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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

ये लिखना मजबूरी हो गया

आज बहुत मजबूर होकर ये उन लोगो के लिए लिख रहा हूँ और उन बड़ी संख्या में अति उत्साही लोगो के लिए लिख रहा हूँ जिन्होंने कोई संघर्ष और तकलीफ देखा ही नहीं ।समाज के उंच नीच को झेला ही नहीं और इस तरक्की तथा वैज्ञानिक युग में पैदा होने के नाते जिनसे अपेक्षा होती है की वो जातियो को तोड़ेंगे तथा जातियो की बात करने से भी घृणा करेंगे पर जो पिछली शताब्दियों से भी ज्यादा जहरीले जातिवादी होते दिख रहे है । ऐसा लग रहा है कि कट्टरवादी आतंकवादी मुसलमानो की तरह कोई कट्टरवादी जातिवादी जेहाद छेड़ा जा रहा हो ।

हम तो बचपन से लड़ रहे थे की वंचितो को न्याय मिले पर किसी के साथ अन्याय न हो । वंचित में सभी जाति और धर्म की महिलाओ को भी शामिल किया डॉ लोहिया ने और हम लोगो से नारा लगवाया : संसोपा ने बांधी गांठ ,पिछड़े मांगे सौ में साठ : और इस साठ में सम्पूर्ण स्त्री समाज को शामिल किया गया ।

हमने सीखा की घृणा नहीं करना है किसी से पर जो आगे बढ़ गए है उनसे कहा जाय की थोडा धीरे चलो, पर पूरी तरह रुक जाने और मृतप्राय हो जाने को नहीं कहा और जो पीछे छूट गए है उन्हें रफ़्तार दिया जाये और सम्भव समानता लायी जाए ,पर समानता उन समाजो और जातियो तथा धर्मो के अंदर भी लायी जाये ।
पड़ी खड़ी लकीर को पड़ी लकीर बनाना केवल अगड़ी और वंचित जातियो के लिए नहीं सोचा गया था बल्कि वंचितो में भी सभी को और वंचित जातियो में भी सभी को सामान भाव से अवसर मिले ये चिंतन था ।ऊच नीच की खायी को कम किया जाए ये चिंतन था ।

पर घृणा किया जाए और अन्य को खत्म किया जाए या बिलकुल पीछे कर दिया जाए ये चिंतन की बुनियाद नहीं थी ।
पर अब तो दिख रहा है की सबको खत्म कर दिया जाए और हम कुछ लोग सब पा जाये ,सब कुछ पर कब्ज़ा कर ले । ये चर्चा बंद कमरो में होती रणनीति बनाने को तो भी अलग था ,खुले आम एलान देकर चट्टी चौराहे और हर सार्वजानिक फोरम पर डुगडुगी पीट कर हो रही है ।

ये तब है जब आज जो पहले दबंग थे अब डरे रहते है ,जो पहले शासक थे अब शोषण के शिकार और याचक बने है और समाज की प्रकृति पूरी तरह उलट चुकी है ।

क्या हम जैसे लोग छले गए ? क्या हमने अपने पैरो पर खुद कुल्हाड़ी दे मारी ?क्या हम सिद्धांतो की आड़ में लोगो का हथियार बन गए सिद्धांतो के ही खिलाफ नहीं बल्कि मानव जाती और सम्पूर्ण समाज के खिलाफ ? बहुत से प्रश्न यक्षप्रश्न बन कर खड़े है ।

