अगर कोई व्यक्ति थोड़े से पैसो के लिए बार बार संसथान और नौकरी बदलता हो ,कोई दुकानदार या व्यापारी बार बार बार बात और भाव बदलता हो दिन में कई बार ,कोई अफसर समय के साथ बार बार व्यवहार और आका बदलता हो और जनता सत्ता के साथ किसी के यहाँ जाने लगे हो उसे माला पहनने लगती हो और दूसरे को पहचानना बंद कर देती हो तो इन्हें क्या बदलू कहें ,सबका अलग अलग बताइए । इनका यह व्यव्हार नैतिकता की सीमा में गलत है या सही ?
समाज हो या सरकार, आगे तभी बढ़ सकते हैं, जब उनके पास सपने हों, वे सिद्धांतों कि कसौटी पर कसे हुए हो और उन सपनों को यथार्थ में बदलने का संकल्प हो| आजकल सपने रहे नहीं, सिद्धांतों से लगता है किसी का मतलब नहीं, फिर संकल्प कहाँ होगा ? चारों तरफ विश्वास का संकट दिखाई पड़ रहा है| ऐसे में आइये एक अभियान छेड़ें और लोगों को बताएं कि सपने बोलते हैं, सिद्धांत तौलते हैं और संकल्प राह खोलते हैं| हम झुकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं और कहेंगे, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा|
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रविवार, 28 अप्रैल 2013
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
मुख्यमंत्री
अखिलेश यादव का बड़ा और कडा फैसला । अमरीका के सारे कार्यक्रम रद्द कर
दिया कडा सन्देश । किसी हिंदुस्तानी का अपमान बर्दाश्त नहीं । केवल मुसलमान
होने के कारण किसी का अपमान बर्दाश्त नहीं । अखिलेश यादव ने लोहिया वादी
होने का धर्म निभाया । डॉ लोहिया भी मानव अधिकारों के बड़ी लड़ाइयाँ लड़ी थी ।
अखिलेश यादव से पहले किसी नेता ने इतना कद रुख अपना लिया होता तो डॉ ए पी
जे कलाम ,शाहरुख़ खान ,मीरा शंकर ,जोर्ज फर्नांडीज का अपमान नहीं हुआ होता
और आज भी उत्तर प्रदेश के मंत्री आज़म खान का अपमान नहीं होता ।
अखिलेश यादव ने सच्चे हिंदुस्तानी का धर्म निभाया ,बधाई अखिलेश ।
अखिलेश यादव ने सच्चे हिंदुस्तानी का धर्म निभाया ,बधाई अखिलेश ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
कई
दिनों से देश में चर्चा है चीन के द्वारा भारत की जमीन पर कब्ज़ा करने के
बारे में । पता नहीं तथकथित रास्ट्रवादी तत्त्व किस बिल में घुस गए है या
फिर जमाखोरी ,मिलावट ,मुनाफाखोरी और कालाबाजारी से फुरसत ही नहीं मिली होगी
ये जानने को और इसपर कुछ करने को ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
हिटलर
को आदर्श मानने वाले लोग असहमति सुनने के आदी नहीं है और वे अपने को सब पर
थोपना चाहते है । पर हिटलर के लिए भारत में कोई सम्भावना नहीं है ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
आप
चीन ,पाकिस्तान ,बंगला देश ,म्यामार ,अफगानिस्तान ,श्रीलंका ,सभी जगह 20 /
30 किलोमीटर घुस जाओ । सभी देशो का बयांन आएगा की स्थानीय समस्या है और वे
चुपचाप आप के स्वागत में तालियाँ बजायेंगे ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
अबकी
बार कोई दिल्ली में या संसद में घुसा तो हमारे प्रधानमंत्री जी सैनिको को
हटा देंगे औए वार्ताकारो को आगे कर देंगे क्योकि ये छोटा सा स्थानीय मुद्दा
जो होगा ।ग्रेट पी एम् ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
कही
ये कोई चुनावी ड्रामा तो नहीं ,ऐसा ही लगता है प्रधानमंत्री जी के बयांन से
। हम आप तो सीमा पर जा नहीं सकते इसलिए असलियत भी नहीं मालूम । कही चुनाव
के समय फायदा उठाने की कोई पटकथा तो नहीं लिखी जा रही है ????? और हम लोग
जुट गए हैं राशन पानी लेकर ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
बुधवार, 24 अप्रैल 2013
चीन
1962 से हमारी हजारो वर्ग मील जमीन दबाये बैठा है । तिब्बत पर कब्ज़ा कर
लिया ।डॉ लोहिया ने चीन के आक्रमण से काफी पहले ही देश और तत्कालीन
प्रधानमंत्री नेहरू जी को चेतावनी दिया था की चीन के झांसे में न आये वो
आक्रमण करेगा ,फिर भी सरकर हिंदी चीनी भाई भाई के नारे में उलझी रही ।पिचले
आठ साल से मुलायम सिंह यादव भी लगातार चीन से चौकन्ना रहने की बात कर रहे
है पर वो जब चाहे जहा पहुच जाता है और सरकार सोती रहती
है । चीन पाकिस्तान तक सड़क और हमारे सागर में अड्डे बना रहा है । अरुणाचल
सहित हमारे कई हिस्सों को अपना बताता है । अब 10 किलोमीटर घुस आया और कह
रहा है की वापस नहीं जायेगा । कैलाश मानसरोवर उसक कब्जे में है । क्या करना
चाहिए । क्या वो शक्तियां जो देश के अन्दर धर्मस्थलो के लिए लड़ाई करवाती
है ,क्या वे वैसा ही माहौल पाकिस्तान में मौजूद ननकाना साहब और चीन में
मौजूद कैलाश मानसरोवर पर कब्ज़ा करने के लिए बनाने को तैयार है ।
अगर हाँ तो मैं विश्वास दिलाता हूँ की पूरा देश जिसमे हिन्दू, मुस्लिम , सिख, इसाई सभी होंगे इसमें साथ होंगे पर आप बहादुर लोग आगे तो बढ़ो एक बार हिम्मत कर के ।
ये तो अलग लोगो के लिए अलग शिक्षा और जनता के लिए चिंतन का विषय दिया था मैंने पर सचमुच देश के जागरूक लोग क्या बता सकते है की देश को क्या करना चाहिए ??? क्या देश की सरकारों ने इस विषय पर गंभीर रुख नहीं अपनाया बल्कि कम चलाऊ बयानों से और कागजी विरोध प्रदर्शन से ही काम चलाया है आज तक ? क्या अब की बार भी असफल रहने पर केंद्र सरकार और कोंग्रेस को देश को माफ़ करना चाहिए ?
विषय गंभीर है इसलिए देखता हूँ की कितने लोग और क्या कहते है ?
अगर हाँ तो मैं विश्वास दिलाता हूँ की पूरा देश जिसमे हिन्दू, मुस्लिम , सिख, इसाई सभी होंगे इसमें साथ होंगे पर आप बहादुर लोग आगे तो बढ़ो एक बार हिम्मत कर के ।
ये तो अलग लोगो के लिए अलग शिक्षा और जनता के लिए चिंतन का विषय दिया था मैंने पर सचमुच देश के जागरूक लोग क्या बता सकते है की देश को क्या करना चाहिए ??? क्या देश की सरकारों ने इस विषय पर गंभीर रुख नहीं अपनाया बल्कि कम चलाऊ बयानों से और कागजी विरोध प्रदर्शन से ही काम चलाया है आज तक ? क्या अब की बार भी असफल रहने पर केंद्र सरकार और कोंग्रेस को देश को माफ़ करना चाहिए ?
विषय गंभीर है इसलिए देखता हूँ की कितने लोग और क्या कहते है ?
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013
अपने साथियों को बांध कर उनकी लगाम पकडे रहने वाली ,अपने कर्मो के कारण दहशत में जीने वाली ,दिन रात केवल नोट गिनने वाली ,चारा डाल डाल कर लोगो को भाई बनाने वाली एक दौलत की बेटी को आज अपना कल बहुत जोर से याद आया और बहक गयी । है कोई डाक्टर इसके लिए ? ये कौन है ? अरे ये मिशन के लिए काम करने वाले की बेटी जैसी पर उसके विपरीत आचरण करने वाली । अभी नहीं समझे तो जाओ मैं नहीं बताता ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
समाज और देश में एक सन्नाटा सा क्यों है ? किसी तूफ़ान की आहट तो नहीं ? फिर बदल ही जाओ वो सब लोगो जिनके खिलाफ तूफ़ान अन्दर अन्दर उफान ले रहा है । क्या ख्याल है सब दोस्तों का ?
