वजहों से

उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ

बहुत प्यार करते है

उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी

पर मजबूरिया अपनी जगह है

ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में

अक्सर देखता हूँ

उन्हें सुबह बाहर निकल कर
लान से

तुलसी की पत्तियां तोड़ते

बताते है

की उनसे अच्छी चाय

कोई नहीं बना सकता है

सेंक लेते है ब्रेड और

काट लेते है कोई फल

हो जाता है उनका नाश्ता

बताते है

की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है

नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा

अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते

मैंने कहा
क्यों खुद करते है ये सब

और इस उम्र में

बोले कसरत भी है
और पैसे की बचत भी

मैंने पुछा की आप को क्या कमी

तो बस मुस्करा कर रह गए

मंगाते है खाना है कभी कभी

शायद दो दिन में एक बार

मैंने पूछा की आप को तो

ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी

बोले खाना ज्यादा होता है

और

फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है

कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है

और

क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में

अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है

मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे

रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा

और

नए नए पकवान खाऊंगा

तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न

और

अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता

और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा

कभी कभी बहुत खुश होते है

जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा

घर की सफाई ,बिस्तर की चादर

और सब तैयारी में लगे रहते है

कई दिन तक

फिर जब तक बच्चे साथ होते है

दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन

बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक

कुछ गुनगुनाते रहते है

और

बच्चो के यहां से आने के बाद भी

कई दिन उदास होते है

तब पूछना पड़ता है क्या हुआ

बोले की एक तो अकेला होने के कारण

न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है

बज जाती है तभी घंटी

कौन देखे की कौन है

और
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है

कभी दूध गर्म करते है

और बाहर कोई आ गया

और दूध गिर जाता है पूरा
चाय भी

कभी सब्जी जल जाती है

तो कभी रोटी खाक हो जाती है

पुछा की फिर क्या करते है आप

बोले अगर दिन में होता है
तब तो हो जाता है

पर जब रात में जल जाती है

तो खा लेते है मुट्ठी भर चना

या अगर ब्रेड है तो वो

नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है

और

बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है

हल्का हल्का

पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना

की मैं भूखा भी सोता हूँ
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है

परेशांन रहने लगेंगे

उन लोगो के खुश रहने

और मस्त रहने के दिन है

उस दिन बहुत दुखी थे

मैंने पुछा क्या हुआ

बोले

पता नहीं मैंने पिछले जन्म में

कितनो के साथ बुरा किया है

की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ

वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है

जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ

और

फिर जोर से ठठाकर हँसे

और चल दिए

मैंने कहा कहा चले

बोले किसी और को ढूढने

जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो

कभी कभी जब बीमार हो जाते है

तो दिखलाई नहीं पड़ते

मिले तो पुछा क्या हो गया था

बोले कुछ नहीं

बताओ और क्या हो रहा है

बहुत कुरेदा

तो बोले मेरा दुःख तो

कोई बाँट नहीं सकता

लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख

तो बाँट सकता हूँ

आइये कुछ अच्छी बाते करे

एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे

मैंने पुछा आज क्या हुआ

बोले एक चिंता है

मुझे कुछ हो गया तो

दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का

कितनी दिक्कत होगी न  बच्चो को
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे

और खुला रखना भी मुश्किल है

और

उनकी आँखों से टपक गया कुछ

बाँध जो रुका था काफी दिनों से

शायद टूटना ही चाहता था

कि

वो इधर उधर देखने लगे

और खांसने लगे

खुद को रोकने को

और मुझे भरमाने को

फिर धीरे से उठ कर चले गए

कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग

मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है

मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ

और

झांक आता हूँ उनके घर की तरफ

लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा 

मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव

और

सुनुगा उनका खोखला ठहाका

और फिर मैं भी सर झुका कर

कुछ छुपा कर चला जाऊंगा

अपने घर की तरफ

जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।

सोमवार, 19 अगस्त 2019

ट्रंक काल


ट्रंक काल

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पहले भी होता था फोन

पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी

सुनते सब थे पास बैठे हुए

बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे

और कार्डलेस भी

पर उससे पहले

लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे

लोगो के यहाँ क्या

शहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां

होते थे फोन

और

वो बहुत रईस होने की निशानी था

गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी

नहीं था कोई फोन

और बुक करनी होती थी ट्रंककाल

बहुत से लोग बुक करते

और बुक करने को लाइन में लगे होते

पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात

नहीं मिलता था फोन तब

जिसका मिल जाता था

वो विजयी भाव ओढ़ लेता था

और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे

ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का

और खाने या सोने चला जाता था

जी हां ट्रंककाल लगना भी तब

ईश्वर की कृपा

और किस्मत की बात थी

जब मिल जाता था फ़ोन

तो चीखना पड़ता था

की आवाज वहा तक पंहुच जाये

कई बार तो हेलो हेलो

आप सुन रहे है न

कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी

कई कई बार में बात हो जाती थी

और

नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल

तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल

जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन

और ४ जी तथा ३ जी

उस थ्रिल को बस

महसूस कर सकते हो

अतीत में जाकर

जरा जाकर महसूसो

और सोचो की

अपनो की जिंदगी

कितनी मुश्किल थी पहले

ट्रिन ट्रिन

मिल गया मेरा ट्रंक काल

तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

मेरा पहला फोन

जब लगा था मेरे घर नया नया फोन
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एक दिन फोन मंत्री मिल गए
और
पूछ लिया घर में फोन है
लागा जैसे कुछ अपराध
या हीनता है
घर में फोन नहीं होना
बहुत मुश्किल से मुह से निकला था
नहीं
हम कैसे रख सकते है फोन
हम तो साधारण आदमी है
कहा से देंगे उसका पैसा
उन्होंने जारी कर दिया एक आदेश
एक कमिटी का सदस्य बनाने का
और
जब आयी थी उसकी चिट्ठी
क्या ख़ुशी थी
जैसे
कितना बड़ा कुछ मिल गया
पिता जी ने
कई लोगो को जाकर बताया था
उसके बारे
कुछ दिन में लगा गया
वो लाल रंग का फोन
ये भी उन दिनों खबर थी
अख़बार के लिए
जानने वालो और
आसपास के मुहल्ले के लिए
मिलने लगी बधाइयाँ
और मांगे जाने लगे नंबर
अपने फोन तो शायद ही कभी आते हो
क्योकि अपनों के पास नहीं थे फोन
पर जब पहली बार घंटी बजी
तो सभी अजीब कशमकश में थे
की क्या करे
पिता जी ने
आगे बढ़कर उठाया था चोगा
बस इतना ही पुछा था
कौन साहब है आप
किसी अपने का फोन था
पूरा परिवार देख रहा था गर्व से
किसी आश्चर्यजनक चीज की तरह
मैंने जब पहली बार उठाया था
तो उठाने से पहले रटता रहा
की हेल्लो कहना है
पर दूसरो के तमाम फोन आने लगे
और बढ़ गयी थी रौनक घर में
कुछ दिन तो
गर्व की अनुभुती होती रही
पर फिर मुसीबत बन गया फोन
जब किसी ने चुपके से
कही बाहर का फोन मिला दिया
और आ गया बड़ा सा बिल
उस ज़माने के हिसाब से
तब ध्यान रखना पड़ता था
की सभी काल को लाक करके रखना है
पर
लोगो के फोन का कोई समय ही नहीं था
अपनी जिंदगी ही अपनी नहीं रह गयी
सुबह से रात तक कोई न कोई
आकार इन्तजार करता था
अपने फोन का
खाना पीना भी मुश्ल्किल
और
अपनी बात करना भी मुश्किल
जी हा
फोन
मुसीबत का सबब भी था तब फोन
पर स्टेटस का सिम्बल था
तो सब कुछ बर्दाश्त करते थे लोग