और इस सच्चाई से भी नकारने और सिर्फ जाती के नाम पर बाकि सबसे घृणा करने की आत्मघाती कोशिश नहीं करनी चाहिए की समानता और वंचितो के लिए लड़ने वाले सभी महापुरुष अगड़े और सुविधा सम्पन्न लोग थे ,पुराने इतिहास में देखे या नए में महात्मा गांधी से लेकर  डॉ लोहिया,जयप्रकाश ,आचार्य नरेन्द्र देव राजनारायण मधु लिमये सहित सैकड़ो लोग ।इन लोगों ने समाज में चेतना फ़ैलाने के लिए और वंचितो को जगाने के लिए अपने को दाव पर लगा दिया ।
इस देश में राजनारायण जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने जोतने वालो को खुद अपने खेत दे दिया और वही पहले थे जो हजारो दलितों को लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर में घुसे और उसके से संघियो ,पंडो और पुलिस ने उन्हें मिल कर पीटा था पर वो रुके नहीं और जिंदगी के अंतिम दिन तक लड़ते रहे सिद्धान्तों के लिए । पर आज उनको साल में एक माला और उनके लोगो को गाली तथा उपेक्षा ।उनके लोगो को ठोकर मारी जा रही है और उनसे घृणा करते हुए खत्म किया जा रहां है तो मानव स्वाभाव का चिंतन का भाव और आत्मरक्षा तथा स्वाभिमान की रक्षा के प्रति चैतन्य हो जाना स्वभाविक ही है और आत्मरक्षा तथा आत्मसम्मान की रक्षा का अधिकार तो सनातन काल से दिया गया है ।

खैर भारतीय समाज की बड़ी विशेषता है की जब भी किसी ने भी समाज का संतुलन बिगाड़ा और अपनी मर्यादाये पार किया या तानाशाही और अहंकार पूर्ण व्यवहार शुरू किया इस सम्पूर्ण समाज ने उसे सबक देने और किनारे लगाने का काम किया ।ये कल भी हुआ था ,ये आज भी होगा और कल भी होता रहेगा ।

शायद कुछ लोग खुले आम गालिया देना और घृणा करना बंद करे ,शायद कुछ लोग सार्वजानिक तौर पर जातिगत जेहाद छेदना बंद करे इस उम्मीद के साथ ।

या फिर मुझे भी खुलेआम गाली दें जो वो कर ही रहे है सबके साथ ।

बुधवार, 2 मार्च 2016


मैंने प्रारम्भ में जो कवितायेँ लिखी है उन्हें जला देना पड़ेगा वर्ना मुझे देशद्रोह में जेल भेज देगा संघ परिवार ।
आज़ादी और लोकतंत्र तथा शांति से जीने के लिए चाहिए आई एस और संघ मुक्त भारत ।

आज अनोखा नाटक था :सलाखों के पीछे : मेरे मित्र सुशिल सरित का लिखा हुआ । जेल में बंद कैदियों की कहानी और उनके अंदर की आवाज ,विसंगतियां भी और कानून ,न्याय तथा समाज और देश पर सवाल उठती हुयी । बिलकुल पहली बार अभिनय करने वाले कलाकार जबकि अधिकांश के साथ ऐसा लगा नहीं की पहला नाटक है ।
बल्कि उड़ीसा से आकर 20 साल के एक कैदी की भूमिका करने वाले एक वर्तमान ए आर टी ओ ने तो जब अपनी बेटी को याद करना शुरू किया तो मुझे तो इतना रुला दिया की जब मुझे नाटक के अंत में नाटक पर बोलने के लिए मुझे बुलाया गया तब तक भी मैं सम्हल नहीं पाया था ।
बहुत शानदार था नाटक और ये संदेश देता हुआ की पहली और आकस्मिक गलती पर सजा मत दो बल्कि सुधार का और नया जीवन जीने का मौका दो ।

पाकिस्तान की सीमा पर लाश पड़ी है अपने जवान की और कोई पाकिस्तान से गले मिल रहा हो और कोई पाकिस्तान पर वाद विवाद कर रहा हो ।
बड़ा गद्दार कौन ????