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
गुरुवार, 18 अप्रैल 2013
मायावती ब्राह्मण ब्राह्मण खेल रही है ,है और कोई इस खेल का खिलाडी ?
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
बुधवार, 17 अप्रैल 2013
नदियों की सफाई के लिए उत्तर प्रदेश के सिचाई विभाग ने 6000 करोड़ रूपया जारी किया है । इसमें आगरा की यमुना नहीं है । जिस दिन जारी करने का बयां आया उसी दिन मैंने सिचाई के प्रमुख सचिव से बात किया । अब पत्र दे रहा हूँ की आगरा में ताजमहल से एक किलोमीटर पूर्व से कैलाश तक यमुना की भी सफाई करवाया जाये ।अंतररास्ट्रीय शहर है और जबरस्त पेय जल संकट से भी जूझ रहा है । यदि बरसात से पहले ही इतनी दूर की [ desalting ] सफाई हो जाये तो करीब 6 फुट तक जमा पोलिथिन इत्यादि साफ़ हो जाएगी । यमुना में इतनी बड़ी झील बन जाएगी और बरसात के बाद एक तरफ पेय जल संकट ख़त्म होगा ,दूसरी तरफ ताजमहल की सुरक्षा और खूबसूरती दोनों बढ़ेगी । तीसरा पानी को ताल मिलेगा तो वाटर लेबल बढेगा ,जीव जन्तुओ को जीने का माहौल मिलेगा । देखे क्या होता है । पर चुने हुए लोगो को फुर्सत ही नहीं है इन चीजो को जानने और इनके लिए प्रयास करने के लिए ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
मंगलवार, 9 अप्रैल 2013
आगरा में कल रात 12 बजे से आज इस वक्त तक कुल
करीब 15 घंटे की बिजली कटौती हो चुकी है । इनवर्टर भी जवाब दे गए ।
मोमबत्ती और पेट्रोमेक्स घरो में रहे नहीं हाथ का पंखा भी नहीं कैसे
सोयेंगे सभी । तीन साल पहले मायावती बिजली एक प्राइवेट कंपनी टोरेंट को
दिया था । तब वादा किया गया था की एक साल बाद आगरा के लोग जेनरेटर ,इनवर्टर
और स्तेब्लाइजर भूल जायेंगे । इस कंपनी को देने से पहले कभी दो घंटे से
ज्यादा बिजली गयी नहीं और आगरा त्राहि त्राहि कर रहा है । उस सरकार के खिलाफ हमने भी कहा था की ये सरकार गयी तो टोरेंट गयी पर ---
हम उत्तर प्रदेश के लोगो को जो बिजली सामान्य हालत में करीब चार रुपये पड़ती है वाही बिजली हम टोरेंट को 1 रुपये और 80 पैसे में देते है । टोरेंट वही है 4 .450 रुपये में देता है । पीक टाइम में बिजली हमें 8 / 9 रुपये भी पड़ती है हम फिर भी टोरेंट को 1.80 में ही देते है । पर एक सीमा के बाद टोरेंट को बिजली 5.50 में मिलेगी । अतः वो बिजली काट कर अपना बिजली खर्च उस सीमा के नीचे ही रखता है ।
प्रदेश को इनसे केवल एक फायदा हुआ है की आगरा में नौकरी करने वाले सभी कर्मचारी और अधिकारी चले गए तो उनका खर्च बच गया ।बाकि हिसाब तो सरकार ही दे सकती है । पर जनता हमसे बहुत नाराज है ।
क्यों नाराज है ? क्योकि जब भी ये घंटो बिजली काटते है तो लोगो को बताने लगते है की बिजली लखनऊ से सरकार काट रही है ।
हम हजरों करोड़ की सब्सिडी देते है ,कर्ज माफ़ करते है ,और तमाम चीजे बाँटते है तो ये छोटी से रकम क्या मायने रखती है ?
आगरा बहुत परेशांन है ।सर्वॊच्च नयायालय के आदेश के विपरीत सभी जेनरेटर खरीदने लगे है ,मैं भी सोच रहा हूँ की जेनरेटर तो नहीं खरीद सकता तो ,हाथ का पंखा और पेट्रोमेक्स और मोमबत्ती के पैकेट तो खरीद ही लू । चलिए पुराने युग की तरफ क्योकि एक मल्टीनेशनल कंपनी का राज आ गया है ।
हम उत्तर प्रदेश के लोगो को जो बिजली सामान्य हालत में करीब चार रुपये पड़ती है वाही बिजली हम टोरेंट को 1 रुपये और 80 पैसे में देते है । टोरेंट वही है 4 .450 रुपये में देता है । पीक टाइम में बिजली हमें 8 / 9 रुपये भी पड़ती है हम फिर भी टोरेंट को 1.80 में ही देते है । पर एक सीमा के बाद टोरेंट को बिजली 5.50 में मिलेगी । अतः वो बिजली काट कर अपना बिजली खर्च उस सीमा के नीचे ही रखता है ।
प्रदेश को इनसे केवल एक फायदा हुआ है की आगरा में नौकरी करने वाले सभी कर्मचारी और अधिकारी चले गए तो उनका खर्च बच गया ।बाकि हिसाब तो सरकार ही दे सकती है । पर जनता हमसे बहुत नाराज है ।
क्यों नाराज है ? क्योकि जब भी ये घंटो बिजली काटते है तो लोगो को बताने लगते है की बिजली लखनऊ से सरकार काट रही है ।
हम हजरों करोड़ की सब्सिडी देते है ,कर्ज माफ़ करते है ,और तमाम चीजे बाँटते है तो ये छोटी से रकम क्या मायने रखती है ?
