समाज हो या सरकार, आगे तभी बढ़ सकते हैं, जब उनके पास सपने हों, वे सिद्धांतों कि कसौटी पर कसे हुए हो और उन सपनों को यथार्थ में बदलने का संकल्प हो| आजकल सपने रहे नहीं, सिद्धांतों से लगता है किसी का मतलब नहीं, फिर संकल्प कहाँ होगा ? चारों तरफ विश्वास का संकट दिखाई पड़ रहा है| ऐसे में आइये एक अभियान छेड़ें और लोगों को बताएं कि सपने बोलते हैं, सिद्धांत तौलते हैं और संकल्प राह खोलते हैं| हम झुकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं और कहेंगे, विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा|
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2020
संगम इलाहबाद का
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
सोमवार, 7 दिसंबर 2020
#जिंदगी_के_झरोखे_से #1980_बनारस
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
रविवार, 22 नवंबर 2020
पूरा भारत कभी नही लड़ा
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
शुक्रवार, 20 नवंबर 2020
#जिंदगी के झरोके से ,राजेन्द्र शर्मा और शकील
जिंदगी_के_झरोखे_से
#दो_घटनाए_जो_मेरा_अवगुण_बताती_है_और_नेता_से_दूर_करती_है
1--मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे और एक सेठ के बुलावे पर आगरा आये जो मेरी निगाह मे निरर्थक और गैर राजनीतिक फैसला था ।उससे तुरंत पहले पार्टी के महानगर अध्यक्ष की मा का देहांत हो गया । अध्यक्ष मुलायम सिंह द्वारा सीधे बनाये हुये थे जिनका राजनीति से कोई सम्बंध नही था पर वो आयकर के वकील थे और है ।ना मेरा तब सम्बंध था और ना फिर कभी मुलाकात हुयी आजतक उस वकील साहब से पर मै पागल आदमी हूँ ।
मुलायम सिंह यादव उस सेठ के घर दूर गाँव के इलाके मे गये और जब किसी के घर मुख्यमंत्री आ रहा हो और वो भी सेठ तथा व्यापारी के घर तो भव्य कार्यक्रम तो होना ही था और फिर भव्य दोहन भी होना होता ही है ।
उनके कार्यक्रम मे महानगर अध्यक्ष के घर जाने का कोई कार्यक्रम नही था और उस वक्त पार्टी मे मुह लगे लोग भी इस विचार के नही थे की वो किसी के घर जाये चाहे कोई भी मर गया हो ।
पर मुझे ये बात पार्टी के सिद्धांतो और मुलायम सिंह यादव के बारे मे जो वर्षो मे हम लोगो ने इमेज बनायी थी उसके खिलाफ लग रही थी ।
लखनऊ वापस जाने के लिए मुलायम सिंह एयरपोर्ट आये उसके पहले ही मैने डी एम संजय प्रसाद से कह कर रूट साफ करवा लिया । ज्योही मुलायम सिंह जहाज की सीढ़ी की तरफ बढे मैने रोक कर अपने उद्गार व्यक्त कर दिये कि ये आप की पहचान के खिलाफ है कि आप किसी सेठ के घर आकर वापस चले जाये और पार्टी अध्यक्ष की मा का निधन हुआ है और वहा दो मिनट भी न जाये ।
तो वो थोडा झुझलाये पर विचलित भी हुये और बोले की अब देर हो गई है और जाना भी चाहे तो 2 घन्टा समय चाहिये । मैने कहा नही मुश्किल से 30 मिनट जाना आना और 5 मिनट रुकना तो बोले पूरी सड़क भरी होगी और वो आप के घर के पास ही तो रहते है कैसे पहुच जायेंगे ? तो मैने कहा की मैने पहले ही रूट लगवा दिया है ।फिर नाराज हुये की हमसे पूछे बिना कैसे करवा दिया और डी एम की तरफ देखने लगे ।संजय प्रसाद ने आंखे झुका लिया और बोले की हा सर इन्होने कहा की चल सकते है तो इन्तजाम कर दिया गया ।
और फिर वही हुआ और 40 से 45 मिनट मे अध्यक्ष की इज्जत और मन भी रह गया और मुख्यमंत्री की इज्जत भी रह गई ।पर मुलायम सिंह ने मुझसे कोप तो पाल ही लिया ।
2--मुलायम सिंह यादव इटावा से दिल्ली जाते हुये मेरे घर पर प्रेस से मिल कर जाने वाले थे जो अकसर होता था । एक हमारा कार्यकर्ता था शकील जो खन्दारी बूथ का मजबूत कार्यकर्ता था उसके घर मे मौत हो गई थी । वो स्कूटर मकेनिक था और पास के चौराहे पर जमीन पर ही बैठता और काम करता था । मैने उसको खबर करवा दिया कि वो अपने घर पहुच जाये और दो और उसी मुहल्ले के कार्यकर्त्ताओ को भी भेज दिया ।