मोदी जी और बीजेपी के जुमलों और नारो की तरह आज का बजट भी छलावा और जुमला ही है और दिशाहीन बजट है ।
दो वर्ष से कुछ बड़े पूंजीपतियो की तिजोरी भरने वाली सरकार ने किसानो और मध्य वर्ग को जुमला देकर उस पाप से मुक्ति चाहा है ।
ये सरकार अभी तय ही नहीं कर पायी है की वह देश की अर्थ व्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहती है ।
दो साल में विदेश व्यापार करीब 18 % घट गया तो कृषि उत्पादन वृद्धि जो पिछली सरकार में 4.1% रहती थी वो 1/2 % हो गयी है और इन्ही का आर्थिक सर्वे बता रहा है की किसान की आमदनी 20 हजार रुपया प्रति वर्ष है यानी करीब 1600 रुपया महीना उसे पाँच से में दोगुना करने का वादा किया गया है पर आधा प्रतिशत वृद्धि के ये दावा केवल छलावा है ।
गामीण सड़को के लिए 4000 करोड़ रखा गया है ।इतने कम पैसे से क्या होगा ।
दूसरी तरफ शिक्षा और स्वस्थ्य इत्यादि के बजट से कटौती जारी है ।
मनरेगा इत्यादि में भी बढ़ोतरी मामूली है ।
आयकर के छूट के अपने पुराने वादे से सरकार फिर पीछे हट कर वादाखिलाफी कर गयी है ।
जो छूट स्वाभाविक तौर पर जनता को मिलनी चाहिए थी और जिन पर विपक्ष में रहने पर बीजेपी हमलावर रहती थी वो जनता को नहीं देकर भी धोखा ही दे रही है जैसे पेट्रोलियम और जिंस के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार घटने पर भी जनता को उसका लाभ नहीं दिया जा रहा है ।
ये बजट बस छलावा है ।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

क्या मिला है किसी भी देश के चरमपंथियों को आजतक कुछ बेगुनाहो की हत्या कर के और देशो को युद्धों से ही क्या हासिल।हुआ है तबाही के सिवाय ।इतिहास और अनुभव तो यही बताता है की कुछ भी हासिल नहीं हुआ है तो फिर ये सब क्यों जारी है लगातार ।
बहुत हो गया अब बंद होना चाहिए शैतानियत का ये तमाशा ,मौत का खेल और खून की ये होली ।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