आगरा बहुत परेशांन है ।सर्वॊच्च नयायालय के आदेश के विपरीत सभी जेनरेटर खरीदने लगे है ,मैं भी सोच रहा हूँ की जेनरेटर तो नहीं खरीद सकता तो ,हाथ का पंखा और पेट्रोमेक्स और मोमबत्ती के पैकेट तो खरीद ही लू । चलिए पुराने युग की तरफ क्योकि एक मल्टीनेशनल कंपनी का राज आ गया है ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
गुरुवार, 4 अप्रैल 2013
सोच रहा हूँ की अब अन्धो के शहर में चश्मे और गंजो के शहर में कंघियाँ बाटना बंद कर दूँ ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
आगरा के विकास के लिए मैंने लिए मैंने एक प्रस्ताव मुख्यमंत्री जी को दिया है । इसमें आग्रह किया है की आगरा से टुंडला मार्ग ,फतेहाबाद मार्ग ,आगरा से लखनऊ जाने वाला नया एक्सप्रेस वे ,और टुंडला स्टेशन के चार कोण मन कर आगरा विशेष आर्थिक परिक्षेत्र बनाया जाये । इसमें नॉएडा एक्सप्रेस वे के सामने का हिस्सा सोफ्टवेयर कंपनियों को दिया जाये ,एक हिस्से में स्कूल ,कालेज ,मेडिकल कालेज और विश्वविद्यालय ,स्टेडियम इत्यादि को दिया जाये ,बीच का हिस्सा व्यापारिक हो जिसमे होटल इत्यादि भी हो और बाकि सब आवासीय हो । टुंडला स्टेशन का एक नंबर प्लेटफोर्म मुख्य हो जाये तथा वह तक आगरा से इसी क्षेत्र के बीच से रोड निकला जाये और पूरा विकास नॉएडा या चंडीगढ़ की तरह किया जाये । चूँकि इस क्षेत्र का बड़ा भाग खादर है इसलिए उसका विकास भी हो जायेगा । जरूरी ये है की इसका फैसला हो और एक अथोरिटी बना दी जाये । सरकार पर कोई बोझ नहीं होगा क्यों जो जमीन बिकेगी उससे विकास के बाद भी पैसा बच जायेगा ।
नॉएडा और दिल्ली तथा गुडगाँव में लोगो को आने जाने में दो से तीन घंटे लग जाते है पर एक्सप्रेस वे से डेढ़ घंटे में लोग यहाँ पहुँच जायेंगे । आगरा अंतररास्ट्रीय शहर है .लोगो के आकर्षण का केंद्र है । यहाँ का रोजगार फाउंड्री के जाने के साथ चला गया था । अगर ये हो जाता है तो सीधे करीब डेढ़ से दो लाख रोजगार मिलेगा पर अप्रत्यक्ष रूप से पूरे शहर और जिले को ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलो को लाभ मिलेगा ।
यदि ये हो जाता है तो टूरिस्म भी बढेगा ,जहाज भी चलेंगे और जहाज चलेंगे तो हवाई अड्डा भी बनेगा और विकास होगा तो हर तरह का रोजगार भी बढेगा और व्यापार भी बढ़ेगा । बस मेरी कोशिश मुख्यमंत्री जी के साथ विभिन्न विभागों की लखनऊ में मीटिंग करवाने की है । मुख्यमंत्री जी भी आगरा सहित प्रदेश के विकास के लिए गंभीर है । आगरा के दोस्तों दुवा करिए की मैं कामयाब हो जाऊ । उन्नीस सौ सैतालिस से कुछ भी तो नहीं हुआ आगरा में ।
नॉएडा और दिल्ली तथा गुडगाँव में लोगो को आने जाने में दो से तीन घंटे लग जाते है पर एक्सप्रेस वे से डेढ़ घंटे में लोग यहाँ पहुँच जायेंगे । आगरा अंतररास्ट्रीय शहर है .लोगो के आकर्षण का केंद्र है । यहाँ का रोजगार फाउंड्री के जाने के साथ चला गया था । अगर ये हो जाता है तो सीधे करीब डेढ़ से दो लाख रोजगार मिलेगा पर अप्रत्यक्ष रूप से पूरे शहर और जिले को ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलो को लाभ मिलेगा ।
यदि ये हो जाता है तो टूरिस्म भी बढेगा ,जहाज भी चलेंगे और जहाज चलेंगे तो हवाई अड्डा भी बनेगा और विकास होगा तो हर तरह का रोजगार भी बढेगा और व्यापार भी बढ़ेगा । बस मेरी कोशिश मुख्यमंत्री जी के साथ विभिन्न विभागों की लखनऊ में मीटिंग करवाने की है । मुख्यमंत्री जी भी आगरा सहित प्रदेश के विकास के लिए गंभीर है । आगरा के दोस्तों दुवा करिए की मैं कामयाब हो जाऊ । उन्नीस सौ सैतालिस से कुछ भी तो नहीं हुआ आगरा में ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
शुक्रवार, 22 मार्च 2013
आज २३ मार्च है डॉ राममनोहर लोहिया का जन्मदिन । आज देश के वणिक समाज के
लोग अपने कार्यक्रम में उनकी फोटो लगायेंगे और उनको अपने समाज का गौरव
बताएँगे और वे ये भूल जाना चाहेंगे तथा इसका जिक्र भी नहीं करना चाहेंगे की
उसी डॉ लोहिया ने इस देश में जाति तोड़ो अभियान चलाया था और तमाम लोगो ने
अपने नाम से जाती का नाम हटा दिया था । ये लोग ये भी याद नहीं रखना चाहेंगे
की उसी डॉ लोहिया ने कई लाखो जनेऊ तुड़वा कर जलवा दिया था । ये तो बिलकुल
याद नहीं रखना चाहिए कि उसी डॉ लोहिया ने ; संसोपा ने बाँधी गांठ - पिछड़े
पाए सौ में साठ : का नारा दिया था । जिसने मण्डल कमीशन की बुनियाद रखा । पर
उनके नाम के साथ उनकी जाती चिपकाते हुए बताया जायेगा की डॉ लोहिया भी दर
असल बनिया थे और डॉ लोहिया को शायद इससे बड़ी गाली दी भी नहीं जा सकती जो
उन्हें इतना छोटा बना कर दी जाएगी ।
कुछ दूसरे हम जैसे लोग भी उन्हें शायद याद करेंगे जो उनके चित्र से अपने ड्राइंग रूम या ऑफिस सजाते है । हम जैसे लोग उनके इतिहास को याद करने की कोशिश करेंगे ,उन्हें याद करने की कोशिश करेंगे केवल एक व्यक्ति के रूप में ,एक नेता के रूप में और थोडा सा स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी शायद याद कर लें । पर उनकी बातो पर ध्यान नहीं देंगे ,उनके विचारो को अपनी अलमारियों के सबसे पीछे खाने के लिए छोड़ देंगे । डॉ लोहिया अगर चाहते तो पूरी जिंदगी सांसद रह सकते थे । वे चाहते तो नेहरु जी की सरकार से लगातार केंद्र का महत्वपूर्ण मंत्री रह सकते थे । वे चाहते तो दिल्ली के एक शानदार बंगले का सुख उठा सकते थे ।
पर फिर इतिहास चक्र कौन लिखता ,कौन सीता और सावित्री और द्रौपदी के बहाने औरतो की स्वतंत्रता की चर्चा छेड़ता । फिर चित्रकूट में रामायण मेला लगा कर संस्कृति को सहेजता कौन ? देश विभाजन के गुनाहगार की चर्चा नहीं कर सकते थे वे । राम ,कृष्ण ,शिव या केवल कृष्ण लिख कर इनके बहाने जीवन संस्कृति ,जिम्मेदारियों ,मर्यादाओ ,और न्याय की चर्चा नहीं कर पाते वे । तब कहा सगुण और निर्गुण की बात हुयी हुयी नए संदर्भो में । तब नहीं हुयी होती चर्चा संसद में अमीरी और गरीबी की इतनी बड़ी खाई की तीन आना बनाम छ आना की बहस के साथ । तब कौन भारत को चीन के आक्रमण से आगाह करता । कौन होता जो तिब्बत की लड़ाई लड़ता । तब शायद गोवा की आजादी और लम्बी हो जाती और नेपाल में जागरण का सूरज देर से पहुँचता । कौन दहाड़ कर कहता की हिमालय बचाओ और जिस पानी की आज चर्चा है उसकी बुनियाद किसने रखी होती गंगा बचाओ का अभियान चला कर और उसके बहाने सभी नदियों को बचाने की आवाज लगा कर । तब कौन कहता की दुनिया को सात क्रांतियों की जरूरत है वो रंग भेद के खिलाफ हो ,यानि चमड़ी की हो ,वो स्त्री पुरुष के बीच भेद की हो ,वो जाती के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,वो धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,गरीबी अमीरी के भेदभाव के खिलाफ हो इत्यादि । तब कौन इबारत लिखता चौखम्भा राज की जिसके आधार पर आज का भारत गाँव से देश तक चार सरकारों से संचालित होता है ।