जब मेरे घर से चाले तो मै गाडी मे था और मैने मुलायम सिंह जी से कहा की एक मजबूत कार्यकर्ता है उसके साथ ऐसा हो गया है और उसका घर रास्ते ने पड़ेगा । तो वो बोले की गाडी वहा तक जायेगी ।मैने कहा की थोडा सा पैदल चलना होगा पर जरूरी है ।
वहा पहुच कर हम लोग उतरे और करीब 5/ 600 मीटर पतली सी गली मे पैदल चले ।ये बस्ती बघेल मुस्लमान जिनको मैने पार्टी से जोड़ लिया था और दलितो की बस्ती है । ब्लैल कैट कमांडो और हम लोगो को देख कर पूरी बस्ती मे मिंनटों मे बात फैल गई । उस कार्यकर्ता के घर मे मुलायम सिंह को बैठाने के लिए कुछ नही था ।5 मिनट खड़े खड़े हाल चाल हुआ और जब हम लोग उसके घर से निकले तो सारी छते और पूरी गली भरी हुयी थी और अगले दिन ये किस्सा शहर भर मे चर्चा का विषय बन गया था कि मुलायम सिंह तो छोटे से छोटे कार्यकर्ता का भी ध्यान रखते है ।
समाज मे किसी को नेता बनाना और उसकी छवि बनाना आसान काम नही होता है और उसके लिए बडी सोच और बडा दिल रखना पडता है और कोपभाजन का शिकार भी होना पडता है ।
शायद इन्ही अवगुणौ के कारण बड़े नेता मुझसे नाराज ही रहते थे और कार्यकर्ता भी आप का वजन देखकर ही आप के साथ रहता है ।
पर मैं जैसा हूँ ठीक हूँ
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
#जिंदगी_के_झरोखे_से#पता_नही_कितने_लोग_मरे_होते
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
मंगलवार, 17 नवंबर 2020
बचपन वाला चंदा मामा
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
सोमवार, 16 नवंबर 2020
1977 शिक्षा मंत्री से चर्चा
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
रामगोपाल का पहला चुनाव
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
#जिंदगी_के_झरोखे_से अयोध्या अन्दोलन का सच
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
वो बच्चा और राम
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
सोमवार, 2 नवंबर 2020
आगरा रामलीला मैदान देवीलाल की रैली
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
सोमवार, 22 जून 2020
चीन और नेपाल के बहाने
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
बुधवार, 21 अगस्त 2019
वो अकेला बुजुर्ग पडोसी
वो अकेले बुजुर्ग पडोसी
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मेरे पड़ोस में रहते है
वो अकेले बुजुर्ग इंसान
बहुत दिनो क्या सालो से
जानता हूँ उन्हें मैं
और
बहुत अच्छी है उनसे पहचान
पहले उनका घर भरा भरा था
फिर
धीरे धीरे खाली होता चला गया
कुछ चाहे और कुछ अनचाहे
अचांनक अकेले हो गए वो
कभी बैठने लगे मेरे साथ
और बताने लगे
अपनी पूरी बात
पहले
उनके पास बहुत लोग आते थे
जब वो कुछ थे
और बहुत लोग
उनकी उंगली पकड़ कर
क्या क्या हो गए
तब तो हालत ये थी
किसी के घर मौत भी
हुयी हो
तो फोन करता था
की आप जल्दी आइये
अर्थी उठने वाली है
आप का ही इन्तजार है
शादी हो या कुछ
कितने लोग बुलाते थे
वो लोग जो कहते थे कि
आप का ज्ञान रौशनी देता है
और आप के बिना तो
कार्यक्रम हो ही नहीं
सकता
पर दिन बदलते ही वो सब कही बिला गए
अब कोई नहीं आता
कोई नहीं बुलाता
सबको बना दिया
पर ये जहा के तहा रह
गए
जब कोई उनका अपना
धोखा देता या
कर देता पीठ पर वार
तो ये रहते थे बहुत दुखी
और बेक़रार
फिर झाड कर गम की धूल
लग जाते थे फिर उसी काम में
पर
तमाम झटको से भी नहीं टूटे थे वो
मैने देखा है
बहुत ही संघर्ष किया उन्होने
पर जब अपने साथ थे
क्या मजाल उनके चेहरे पर
शिकन भी आई हो कभी
लेकिन
बहुत उदासी पसर आई उनकी आंखो मे