भारत का लोकतंत्र सबसे असफलतम प्रधानमन्त्री के नीचे कराह रहा है |इतनी दिन में ही मोदी जी की असफलता ,अज्ञानता और हीन भावना तथा अल्पदृष्टि सामने आ चुकी है जिसे ढकने के लिए इनका थिंक टैंक और संघ मिल कर नए नए सस्ती लोकप्रियता के आयोजन कर और इवेंट मैनेजमेंट कर जनता का ध्यान इनकी असफलतावो और वादा खिलाफी से हटाना चाहते है ,,पर अगले ६ महीने में ये सभी चीजें जनता में नफ़रत पैदा करने लगेगी |
इसलिए बस जरूरी ये है की हर वक्त सिद्धांतो ,,पर खास कर ,भारत के इतिहास और अस्मिता से जोड़ कर इन्हें कठघरे में खड़ा किया जाये | तब ये बौखालायेंगे और और बड़ी गलतियाँ करेंगे तथा लोकतंत्र पर हमला करने की कोशिश करेंगे और वही अवसर लोकतान्त्रिक शक्तियों के खड़े होने का होगा |
देखे कौन कौन क्या करता है ?? ये भी मेरा राजनीती शास्त्र के विद्यार्थी के रूप में व्यक्तिगत बयांन है |
फर्जी आंकड़े और हवाबाजी तथा उसकी आड़ में मोटा घोटाला करने में प्रशासन तंत्र को महारत हासिल है ।रोज करते है और कल भी ऐसा ही कुछ करेंगे ।
इनका राज जानना है की ये हर प्रधान मंत्री ,मुख्यमंत्री और मंत्री को कब्जे में कैसे ले लेते है और फिर हारने के दिन तक नहीं निकलने देते है ।
हारने के बाद पहचांनते ही नहीं है ।
आप इनसे जायज काम भी बिना घूस दिए नहीं करवा सकते । आप दे दो तो कानून और नियम की दूसरी व्याख्या और न दो तो बिलकुल उलट व्याख्या ।
या फिर इनका बड़ा नुक्सान करने की ताकत हो आप में ।
देश की आज़ादी इन्ही के लिए आई और राजा खत्म हो गए पर लोकतन्त्र में ये नए उनसे ज्यादा आततायी और मजबूत तथा उनसे ज्यादा बुराइयो से युक्त राजा पैदा हो गए है और भारत इनके जुल्मो से और भरस्टाचार से कराहने लगा है ।
नेहरू जी ने सबसे बड़ा पाप इनको 1947 में 15 अगस्त को ज्यो का त्यों स्वीकार कर के किया था और वो आज़ादी के बाद की सबसे बड़ी भूल थी जिसका खामियाज़ा देश पता नहीं कब तक भुगतेगा ।
पता नहीं कब कोई पैदा होगा इंदिरा गांधी की तरह जिसने राजाओ की हैसियत को खत्म किया था और बो इन राजाओ को खत्म करेगा ।
राजनैतिक आकाओ की अपने प्रति हींन भावना तथा इन लोगो के प्रति कॉम्लेक्स कब ख़त्म होगा ।
#OROP जींद की सैनिको की रैली ने मोदी के पक्ष में पहला माहौल बनाया था और वहा साहेब ने वन रैंक वन पेंशन की बात कहा था और सरकार बनते ही कर देने का वादा किया था |
पर आज डेढ़ साल से अधिक हो गया और साहेब भूल ही नहीं गए बल्कि इदेश के लिए जिंदगी देने वाले लोग महीनो से जंतर मंतर पर बैठे है चाहे मौसम कैसा भी हो और सरकार के पास इनके लिए समय नहीं है |
कितना शर्मनाक है की देश के लिए ]बहादुरी से लड़ने वालो पर घूसखोर कायरो से लाठियां चलवाई गयी |
अपने सैनिको की इज्जत न करने वाली सरकार को धिक्कार है |
कुछ देश के साथ द्रोह तथा जनता के साथ वादा द्रोह करने वालो के कर्मो और संकुचित विचारो के विरोध को हिन्दू विरोध बता कर इनके कुकर्मो को ढकने की भरपूर कोशिश हो रही है |
इन मुट्ठी भर का विरोध १२०.९९ करोड़ महान हिन्दुओ का जो इनके विचारो के खिलाफ है और इंसानियत तथा हिंदुस्तानियत में में यकीन करते है उनका विरोध कैसे हो जाता है |
अब ऐसा भी मजाक मत करो भाई लोग |

सोमवार, 21 सितंबर 2015

कृपया महान नेता जी सुभाषचंद्र बोष को बदनाम मत करिये और उनको कायर तो किसी हालात में मत सिद्ध करिये ।

जो व्यक्ति इतनी बड़ी ब्रितानिया सरकार से नहीं डरा बल्कि बिना साधनो के फ़ौज खड़ी कर दी और इतने राष्ट्रों को साथ खड़ा कर लिया तथा भारत की भूमि पर झंडा फहरा दिया , जो भारतीयो के दिलो पर राज करता था ।

अगर वो जीवित होते तो छुपते नहीं बल्कि देश के किसी कोने से भी आवाज लगा देते की मैं यहाँ हूँ तो करोडो देशवासी उधर ही दौड़ पड़ते और पूरा देश उन्हें सर पर उठा लेता ।

और किस देश की आज़ादी के बाद आज़ादी के लिए लड़ने वालो को युद्ध अपराधी कह कर किसी देश को सौपा गया है कि ये मुद्दा जेरे बहस हो ।

बल्कि मेरा विश्वास है की तत्कालीन सभी नेता भी उनकी अगवानी में खड़े हो गए होते क्योकि वो आदर्शो का युग था और संघर्ष का साथ खून के रिश्तों से भी पक्का और मजबूत होता है ।

इसलिए मेरी विनती है की अपने को नेताजी का कहने वाले या उनको बिलकुल नहीं जानने वालो दोनों लोग ही मेरी जिंदगी के पहले आदर्श और नेता को बदनाम न करे और कायर सिद्ध न करे ।