यदि डॉ लोहिया ने सब सुख स्वीकार कर लिया होता तो कौन तोड़ता आज़ादी के बाद भी हमें मुह चिढाती अंग्रेजो की मूर्तियों को और महीनो इसके लिए जेल काटता राजनारायण जैसे साथियों के साथ और मूर्तियाँ आज भी हमारे सीने पर मूंग दल रही होती । तब कौन लड़ाई छेड़ता अंग्रेजी हाय हाय की जिसकी एक परिणिति अभी दिखलाई पड़ी है जब आई ए एस के इम्तहान से अंग्रेजी की बाध्यता समाप्त कर दी गयी है । तब कौन लड़ता नौजवानों के लिए विश्वविद्यालयो और कालेजो में जा जा कर और उन्हें आने वाले समय में लोकतंत्र का मजबूत हथियार बनाता । कौन कहता की किसान को उसकी उपज का मूल्य दो और गरीब को उसका हक़ । वे नहीं कह पाते ; संसोपा ने बांधी गांठ और पिछड़े मांगे सौ में साठ ; और आज का सामाजिक न्याय का परिदृश्य भी शायद दिखलाई नहीं पड़ता या अभी शैशव अवस्था में घुटने पर चल रहा होता । यदि उन्होंने मंत्री पद स्वीकार कर लिया होता तो कौन बताता इस देश को की पहाड़ जैसे सत्ता में बैठे लोगो से कैसे टकराया जा सकता है और कौन अहसास करवाता की विपक्ष भी कुछ होता है । कौन गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत देकर अजेय कांग्रेस की देश में नौ सरकारें गिरा कर रास्ता दिखाता की कांग्रेस की सरकार हटाई भी जा सकती है । कौन लड़ता नेहरु जी जैसे बड़े नेता से और ये कहने का सहस करता की मै जानता हूँ की पहाड़ से टकरा रहा हूँ पर टकराते टकराते मई दरार तो पैदा कर ही दूंगा जिसे कल कोई गिर भी देगा ।
हाँ जो सब छोड़ने को तैयार होते है वही नए समाज की रचना करते है ,वाही देशी की आजादी के योद्धा होते है ,वाही सामाजिक और आर्थिक क्रांतियाँ करते है । वही समाज को रास्ता दिखाते है । वही वाही उंच नीच के भेदभाव से लड़ते है । ऐसे लोग ही होते है क्रांतिदूत ,समाज परिवर्तक ,और महामानव । जी हाँ मैंने ये सब एक ऐसे ही महामानव के बारे में लिखा है जिसका नाम था डॉ राममनोहर लोहिया और आज जिनका जन्मदिन है । मुझ जैसे लोग लोग जो उन्हें पढ़ कर और जान कर राजनीती में आ गए पता नहीं उनके अभियान को कुछ इंच भी सरका पाए या नहीं । पता नहीं समाज को बदलने की बात करते करते खद ही बदल गए या नहीं । पता नहीं लोगो को न्याय दिलाते दिलाते खुद अन्याय का शिकार तो कही नहीं हो गए । लोगो को खुशहाल बनाते बनते खुद तो बर्बाद नहीं हो गए । पर आज मुझ जैसे उनके तमाम दीवानों का उस चिन्तक और त्यागी डॉ लोहिया को सलाम ।हाँ आज भी मुलायम सिंह यादव तथा अखिलेश यादव जैसे लोग उनके सपनो को याद कर कर के जमीन पर उतारने की कोशिश कर रहे है ,कोशिश कर रहे है की डॉ लोहिया सदा जिन्दा रहे और उनके सिधान्तो की लौ जलती रहे । आइये कुछ उनके विचारो पर हम भी विचार भी कर ले । उन्हें पूरे देश का सलाम ।
कुछ दूसरे हम जैसे लोग भी उन्हें शायद याद करेंगे जो उनके चित्र से अपने ड्राइंग रूम या ऑफिस सजाते है । हम जैसे लोग उनके इतिहास को याद करने की कोशिश करेंगे ,उन्हें याद करने की कोशिश करेंगे केवल एक व्यक्ति के रूप में ,एक नेता के रूप में और थोडा सा स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी शायद याद कर लें । पर उनकी बातो पर ध्यान नहीं देंगे ,उनके विचारो को अपनी अलमारियों के सबसे पीछे खाने के लिए छोड़ देंगे । डॉ लोहिया अगर चाहते तो पूरी जिंदगी सांसद रह सकते थे । वे चाहते तो नेहरु जी की सरकार से लगातार केंद्र का महत्वपूर्ण मंत्री रह सकते थे । वे चाहते तो दिल्ली के एक शानदार बंगले का सुख उठा सकते थे ।
पर फिर इतिहास चक्र कौन लिखता ,कौन सीता और सावित्री और द्रौपदी के बहाने औरतो की स्वतंत्रता की चर्चा छेड़ता । फिर चित्रकूट में रामायण मेला लगा कर संस्कृति को सहेजता कौन ? देश विभाजन के गुनाहगार की चर्चा नहीं कर सकते थे वे । राम ,कृष्ण ,शिव या केवल कृष्ण लिख कर इनके बहाने जीवन संस्कृति ,जिम्मेदारियों ,मर्यादाओ ,और न्याय की चर्चा नहीं कर पाते वे । तब कहा सगुण और निर्गुण की बात हुयी हुयी नए संदर्भो में । तब नहीं हुयी होती चर्चा संसद में अमीरी और गरीबी की इतनी बड़ी खाई की तीन आना बनाम छ आना की बहस के साथ । तब कौन भारत को चीन के आक्रमण से आगाह करता । कौन होता जो तिब्बत की लड़ाई लड़ता । तब शायद गोवा की आजादी और लम्बी हो जाती और नेपाल में जागरण का सूरज देर से पहुँचता । कौन दहाड़ कर कहता की हिमालय बचाओ और जिस पानी की आज चर्चा है उसकी बुनियाद किसने रखी होती गंगा बचाओ का अभियान चला कर और उसके बहाने सभी नदियों को बचाने की आवाज लगा कर । तब कौन कहता की दुनिया को सात क्रांतियों की जरूरत है वो रंग भेद के खिलाफ हो ,यानि चमड़ी की हो ,वो स्त्री पुरुष के बीच भेद की हो ,वो जाती के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,वो धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हो ,गरीबी अमीरी के भेदभाव के खिलाफ हो इत्यादि । तब कौन इबारत लिखता चौखम्भा राज की जिसके आधार पर आज का भारत गाँव से देश तक चार सरकारों से संचालित होता है ।
यदि डॉ लोहिया ने सब सुख स्वीकार कर लिया होता तो कौन तोड़ता आज़ादी के बाद भी हमें मुह चिढाती अंग्रेजो की मूर्तियों को और महीनो इसके लिए जेल काटता राजनारायण जैसे साथियों के साथ और मूर्तियाँ आज भी हमारे सीने पर मूंग दल रही होती । तब कौन लड़ाई छेड़ता अंग्रेजी हाय हाय की जिसकी एक परिणिति अभी दिखलाई पड़ी है जब आई ए एस के इम्तहान से अंग्रेजी की बाध्यता समाप्त कर दी गयी है । तब कौन लड़ता नौजवानों के लिए विश्वविद्यालयो और कालेजो में जा जा कर और उन्हें आने वाले समय में लोकतंत्र का मजबूत हथियार बनाता । कौन कहता की किसान को उसकी उपज का मूल्य दो और गरीब को उसका हक़ । वे नहीं कह पाते ; संसोपा ने बांधी गांठ और पिछड़े मांगे सौ में साठ ; और आज का सामाजिक न्याय का परिदृश्य भी शायद दिखलाई नहीं पड़ता या अभी शैशव अवस्था में घुटने पर चल रहा होता । यदि उन्होंने मंत्री पद स्वीकार कर लिया होता तो कौन बताता इस देश को की पहाड़ जैसे सत्ता में बैठे लोगो से कैसे टकराया जा सकता है और कौन अहसास करवाता की विपक्ष भी कुछ होता है । कौन गैर कांग्रेसवाद का सिद्धांत देकर अजेय कांग्रेस की देश में नौ सरकारें गिरा कर रास्ता दिखाता की कांग्रेस की सरकार हटाई भी जा सकती है । कौन लड़ता नेहरु जी जैसे बड़े नेता से और ये कहने का सहस करता की मै जानता हूँ की पहाड़ से टकरा रहा हूँ पर टकराते टकराते मई दरार तो पैदा कर ही दूंगा जिसे कल कोई गिर भी देगा ।