रविवार, 18 अगस्त 2019

चिट्ठियां

जी
पहले चिट्ठियां होती थी
सूचना
और
सुख दुःख जानने का साधन
चिट्ठियां भी कई तरह की होती थी
इतना खुला था हमारा जीवन
और हमारा समाज
कि
खुले पोस्ट कार्ड पर
सब कुछ लिख कर भेज देते थे लोग
किसी से कोई धोखा नहीं होता था
क्योकि ये सस्ता होता था
पैसा नहीं होता था लोगो के पास
बस भावनाए और जुडाव होता था
एक चिट्ठी ऐसी भी होती थी
जिस पर टिकेट नहीं लगा होता था
वो भेजने वाले तीन तरह ले लोग होते थे
या तो गरीब रिश्तेदार
या दूर पढ़ रहे छात्र
या फिर वो जो चाहते थे
कि
चिट्ठी हर हालत में मिल जाये उसे
जिसके लिए भेजा है
क्योकि डाक टिकेट का पैसा
उसी से लेना होता था
इसलिए डाकिये की मजबूरी थी
पाने वाले के हाथ में चिट्ठी देना
अंतर्देशीय भी था जो बंद रहता था
पर थोडा महंगा
इसलिए या तो
उसका खर्च वहनं कर कर सकने वाले
लिखते थे इसमें
या फिर कोई गोपनीय बात होने पर
लिखा जाता था ये पत्र
गाँव में तो डाकघर और डाकिया
दोनों वाही के होते थे
पर कोई नहु झांकता था
किसी के पत्र में
किसी का पत्र तभी पढता था
जब वो खुद पढने को कहता था
रजिस्टर्ड  डाक तो
खैर विरले ही भेजते थे
खास कारणों से
चिट्ठिय भी तरह तरह की होती थी
किसी के कोने पर थोड़ी सी हल्दी का रंग
तो किसी पर लाल रंग
हल्दी किसी शुख सूचना के लिए
तो लाल रंग
आशिक के दुःख की निशानी था
और ये बताने की कोशिश
की ये खून से लिखा है
गाँव की चिट्ठियों में
सबके हालचाल पूरे गाँव सहित के साथ
गाय बैल उसकी बीमारी
जो बीमार था ठीक हुआ या नहीं
फल गाय या भैस दूध दे रही या नहीं
और कितना दूध दे रही है
कौन कौन पीता है दूध
बाबा भी पीते है या नहीं
और जिसको बच्चा होना है
उसे मिलता है या नहीं
बगीचे का क्या हाल है
कौन कौन से फल कितना लगा है
किस किस खेत की जुताई हो गयी
किस खेत में पानी लग गया
धन रोपा गया या नहीं
और कौन सी फसल कितनी होगी
इत्यादि जरूर होता था
कोई बीमार था गाँव में तो क्या हुआ
किसका इलाज हो रहा है
और मर गया तो कैसे
और
सब सुख दुःख बताने के बाद
और ये बताने के बाद की फल मर गए
सुखा पड़ गया या बाढ़ में सब बह गया
भैस या गाय मर गयी
वो बच्चा पैदा होते ही मर गया
अंत में ये जरूर लिखा होता था
अपना ध्यान रखना 
यहाँ बाकि सब कुछ ठीक ठाक है
पति पत्नी की चिट्ठिय गोपनीय होती थी
इसलिए उनका ब्यौरा भी लिखना ठीक नहीं
सारे आशिक अंत में जरूर लिखते थे
लिखा है ख़त खून से स्याही न समझाना
शहर की चिट्ठिया इतनी मजेदार नहीं होती थी
इसलिए उन पर भी क्या लिखना
हां तार भी होता था
जो बहुत ही भयानक होता था
तार आने का मतलब ही होता था
की कोई जरूर मर गया
तार खोलते वक्त पढने से पहले ही
रोना धोना शुरू हो जाता था घर में
चाहे किसी ख़ुशी को जल्दी से बताने को
भेज दिया हो किसी अपने ने
तार आने की खबर पूरे गाँव में
और
उस समय के शहरी मुहल्लों में भी
बहुत जल्दी फ़ैल जाती थी
और लोग मुह लटकाए आने लगते थे
दुःख बांटने
चिट्ठिय सहेज कर राखी जाती थी
किसी कोने में या किसी संदूक में
एक और रिवाज था
चिट्ठी आने पर
पूरे परिवार को इकट्ठा कर पढने का
पढना भी तो गाँव में कोई कोई ही
जानता था
वही सबकी चिट्ठी बांचता था
अगर दूर रह रहे पति की चिट्ठी
पत्नी के लिए होती थी
तो कुछ पढ़ कर कुछ छोड़ देता था
और कह देता था
की बाकि बात
वो अपनी मेहरारू को बता देगा
और वो आकर बता देगी
तब कुछ ऐसी ही मर्यादाये होती थी
कोई दुःख का समाचार
चिट्ठी बांचने वाले की अचानक
हिलते हुए ओठो और आँखों से
ही पता लग जाता था
क्योकि कुछ पल वो चुप हो जाता था
दुःख दूसरे का था पर सब रोते थे
जसे
पहले लड़की किसी की भी विदा होती थी
पर रोता पूरा गाँव था
फिर रोना पूरा कर वो बांचता था चिट्ठी
कुछ चिट्ठिय छुपा कर भी रख देने का रिवाज था
कुछ घर में षड़यंत्र के कारण
और कुछ हंसी ठिठोली के लिए
इतिहास में तो चिट्ठियों ने
बड़ी बड़ी क्रांतियाँ करवाई है
तो ज्ञान का प्रसार की किया है
बहुत से जाने मने लोगो की चिट्ठिया
तो आज तक रौशनी का काम करती है
अगर प्रकाशित हो गयी है
या पाण्डुलिपि के तौर पर मौजूद है
क्या होता था जब कोई अपना
कही चला जाता था
तो रोज डाकिये का इन्तजार करना
और
अकसर डाकघर तक चले जाना
पूछने के लिए
की
हमारी कोई डाक है क्या
मिल गयी तो नेमत पाने की ख़ुशी
और नहीं तो उदस होकर लौटना
कितना रोमांच था जिंदगी में
बहुत सी चिट्ठिया
असली भावना का प्रवाह होती थी
मन भी भीग जाता था और भावनाए भी
मेरे पास भी है
सहेज कर रखी हुयी कुछ चिट्ठिया
एक अपने पिता की आखिरी चिट्ठी
और कुछ अपने हमसफ़र की
जिन्हें मैं अक्सर पढता हूँ
अक्श उभर आते है हमेशा उनके
जब भी वो चिट्ठियां पढता हूँ
तो काफी दिन का  दर्द
आँखों के रास्ते बह जाता है
जी हाँ चिट्ठिया क्या होती थी
आज के लोग क्या जाने
और क्या जाने
उनके आने के इन्तजार
और
उनको बार बार पढने
तथा सहेजने का मज़ा
हो सके तो चिट्ठिया लिखिए
और न
यी पीढ़ी को लिखना सीखाइए
मोबाइल और फोन अपनी जगह है
और चिट्ठिया अपनी जगह
वाह रे चिट्ठियां