देश ,समाज और जनता को इतिहास और आदिकाल के मुद्दों पर उलझा कर रखो और उन्ही पर विवाद चलाते रहो ताकि वर्तमान पर चर्चा न हो और भविष्य की चिंता न हो और आप जो चाहे निर्द्वंद करते रहे।

किसी हालात में भूख ,गरीबी ,अशिक्षा ,बेकारी और बीमारी सहित किसान ,मजदूर और बेरोजगार नौजवान पर बात न हो ।

बल्कि इनका गुस्सा न फुट पड़े इसलिए इन सभी को इतिहास में अपने अपने गौरव तलाशने को मजबूर करते रहो और आपस में बांटते रहो

पर कब तक ? कभी तो ये सभी समझ जायेंगे इस चाल को और मिलकर खड़े हो जायेंगे सरोकारों पर सरकारो को सोचने और करने के लिए ।

बुधवार, 2 सितंबर 2015

मैं वर्षो से कह रहा हूँ की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारत के संविधान को नहीं मानता तथा लोकतंत्र को नहीं मानता बल्कि हिटलर के शासन को आदर्श मान वही स्थापित करना चाहता है ।

आज फिर सिद्ध हो गया ।

वर्तमान केंद्र सरकार देश की जनता के भावनात्मक वोट से बनी है और सरकार की जवाबदेही केवल भारत और इसकी जनता के प्रति है ।

ये संघ के प्रति जवाबदेही देश का देश के स्वतन्त्रता संग्राम का जिसमे संघ ने गद्दारी किया था तथा भारत के संविधान का और भारत की महान जनता का अपमान है ।

क्या सोचता है भारत ?

कृपया संघी जवाब नहीं दे ।

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

आर एस एस पूरी तरह मौका पाते ही अपने भविष्य की रणनीति पर लग गया है ।

जहा बाकी दल कुछ लोगो या जातियो के चक्कर में पड़े है संघ लोकतंत्र के हर खम्भे में अपने लोगों को भेजने ने लगा है ।

1977 में मीडिया में अपने लोगो को घुसाया तो आज पूरा मिडिया संघी हो गया ।

राज्यपाल से कुलपति तक और शिक्षा नीति निर्धारक  से शिक्षक तक बनाया तो वहां पौधशाला तैयार हो गयी ।

सरकार बनाते ही सभी मंत्रियो को जबरन ओ एस डी से लेकर ए पी एस तक संघ के स्वयं सेवक थमा दिए गए तो इतिहास ,संस्कृति और साहित्य से लेकर शिक्षा और फ़िल्म तक संघी बैठाये जा रहे है ।

अब नयी बात पता लगी -

संघ ने कोचिंग खोल दिया है संकल्प के नाम से जहा आई ए एस से लेकर हर तरह के नौकरशाह तैयार किये जा रहे है ,जज तैयार किये जा रहे है ।

और

शारीरिक मेहनत के साथ तैयारी करवा कर संघी फ़ौज की तीनो शाखाओ और पुलिस में जहा संभव है भेजे जा रहे है ।

वाकी नेता और दल केवल देश बचाने का भाषण दे रहे है और फासीवाद अपनी जडे ज़माने में पूरी ताकत से लगा है।

मैं तो लोकतंत्र का चौकिदार हूँ इसलिए आवाज लगा दे रहा हूँ की जागते रहो ।

जागो या मत जागो आप की मर्जी ।

बुधवार, 19 अगस्त 2015

पुराने ज़माने से हमें सिखाया गया की राजनीती और शासन में लोकलाज बहुत महत्वपूर्ण है और ये भी की जनभावना का आदर किये बिना नहीं चला जा सकता ।
जनभावना वाले सवाल पर मेरा एतराज था की लीडर को लीड कर करना चाहिए और चाहे जितना नुकसान हो जाये समाज के साथ भावना में बहने लगने के स्थान पर सही स्टैंड पर कायम रहना चाहिए ।