हाँ जो सब छोड़ने को तैयार होते है वही नए समाज की रचना करते है ,वाही देशी की आजादी के योद्धा होते है ,वाही सामाजिक और आर्थिक क्रांतियाँ करते है । वही समाज को रास्ता दिखाते है । वही वाही उंच नीच के भेदभाव से लड़ते है । ऐसे लोग ही होते है क्रांतिदूत ,समाज परिवर्तक ,और महामानव । जी हाँ मैंने ये सब एक ऐसे ही महामानव के बारे में लिखा है जिसका नाम था डॉ राममनोहर लोहिया और आज जिनका जन्मदिन है । मुझ जैसे लोग लोग जो उन्हें पढ़ कर और जान कर राजनीती में आ गए पता नहीं उनके अभियान को कुछ इंच भी सरका पाए या नहीं । पता नहीं समाज को बदलने की बात करते करते खद ही बदल गए या नहीं । पता नहीं लोगो को न्याय दिलाते दिलाते खुद अन्याय का शिकार तो कही नहीं हो गए । लोगो को खुशहाल बनाते बनते खुद तो बर्बाद नहीं हो गए । पर आज मुझ जैसे उनके तमाम दीवानों का उस चिन्तक और त्यागी डॉ लोहिया को सलाम ।हाँ आज भी मुलायम सिंह यादव तथा अखिलेश यादव जैसे लोग उनके सपनो को याद कर कर के जमीन पर उतारने की कोशिश कर रहे है ,कोशिश कर रहे है की डॉ लोहिया सदा जिन्दा रहे और उनके सिधान्तो की लौ जलती रहे । आइये कुछ उनके विचारो पर हम भी विचार भी कर ले । उन्हें पूरे देश का सलाम ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
बुधवार, 20 मार्च 2013
अरे बेनिया तो बहुत ही चर्चा में हुई गवा । कौनो नहीं पूछ रहा था वोका
पर केहू को ढंग से बस गरिया दिया और चारो ओर वाही की बात हुई रही है । कुल
अखबार में वोका तमाम जगह मिल गयी जो जिनगी में नहीं मिली थी । कुल टी वी
वाले अपना धंधा पानी का खियाल किये बिना बेनिया ,बेनिया ही रट रहे है और
तमाम चेहरा चमकाऊ लोगन को बुला बुला ,घेर घेर कर बस बेनिया बेनिया ही बतिया
रहे है । बस यही बात नहीं हुई रही है खुल कर की बेनिया का बोल ,चर्चा केवल
उकी भाषा और गाली की हुई रही है ।
वह रे बेनिया तू तो बड़ा ही तेज निकला ,खूब दाव चला और सबकी निगाह में आ गया । वर्ना चुपचाप धंधा पानी में बीजी था । कभी कभी बात तो हुई बेनिया के बारे में पर या तो धंधा और घोटाले की हुई या फिर जुबान फिसलने की हुयी । इस ससुर जुबान हुई की पोखरी या नल किनारे की कई हो गयी की जब चाहो फिसल जाओ । खैर बेनिया को फिसलने से कौनो फर्क नहीं पड़ता ।जौन ससुर को पड़े वो नाला और पोखरी के किनारे न जाये और बेनिया फिसल गया तो आंख बंद कर ले ।
पर बेनिया चर्चा में खूब है बस यही चर्चा है । हम जैसे लोग तो जल भुन कर खाक हुई गए है की आखिर हमारी जुबान कहे नहीं फिसलती है और हमार दिमाग बेनिया की तरह काम कहे नहीं करता है की कब फिसल जाएँ पूरा नंगा होकर की खूब फोटो छपे और खूब चर्चा हुई जाये । धिक्कार है ऐसे सभी हम जैसन को जो चर्चा में आना नहीं जानते । वैसे बेनिया से पूछेंगे जरूर की यार कोई कोचिंग कहे नहीं खोल लेते जुबान फिसलने की सही टाइमिंग और सही शब्द का इस्तेमाल करने की । वैसे तुम्हारी बोली भाषा थोड़ी क्लिस्ट है तो शब्दार्थ ,भावार्थ की एक कुंजी भी छाप दो बहुत धंधा होगा । ये भी खूब विचार आ गया हम जैसे अज्ञानी के दिमाग में की गाली और सही समय दी गयी गाली और उसकी कुंजी से भी धंधा हो सकता है ।
पर बेनिया दोस्त हमारी राय को हम पर ही मत अजमा देना । हम बहुत कमजोर है सदमे से मर जायेंगे । वैसे हमें अभी याद आया की एक दिन हम अस्पताल में थे तो तुम्हारा एक फोन आया था किसी माँ को ऐसी ही गाली देते हुए तुमने उसके लडके को भी कुछ कुत्ता पिल्ला टाइप कहा था । खैर तुम महान हो और दुनिया के सारे अज्ञानी और गली तथा उसकी टाइमिंग नहीं जानने वाले तुम्हे सलाम करते है । और ऐसे अपने बेनिया की कथा को हम आज भरे मन से आज इतने पर ही विराम देते है क्योकि ज्यादा कह देंगे तो बहुत भावुक हुई जायेंगे और बेनिया के दोस्त भावुक हो इ अच्छा थोड़े लगेगा ।भावुकता तो इंसानों में होती है और इंसान न्न्न्न्न्न्न्न
।नहीं बिलकुल नहीं । अथ बेनी कथा सम्पन्न्तः ।
वह रे बेनिया तू तो बड़ा ही तेज निकला ,खूब दाव चला और सबकी निगाह में आ गया । वर्ना चुपचाप धंधा पानी में बीजी था । कभी कभी बात तो हुई बेनिया के बारे में पर या तो धंधा और घोटाले की हुई या फिर जुबान फिसलने की हुयी । इस ससुर जुबान हुई की पोखरी या नल किनारे की कई हो गयी की जब चाहो फिसल जाओ । खैर बेनिया को फिसलने से कौनो फर्क नहीं पड़ता ।जौन ससुर को पड़े वो नाला और पोखरी के किनारे न जाये और बेनिया फिसल गया तो आंख बंद कर ले ।
पर बेनिया चर्चा में खूब है बस यही चर्चा है । हम जैसे लोग तो जल भुन कर खाक हुई गए है की आखिर हमारी जुबान कहे नहीं फिसलती है और हमार दिमाग बेनिया की तरह काम कहे नहीं करता है की कब फिसल जाएँ पूरा नंगा होकर की खूब फोटो छपे और खूब चर्चा हुई जाये । धिक्कार है ऐसे सभी हम जैसन को जो चर्चा में आना नहीं जानते । वैसे बेनिया से पूछेंगे जरूर की यार कोई कोचिंग कहे नहीं खोल लेते जुबान फिसलने की सही टाइमिंग और सही शब्द का इस्तेमाल करने की । वैसे तुम्हारी बोली भाषा थोड़ी क्लिस्ट है तो शब्दार्थ ,भावार्थ की एक कुंजी भी छाप दो बहुत धंधा होगा । ये भी खूब विचार आ गया हम जैसे अज्ञानी के दिमाग में की गाली और सही समय दी गयी गाली और उसकी कुंजी से भी धंधा हो सकता है ।
पर बेनिया दोस्त हमारी राय को हम पर ही मत अजमा देना । हम बहुत कमजोर है सदमे से मर जायेंगे । वैसे हमें अभी याद आया की एक दिन हम अस्पताल में थे तो तुम्हारा एक फोन आया था किसी माँ को ऐसी ही गाली देते हुए तुमने उसके लडके को भी कुछ कुत्ता पिल्ला टाइप कहा था । खैर तुम महान हो और दुनिया के सारे अज्ञानी और गली तथा उसकी टाइमिंग नहीं जानने वाले तुम्हे सलाम करते है । और ऐसे अपने बेनिया की कथा को हम आज भरे मन से आज इतने पर ही विराम देते है क्योकि ज्यादा कह देंगे तो बहुत भावुक हुई जायेंगे और बेनिया के दोस्त भावुक हो इ अच्छा थोड़े लगेगा ।भावुकता तो इंसानों में होती है और इंसान न्न्न्न्न्न्न्न
।नहीं बिलकुल नहीं । अथ बेनी कथा सम्पन्न्तः ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
गुरुवार, 31 जनवरी 2013
आदरणीय नेता जी उत्तर प्रदेश के अधिकारीयों से
नाराज है क्यों न हो ,दो घटनाएँ इनका आइना दिखा देगी --1--एक पार्टी नेता
ने अपने अच्छे बुरे वक्त के साथी लेकिन अच्छे और योग्य एक इंजीनियर जिनकी
केवल कुछ माह की नौकरी शेष है का सरकार की डेढ़ साल वाली नीति के अंदर
मुख्यमंत्री से उनके इच्छित स्थान पर स्थानांतरण का आदेश करवाया । जब यह
आदेश उस विभाग के सबसे बड़े अधिकारी मिश्रा जी के पास पहुंचा तो उन्होंने
आदेश दबा दिया ।नेता ये सोच कर चुप रहे
कोई प्रशासनिक दिक्कत होगी । दो हफ्ते बाद मिश्र जी ने उस इंजीनियर को फ़ोन
किया की नेताओ के चक्कर में क्यों पड़ गए ,काम करवाना है या नहीं ,और बुलाया
,एक बड़ी रकम लिया और आदेश कर दिया ।-----2----एक शर्मा जी है जिनकी जमीन
अधिगृहित हुयी थी और नियमानुसार उन्हें कुछ जमीन मिलनी थी ।सांसदों
,मंत्रियों के चक्कर काट कर थक गए तो किसी तरह मुख्यमंत्री से मिले ।
मुख्यमंत्री के एक विशेष कार्य अधिकारी से आवास आयुक्त को फ़ोन करवाया ।
आवास आयुक्त ने कई दिन चक्कर कटवा कर अंत में सबसे नीचे पहुँच कर बात करने
को । सबसे नीचे वाले ने पूछा की चक्कर काटना है और फाइल में कागज बढ़ाने है
या काम करवाना है ? काम करवाना है तो तीन लाख रुपये दे दो ,एक घंटे में काम
ख़त्म वर्ना हमें जो जवाब देना है लिख देंगे ।---- मुख्यमंत्री इमानदार है
पर अधिकारी कोई भी विकास का पैसा जरी करने से पहले ही 5% ले लेते है । बाकि
नीचे वाले अपना अपना लेते जाते है ।--- पिछली सरकार में कागजो पर ही काम
करने के आदि अभी भी वाही सोच कर काम कर रहे है । मुख्यमंत्री शरीफ और सीधे
सादे व्यक्ति है पर नेता जी की निगाह से कुछ छुपा नहीं है ।-- छोटे से सबसे
बड़े तक सभी अधिकारियो की कार्य शैली यही है । ये जनता और राजनैतिक
कार्यकर्त्ता से सीधे मुह बात नहीं करते है पर कुछ खास वर्ग के लोगो के
सामने बिछे रहते है ।---केवल 2 --करोड़ के लिए सांसद --और डेढ़ करोड़ की निधि
जिसकी केवल स्वीकृति ये लोग करते है ,काम कारवाना और उसका भुगतान करना
अधिकारीयों का काम है उसके लिए ये जनप्रतिनिधि बदनाम कर दिए गए है पर हजारो
लाखो करोड़ खर्च करने वाले नीचे से ऊपर तक के अधिकारी दूध के धुले मान लिए
गए है । -- मध्यप्रदेश से लेकर जहा जहा तंत्र में बैठे कर्मचारियों और
अधिकारियो पर छपे पड़े उनके घरो में करोडो नहीं सैकड़ो करोडो निकले । कुछ
राजनैतिक लोगो के पास भी निकल सकते है पर 90% से ज्यादा राजनैतिक लोगो की
अपने अस्तित्व के लिए इमानदार रहना ही पड़ता है । -- नेता को रोज इम्तहान
देना होता है और चुनाव के मैदान में हर पांच साल बाद इम्तहान भी देना होता
है पर अधिकारियो और कर्मचारियों को एक बार चयन के के बाद न तो कोई जवाब
देना है ,न कोई अपने काम का हिसाब देना है और न दुबारा इम्तहान देना है और
रिटायर होने पर भी बड़ी रकम मिलते रहने की गारंटी है ।---क्या इनकी भी कोई
जवाबदेही होनी चाहिए ???? क्या इन लोगो की नौकरियां भी संविदा पर केवल कुछ
समय के लिए होनी चाहिए ?? क्या इमानदार और परिणामदायक नहीं होने पर इन्हें
भी प्राइवेट कंपनियों की तरह बाहर कर देना चाहिए ??? क्या भारत जैसे गरीबो
के देश के अधिकारयो को पचासों बीघे वाले घरो में रहना चाहिए या इन घरो का
जनहित में कोई और उपयोग होना क चाहिए क्योकि ये घर तो गुलाम रास्त्र के
मालिको के थे न की जन सेवको के ??? ----- एक दिन एक बड़े और सीनियर मंत्री
एक अधिकारी से बात करने को परेशान थे और उस अधिकारी ने घंटो क्या उस पूरे
दिन फ़ोन नहीं उठाया । क्या होना चाहिए उनका । कुछ भी कह लीजिये सरकार के
असली मालिक आज के राजा तो यही लोग है । जनता किसी राजनैतिक कार्यकर्ता को
रात को दो बजे भी जग सकती है पर ये लोग क्रमशः मीटिंग या बाथरूम में ही
मिलते है ।-----नेता जी ने चिंता जताई है ,आज़म खान साहब ने एक रास्ता बताया
है ,मुख्यमंत्री जी ने भी तेवर दिखाया है तो हम भी इन मुद्दों पर बहस तो
कर ही ले । क्योकि हम सब भी तो महान है पड़ोस में रहने वाले बड़े स्वतंत्रता
सेनानी को नमस्ते नहीं करते ,परम वीर चक्र पाने वाले को नहीं पहचानते ,बड़े
से बड़े साहित्यकार और विद्वान को कुछ नहीं समझते और दरोगा से डरते है
,अधिकारियो को माला पहनाते है और उनकी चापलूसी में सुख महसूस करते है ।
आइये इन मुद्दों पर बात ही कर लें ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
मंगलवार, 25 दिसंबर 2012
आगरा की सड़को से स्कूटर रिक्शा हटा दिए गए है ।जनता को बहुत राहत हो गयी है चौबीसों घंटे जाम से राहत । ये स्कूटर वालो ने नर्क बना रखा था शहर को । 1 की जगह चार बिना लाइसेंस के चलते थे और चौराहों को घेर कर लोगो का समय और पेट्रोल बर्बाद करते थे ।प्रशासन को अच्छा फैसला है ।बधाई ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
शुक्रवार, 21 सितंबर 2012
प्रधानमंत्री जी की बातो पर भरोसा करना चाहिए और उन्हें समय तथा विश्वास भी देना चाहिए ।1991 यदि उन्होंने दोहराया तो निश्चित ही देश हित में चमत्कार होगा ।ऐसा लगता है की उनमे इतिहास के प्रति जवाबदेही का जबरदस्त अहसास पैदा हो गया है । जब किसी में इतिहास के प्रति ये अहसास पैदा होता है तो वो इतिहास बनाता है ऐसा इतिहास बताता है ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
गुरुवार, 20 सितंबर 2012
क्या भारत की संसद को एक सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर बापू यानि महात्मा गाँधी को नेताजी द्वारा दिया गया रास्ट्रपिता का दर्जा दे देना चाहिए । दुनिया ने जो मान लिया उसे सांवैधानिक स्वरुप देना क्या अपने देश को गौरवान्वित करना नहीं होगा । वैसे कुछ नासमझ भी यहाँ बोलने की कोशिश करेंगे । उचित ये है की वे दुनिया के महानतम को मान न दे सके तो यहाँ कुछ न कहे ,अन्यथा मै उन सभी को ब्लोक कर दूंगा । ये मेरे सहित दुनिया के करोडो लोगो की भावना का सवाल है ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
बुधवार, 5 सितंबर 2012
आगरा प्राइवेट कंपनी टोरंट के खिलाफ उसके वादा खिलाफी और इस्ट इंडिया कंपनी जैसी उत्पीडन और लूट वाली हरकतों के कारण आंदोलित है । जो विपक्ष में रहता है वो इस कंपनी के खिलाफ बोलता है और सत्ता में आते ही इस कंपनी के साथ हो जाता है । बिजली व्यवस्था इस कम्पनी को देने से लगा था की इससे प्रदेश को भी फायदा होगा और जनता को भी । परन्तु प्रदेश को करोडो का चूना लग रहा है ये विभागीय औडिट से सामने आया और जनता को जो सपने दिखाए गए थे वे पूरी तरह झूठे साबित हुए । जिनके बिल आते थे 100 रूपया उनके 150 से 200 तक हो गए । वादा किया गया था की जेनरेटर ,इन्वेर्टर और स्टेब्लायिजर की जरूरत ख़त्म हो जाएगी पर सब कुछ ज्यो का त्यों है ,कुछ नहीं बदला । बल्कि बिजली ज्यादा जाती है ,और कंपनी का एकमात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा पैसे वसूलना है न की कोई सुविधा देना और सुधारना ।
इसलिए जनता आंदोलित है । अब देखना है की जनता जीतती है या कंपनी ? सरकार जनता के साथ खड़ी होती है या गोपनीय कारणों से कंपनी के साथ ?पर जनता में भारी रोष है कटौती से ,ज्यादा बिल से ,उत्पीडन से और कंपनी के लोगो के दुर्व्यवहार से और नेताओ के बदलते हुए आचरण से ।
देखते है की जनता का ये गुस्सा कहा तक जाता है और क्या गुल खिलाता है ?/??????