पर लोकलाज का मैं समर्थक हूँ ।

लेकिन बहुत अफ़सोस के साथ लिख रहा हूँ की बहुत से बड़े लोगो ने ही लोकलाज को ताक पर रख देने का जैसे बीड़ा ही उठा लिया है और वो समझ ही नहीं रहे है की आज का समाज कहा पहुँच गया है और उनका कदम और वक्तव्य आत्मघाती है ।

पर मुझे क्या । अदना सा आदमी हूँ । लिख कर कर्तव्य पूरा कर दे रहा हूँ ।

कोई खास सन्दर्भ नहीं बस यूँ ही ।

अंधभक्त कैसे भी हो राजनीतिक जातिगत धार्मिक या सामाजिक और किसी के भी हो वो लोकतन्त्र को बर्बाद करते है और विकास के रस्ते को भी अवरुद्ध करते है ।
सबकी बात कर रहा हूँ ।स्वस्थ और खुली बहस और गलत के खिलाफ जब चुनौतीपूर्ण अलीचना बंद हो जाती है तो आप जिसके भी भक्त है उसे तानाशाही पूर्ण व्यवहार करने की तरफ खुद धकेल रहे होते है ।
(आज के चिंतन से और चिंता से )

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

हमें पता है भक्त अंधे है और नहीं होते तो आज़ादी की लड़ाई के खिलाफ गद्दारी ही क्यों किया होता ।

हमें पता है की अन्धो को आईना दिखाने का कोई फायदा नहीं पर सच और इन्साफ के लिए तथा इंसानियत और हिन्दुस्तानियत बचाने के लिए, लोकतन्त्र और संविधान की रक्षा के लिए हम चीखते भी रहेंगे और व्यवस्था के मेज पर हथौड़े भी पटकते रहेंगे ।

शायद अन्धो को एहसास हो ही जाये की वो गलत है ।

सोमवार, 17 अगस्त 2015

#मोदी साहेब आप #पाकिस्तान से #युद्ध करेंगे पर #चुनाव के फायदे के लिए ठीक उसके पहले और मैं आज ही निर्णायक युद्ध चाहता हूँ ।

मेरे जवान यूँ ही खड़े खड़े शहीद हो जाये मुझे मंजूर नहीं बल्कि वो लड़ कर शहीद हो और 100 /100 को मार कर शहीद हो ये मैं भी चाहता हूँ और देश भी चाहता है ।

पर आप जवानो को खड़े खड़े मारने दोगे और चुनाव का इन्तजार करोगे मैं जानता हूँ ।

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

आर एस एस वाले डींग हांकते है की अगर वो अच्छे नहीं है तो नेहरू जी ने उन्हें 26 जनवरी में क्यों बुलाया ।

आज़ादी ली लड़ाई में गद्दारी गांधी जी की हत्या का जख्म बहुत गहरा था पर नेहरू जी प्रगतिशील डेमोक्रेट और बड़े दिल के आदमी थे ।

उन्होंने प्रयास किया की शायद संघ आज़ादी का और देश का अर्थ समझ सके और 26 जनवरी को देख कर उनका दिल बदल सके और वो अपना पुराना सोच और रास्ता छोड़ कर मुख्य धारा में शामिल हो जाये ।