इसलिए जनता आंदोलित है । अब देखना है की जनता जीतती है या कंपनी ? सरकार जनता के साथ खड़ी होती है या गोपनीय कारणों से कंपनी के साथ ?पर जनता में भारी रोष है कटौती से ,ज्यादा बिल से ,उत्पीडन से और कंपनी के लोगो के दुर्व्यवहार से और नेताओ के बदलते हुए आचरण से ।
देखते है की जनता का ये गुस्सा कहा तक जाता है और क्या गुल खिलाता है ?/??????
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
रविवार, 26 अगस्त 2012
देश के सबसे बड़े घोटाले --ब्रेकिंग न्यूज़
----- अगर भारत का कारगिल नहीं होता तो 2 लाख करोड़ बचाता ,ब्रेकिंग
न्यूज़ ,बड़ा घोटाला ,अगर बंगला देश का युद्ध नहीं होता तो तीन लाख करोड़
बचाता ,अगर 1965 का युद्ध नहीं होता तो चार लाख करोड़ बचता ,,ब्रेकिंग
न्यूज़ बड़ा घोटाला ,अगर देश में स्कूल ,अस्पताल ,दफ्तर सड़के ,पुल बेराज
बिजलीघर और सभी कुछ प्रधानमंत्री खुद खड़े होकर बनवाते और सारे मंत्री ,एम्
पी ,एम् एल ए सारे अधिकारी और कर्मचारी खुद खड़े होकर बनवाते और खुद भी
मजदूरी करते तो करोडो ख़रब बच सकते थे ,,ब्रेकिंग न्यूज़ ,देश का सबसे बड़ा
घोटाला ,सब चोर है हम भी और आप भी और बाकी सब भी ---- चलो रामलीला मैदान
या जंतर मंतर
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
वैसे आज मै सिकंदरा { आगरा } शहर का ही हिस्सा गया था वहा से सेब खरीदा 50 रुपये किलो ,थोडा और शहर के अन्दर आया तो 100 और थोडा और अन्दर 120 से 150 हो गया आज ही ,ये भ्स्ताचार है या नहीं ? लडके और लड़की में फर्क भ्रस्ताचार है या नहीं है ? औरत आदमी का फर्क भ्स्ताचार है या नहीं ? जाती के आधार पर धर्म के आधार पर नफ़रत भ्स्ताचार है या नहीं ? अपने बच्चो को केवल घूस वाली नौकरी दिलाने की कोशिश भ्रस्ताचार है या नहीं है ? बिना दहेज़ के शादी नहीं करना भ्रस्ताचार है या नहीं है ,टीचर द्वारा नम्बर बढ़ाना ,या गुस्से में फेल कर देना ,डॉ द्वारा महँगी दवाई लिखाना ,महंगे जाँच करवाना ,कमीशन खाना भ्स्ताचार है नहीं ,व्यापारी द्वरा लूट और मिलावट ,जमाखोरी ,मुनाफाखोरी भ्स्ताचार है या नहीं ?गलत तरीके से सड़क पर चलन ,कानूनों का पालन नहीं करना ,कही भी थूक देना और कुछ भी करने खड़ा हो जाना ,कूड़ा कही भी फेंक देना ,दूसरो की बहन बेटियों को छेदना और मौका लगता ही कुछ भी कर बैठना ,रिश्तों को गन्दा करना क्या भ्स्ताचार है नहीं ? दोस्तों बहस पूरी करे । जरा अपने गिरेबान में झांक कर देखें की आप खुद कितने इमानदार है और देश के लिए समाज के लिए सचमुच क्या करते है है और जब वोट डालने जाते है तो क्या सोच कर वोट डालते है बस फिर तय हो जायेगा की लड़ाई कहा से शुरू हो यदि सचमुच हम देश और समाज बदलना चाहते है ।बाकि जिसके जो चस्मा चमड़ी में ही चिपक गया है तो कोई बात नही गाली गाली खेलते रहे और देश और समाज जाये भाड़ में ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
गुरुवार, 9 अगस्त 2012
क्या सचमुच कभी आगरा करवट लेगा
न जाने कितने करोडो खर्च होने के बाद भी आगरा में जब बरसात होती है तो तमाम प्रमुख चौराहे औए अच्छी कालोनी से लेकर बस्तियों तक बाढ़ जैसा दृश्य उपस्थित हो जाता है । जीवन नरक हो जाता है । इससे पहले गर्मी तेज होने पर पीने का पानी या तो नहीं मिलना या बहुत गन्दा बीमार करने वाला मिलता है । रोजमर्रा सड़क पर जाम की स्थिति है । जब बच्चो की छुट्टी होती है तो वे भी घंटों फंसे होते है ,दिल्ली की तरह उस समय कही भी ट्रैफिक पुलिस वाला व्यवस्था करता नहीं दीखता है । सडकों पर खड़े ट्रैफिक पुलिस वाले सड़क पर निर्बाध लोग चलते रहे इसके बजाय थोड़े से रुपये के लिए खुद जाम लगवा देते है ।उनकी रूचि ट्रैफिक को चंलने से ज्यादा किसी गाड़ी को पकड़ने में होती है जाम लगी सड़क पर । दुनिया में अन्य स्थानों पर टूरिस्ट प्लेस पर बाहर से आये लोगो से अच्छा व्यव्हार करना उन्हें मदद करना व्यवस्था का कर्त्तव्य होता है पर आगरा के पुलिस वाले से लेकर तरह तरह के दलाल टूरिस्ट को रुला देते है । बच्चे औरते परेशान हो या किसी को उसी दिन घूम कर कही और जाना हो पर जब तक वसूली पूरी नहीं हो जाती यहाँ का पुलिस वाला गाड़ी रोके रहता है ।बिजली करोडो रूपया लेकर प्राइवेट कंपनी को दे दी गयी पर वो पहले से ज्यादा रुला रही है बिल से भी और अनुपस्थिति से भी ।आप अगल बगल किसी बड़े शहर में चले जाइये चीजें सस्ती है पर आगरा का व्यापारी सभी को और उनके पैसे को अपना मानते हुए प्यार से खूब मुनाफा कमाता है और आगरा की जनता बड़े दिल से मानते हुए की आखिर ये मुनाफा हमारे ही किसी भाई के घर में जा रहा है ,कोई बहस नहीं करता । सहर्ष स्वीकार कर लेता है सब कुछ ।
नेता बयान देकर या एकाध दिन प्रदर्शन कर सौदा पट जाने पर मस्त है । एम् पी ,एम् एल ए ,किसी के पास आगरा के लिए न तो दूरगामी सोच है न योजना है और न सपने है और जब ये सब नहीं है तो संकल्प की तो कल्पना ही नहीं की सकती है ।मेरे एक मित्र कहते है की आगरा की जनता बत--द है और उसका नेता बनना है तो गंभीर न तो बाते करो और न प्रयास बल्कि विशुद्ध बत --दे बनो । अब ऐसा लगता है इतने सालो में की यही सच है । बड़ी बात ये है आगरा कभी गुस्सा नहीं होता है अपने जरूरी मसलों पर हाँ होता है गुस्सा किसी धार्मिक मामले पर ,जातिगत मामले पर ,कुछ खास नाम वालों की मूर्तियों या तस्वीरों को कुछ हो जाये तो देखिये गुस्सा । थोड़ी ज्यादा हो जाये फिर देखिये गुस्सा ,सड़क पर कोई छू जाये फिर देखिये गुस्सा । बस इंसानी जरूरतों पर ,विकास के अधिकार पर अपने पैसे के हिसाब पर ,नेताओं ,अधिकारीयों ,कर्मचारियों के दुर्व्यवहार और बेईमानी पर उसे गुस्सा नहीं आता । आगरा बड़ी ख़ुशी से इन सबको झेलता ही नहीं है बल्कि इन सबका रोज स्वागत करता है ,माला पहनाता है ,दावते देता है और फोटो खिंचवा कर गौरवान्वित होता है ।
बिजली नहीं आती कोई बात नहीं अपनी व्यवस्था के अनुसार ,हाथ का पंखा ,जेनरेटर ,इन्वेर्टर इत्यादि लगाव लेता है ,पानी नहीं या गन्दा आत्ता है तो हैण्ड पम्प ,जेट ,आर ओ लगवा लेता है या पानी के बोतल लेने लगता है ।अपनी सुरक्षा के लिए या तो गार्ड रख लेता है नहीं तो कट्टा खरीद लेता है और ये भी नहीं तो घर की छत पर बोतले और इंटें इकट्ठी कर लेता है । कितनी सहनशक्ति है आगरा में ।जी हाँ आगरा में जो अधिकारी गलती से भी आ जाता है वो इस शहर से इतना प्यार कर बैठता है की फिर जाना ही नहीं चाहता ।आगरा के लोग भी उसके प्यार में अभिभूत हो जाते है और उसका गुणगान करते है । नेता कुछ न करे बस मन की बात करता रहे वो सर पर बिठा लेते है उसको । है न मेरा आगरा महान ?
क्या मेरा आगरा कभी सचमुच अंतरास्ट्रीय शहर बन पायेगा ? क्या कभी यहाँ के एम् पी ,एम् एल ए ,जिला परिषद के अध्यक्ष ,मेयर ,अन्य ऐसे लोग जो विभिन्न समाजों और वर्गों या संस्थानों के ठेकेदार है अपनी पार्टी ,जाती धर्म ,अहंकार सब छोड़ कर इकट्ठे होकर आगरा के लिए खड़े हो पाएंगे ? क्या कभी आगरा सर उठा कर कह सकेगा ;मै आगरा हूँ जो सम्पूर्ण भारत की राजधानी रहा हूँ ,मै आगरा हूँ जहा दुनिया का एक आश्चर्य ताजमहल है ,मै आगरा हूँ बड़े बड़े शायरों ,लेखको,कवियों को पैदा करने वाला ,मै आगरा हूँ दुनिया में भारत की एक मजबूत पहचान ,जी हाँ मै आगरा हूँ और मुझे अपने होने पर गर्व है । मेरे शहर के नेता और अफसर और हम भी केवल बत --दी नहीं करते है बल्कि देखो हमने कर के दिखा दिया ,आगरा के अधिकारों को छीन कर दिखा दिया ,हमने आगरा को अंतररास्ट्रीय शहर बना कर दिखा दिया । देखो इसके चारो ओर हरियाली से घिरा हुआ चौड़ा रिंग रोड ,देखो स्वच्छ पानी की व्यवस्था ,देखो अनुशासन से बिना रुके चलता हुआ ट्रैफिक ,चारो ओर सफाई खूब सारी हरियाली । कोई लूट नहीं बस सबमे सुरक्षा का अहसास ।बाजार में लूट के बजाय सही दामो पर बिकता सामान ,शहर के बाहर बड़ी बड़ी बिल्डिंगे जिनमे तमाम अंतररास्ट्रीय कम्पनियाँ है और उनसे मिला हुआ लाखो को रोजगार । अब आगरा के लोग पढ़ने और नौकरी के लिए बाहर नहीं जाते बल्कि प्रतिभाएं आगरा आ रही है । जी हाँ ये देखो सर उठा कर बोलता हुआ मै हूँ आगरा ।
नेता बयान देकर या एकाध दिन प्रदर्शन कर सौदा पट जाने पर मस्त है । एम् पी ,एम् एल ए ,किसी के पास आगरा के लिए न तो दूरगामी सोच है न योजना है और न सपने है और जब ये सब नहीं है तो संकल्प की तो कल्पना ही नहीं की सकती है ।मेरे एक मित्र कहते है की आगरा की जनता बत--द है और उसका नेता बनना है तो गंभीर न तो बाते करो और न प्रयास बल्कि विशुद्ध बत --दे बनो । अब ऐसा लगता है इतने सालो में की यही सच है । बड़ी बात ये है आगरा कभी गुस्सा नहीं होता है अपने जरूरी मसलों पर हाँ होता है गुस्सा किसी धार्मिक मामले पर ,जातिगत मामले पर ,कुछ खास नाम वालों की मूर्तियों या तस्वीरों को कुछ हो जाये तो देखिये गुस्सा । थोड़ी ज्यादा हो जाये फिर देखिये गुस्सा ,सड़क पर कोई छू जाये फिर देखिये गुस्सा । बस इंसानी जरूरतों पर ,विकास के अधिकार पर अपने पैसे के हिसाब पर ,नेताओं ,अधिकारीयों ,कर्मचारियों के दुर्व्यवहार और बेईमानी पर उसे गुस्सा नहीं आता । आगरा बड़ी ख़ुशी से इन सबको झेलता ही नहीं है बल्कि इन सबका रोज स्वागत करता है ,माला पहनाता है ,दावते देता है और फोटो खिंचवा कर गौरवान्वित होता है ।
बिजली नहीं आती कोई बात नहीं अपनी व्यवस्था के अनुसार ,हाथ का पंखा ,जेनरेटर ,इन्वेर्टर इत्यादि लगाव लेता है ,पानी नहीं या गन्दा आत्ता है तो हैण्ड पम्प ,जेट ,आर ओ लगवा लेता है या पानी के बोतल लेने लगता है ।अपनी सुरक्षा के लिए या तो गार्ड रख लेता है नहीं तो कट्टा खरीद लेता है और ये भी नहीं तो घर की छत पर बोतले और इंटें इकट्ठी कर लेता है । कितनी सहनशक्ति है आगरा में ।जी हाँ आगरा में जो अधिकारी गलती से भी आ जाता है वो इस शहर से इतना प्यार कर बैठता है की फिर जाना ही नहीं चाहता ।आगरा के लोग भी उसके प्यार में अभिभूत हो जाते है और उसका गुणगान करते है । नेता कुछ न करे बस मन की बात करता रहे वो सर पर बिठा लेते है उसको । है न मेरा आगरा महान ?
क्या मेरा आगरा कभी सचमुच अंतरास्ट्रीय शहर बन पायेगा ? क्या कभी यहाँ के एम् पी ,एम् एल ए ,जिला परिषद के अध्यक्ष ,मेयर ,अन्य ऐसे लोग जो विभिन्न समाजों और वर्गों या संस्थानों के ठेकेदार है अपनी पार्टी ,जाती धर्म ,अहंकार सब छोड़ कर इकट्ठे होकर आगरा के लिए खड़े हो पाएंगे ? क्या कभी आगरा सर उठा कर कह सकेगा ;मै आगरा हूँ जो सम्पूर्ण भारत की राजधानी रहा हूँ ,मै आगरा हूँ जहा दुनिया का एक आश्चर्य ताजमहल है ,मै आगरा हूँ बड़े बड़े शायरों ,लेखको,कवियों को पैदा करने वाला ,मै आगरा हूँ दुनिया में भारत की एक मजबूत पहचान ,जी हाँ मै आगरा हूँ और मुझे अपने होने पर गर्व है । मेरे शहर के नेता और अफसर और हम भी केवल बत --दी नहीं करते है बल्कि देखो हमने कर के दिखा दिया ,आगरा के अधिकारों को छीन कर दिखा दिया ,हमने आगरा को अंतररास्ट्रीय शहर बना कर दिखा दिया । देखो इसके चारो ओर हरियाली से घिरा हुआ चौड़ा रिंग रोड ,देखो स्वच्छ पानी की व्यवस्था ,देखो अनुशासन से बिना रुके चलता हुआ ट्रैफिक ,चारो ओर सफाई खूब सारी हरियाली । कोई लूट नहीं बस सबमे सुरक्षा का अहसास ।बाजार में लूट के बजाय सही दामो पर बिकता सामान ,शहर के बाहर बड़ी बड़ी बिल्डिंगे जिनमे तमाम अंतररास्ट्रीय कम्पनियाँ है और उनसे मिला हुआ लाखो को रोजगार । अब आगरा के लोग पढ़ने और नौकरी के लिए बाहर नहीं जाते बल्कि प्रतिभाएं आगरा आ रही है । जी हाँ ये देखो सर उठा कर बोलता हुआ मै हूँ आगरा ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
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