पर अफ़सोस नेहरू की आत्मा आज रो रही होगी

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

हिंदुस्तान क्या सचमुच तमाशे का देश है । लोगो से कहो की चलो बिजली पानी भुखमरी गरीबी नौकरी और हक़ के लिए लड़ें । कोई नहीं आता ।आपातकाल लगा लाखो बंद हो गए पर एक कुत्ता नहीं भूंका ।
तमाशे के लिए घंटो खड़े रहते है हजारो ।क्रिकेट मैच में देश भर में कर्फ्यू लग जाता है ।कई टीवी सीरियल में भी कर्फ्यू लगता रहा है । फ़िल्मी तमाशो को देखने को लोग सर फट जाये पर लाइन में लगे रहते है ।
कुछ लोग ये समझ गए है की इस देश में कोई गंभीर विमर्श पर बात मत करो , गंभीरता से कुछ मत करो बस तमाशे करो लोग भी खुश और हम भी खुश ।
कल भी होगा एक तमाशा और चुनाव से पहले एक सीमा पर भी होगा ।उसका खामियाजा गरीब उठाएगा तो उसके लिए दस लाख ,कुछ मालाये और फ़िल्मी डायलोग और देशभक्ति के फ़िल्मी गाने मौजूद है ।
हमने तो सुना था की भारत विश्व गुरु था । किस चीज का तमाशो का ??
अज़ब बौद्धिक दिवलिया हो गया है देश और गंवार को  कोई शक शुबहा नहीं सब ग़लतफ़हमी और आँखों पर चश्मे विद्वानों के ही है ।
हे मर्यादापुरुषोत्तम राम जिसने बाप के आदेश पर देश छोड़ दिया और एक देश जीत कर भी कब्ज़ा नहीं किया बल्कि वही के उचिट व्यक्ति को सौंप दिया ,हे बड़े दिन और दिमाग वाले कृष्ण जिसने कुछ अपने लिए नहीं किया सब दूसरो के लिए किया और बडी सत्ताओ से टकरा गया और जो समपूर्ण प्रेम का प्रतीक था और हे शिव शकर जिसका न आदि है न अंत है और जिसने प्रेम किये तो परवाह नहीं किया और क्रोध किया तो परवाह नहीं किया बल्कि हर चीज से सम्पूर्ण न्याय किया आप तीनो बताओ मैं इस हालात में मैं क्या करूँ ?
समझने वाले ही कमेंट करे प्लीज़ ।
पापियो से भगवांन भी डरने लगा है । उन्हें जमीन पर सजा नहीं और नर्क में भी उनके लिए हाउसफुल का बोर्ड लगाये है । अच्छे लोग इन्हें झेल कर परेशांन है ।
अपने आसपास देख लीजिये ।
कबीलों और जंगल के कानून को छोड़ दें तो दुनिया के किसी भी कानून में दादा परदादा के द्वारा किये गए अपराधो या उनके अन्य कर्मो का दोषारोपण पोते और परपोते पर नहीं किया जाता और न उसके लिए उन्हें सजा दी जाती है ।
तो फिर पता नही मेरे दादा और परदादा ने कुछ गलत किया भी था नहीं पर मुझे दोषी ठहरा कर उन दोषों की सजा क्यों दी जाये आज जबकि मैं तो कुछ भी गलत नहीं कर रहा हूँ ।
क्या इसी तरह सभी राजाओ के वारिसो और जिस जिस ने कुछ भी कभी गलत किया था उनके वारिसो को ढूढ़ कर उन्हें सजा देने का भी कभी मांग और अभियान चलेगा मेरे देश में पढाई का स्तर बढ़ने के साथ और सत्ता तथा प्रशासन में ताकत मिलने के साथ ।
किसी भी भ्रस्ताचार से बड़ा धर्म और जाति के आधार पर घृणा और नफरत तथा उपेक्षा का भ्रस्ताचार है क्योकि ये मानवता पर और मानव की स्वाभाविक स्वतन्त्रता पर जबरदस्त हमला है ।
हम अपना वोट आप को नहीं देंगे क्योकि आप हमारे धर्म या हमारी जाति के नहीं हो ।

आप शिक्षित हो ,ज्ञानी हो ,गुणी हो ,कोई गलत काम नहीं करते बल्कि केवल अच्छे काम ही करते हो और अपने गुणों के कारण हमारा ,समाज का और देश का बहुत भला कर सकते हो पर --

वाह रे लोकतंत्र और वाह रे आज़ादी । शायद भगत सिंह फांसी सिखों के लिए चढ़े और आज़ाद तथा बिस्मिल ब्राह्मणों के लिए शहीद हुए ।सुभाष कायस्थो के लिए और गाँधी जी बनियों के लिए लडे ।