जब से अकेले हो गए वो
उनके बच्चे भी चले गए दूर
अपनी अपनी जरूरी वजहों से
उनकी सहमती और ख़ुशी के साथ
बहुत प्यार करते है
उनके बच्चे उन्हे और उनकी चिंता भी
पर मजबूरिया अपनी जगह है
ढाल लिया इस बुजुर्ग ने खुद को हालात में
अक्सर देखता हूँ
उन्हें सुबह बाहर निकल कर
लान से
तुलसी की पत्तियां तोड़ते
बताते है
की उनसे अच्छी चाय
कोई नहीं बना सकता है
सेंक लेते है ब्रेड और
काट लेते है कोई फल
हो जाता है उनका नाश्ता
बताते है
की वो बहुत हेल्दी नाश्ता करते है
नौकर चाकर क्या खिलाएंगे ऐसा
अक्सर दिखते है कपडे फैलाते और उतारते
मैंने कहा
क्यों खुद करते है ये सब
और इस उम्र में
बोले कसरत भी है
और पैसे की बचत भी
मैंने पुछा की आप को क्या कमी
तो बस मुस्करा कर रह गए
मंगाते है खाना है कभी कभी
शायद दो दिन में एक बार
मैंने पूछा की आप को तो
ताज़ा और गर्म खाने की आदत थी
बोले खाना ज्यादा होता है
और
फेंकना सिद्धांत के खिलाफ है
कितनो को तो ये भी नहीं मिलता है
और
क्या बिगड़ता है खाने का फ्रिज में
अंग्रेज तो बहुत दिन तक फ्रिज का ही खाते है
मैंने पुछा की पहले तो आप कहते थे
रोज नए नए रेस्टोरेंट में जाऊंगा
और
नए नए पकवान खाऊंगा
तो बोले तबियत का भी ध्यान रखना है न
और
अकेले जाना अच्छा भी नहीं लगता
और रोज जाने मे खर्चा भी कितना हो जायेगा
कभी कभी बहुत खुश होते है
जब आने वाला होता है उनका कोई बच्चा
घर की सफाई ,बिस्तर की चादर
और सब तैयारी में लगे रहते है
कई दिन तक
फिर जब तक बच्चे साथ होते है
दिखते ही नहीं है बाहर कई दिन
बच्चो के जाने के बाद कई दिनों तक
कुछ गुनगुनाते रहते है
और
बच्चो के यहां से आने के बाद भी
कई दिन उदास होते है
तब पूछना पड़ता है क्या हुआ
बोले की एक तो अकेला होने के कारण
न आराम और न चैन से बाथरूम ही जा पाते है
बज जाती है तभी घंटी
कौन देखे की कौन है
और
हमेशा कुछ न कुछ हो जाता है
कभी दूध गर्म करते है
और बाहर कोई आ गया
और दूध गिर जाता है पूरा
चाय भी
कभी सब्जी जल जाती है
तो कभी रोटी खाक हो जाती है
पुछा की फिर क्या करते है आप
बोले अगर दिन में होता है
तब तो हो जाता है
पर जब रात में जल जाती है
तो खा लेते है मुट्ठी भर चना
या अगर ब्रेड है तो वो
नहीं तो एक कप दूध पीकर सो जाते है
और
बोले उस दिन सुबह बहुत ही अच्छा लगता है
हल्का हल्का
पर प्लीस मेरे बच्चो से कभी कह मत देना
की मैं भूखा भी सोता हूँ
वो सब वैसे ही मेरी बहुत चिंता करते है
परेशांन रहने लगेंगे
उन लोगो के खुश रहने
और मस्त रहने के दिन है
उस दिन बहुत दुखी थे
मैंने पुछा क्या हुआ
बोले
पता नहीं मैंने पिछले जन्म में
कितनो के साथ बुरा किया है
की जिनके लिए सब कुछ करता हूँ
वो सब पीठ पर वार कर चले जाते है
जाने दो पिछले जन्म का कर्जा ही चुका रहा हूँ
और
फिर जोर से ठठाकर हँसे
और चल दिए
मैंने कहा कहा चले
बोले किसी और को ढूढने
जिसका पिछले जन्म का कर्जा हो
कभी कभी जब बीमार हो जाते है
तो दिखलाई नहीं पड़ते
मिले तो पुछा क्या हो गया था
बोले कुछ नहीं
बताओ और क्या हो रहा है
बहुत कुरेदा
तो बोले मेरा दुःख तो
कोई बाँट नहीं सकता
लेकिन मैं अपने थोड़े से सुख
तो बाँट सकता हूँ
आइये कुछ अच्छी बाते करे
एक दिन कुच्छ ज्यादा परेशांन थे
मैंने पुछा आज क्या हुआ
बोले एक चिंता है
मुझे कुछ हो गया तो
दरवाजा तोडना पड़ेगा घर का
कितनी दिक्कत होगी न बच्चो को
कितने परेशान हो जायेंगे मेरे बच्चे
और खुला रखना भी मुश्किल है
और
उनकी आँखों से टपक गया कुछ
बाँध जो रुका था काफी दिनों से
शायद टूटना ही चाहता था
कि
वो इधर उधर देखने लगे
और खांसने लगे
खुद को रोकने को
और मुझे भरमाने को
फिर धीरे से उठ कर चले गए
कई दिनों से नहीं दिखे है वो बुजुर्ग
मुझे भी उनकी आदत पड़ गयी है
मैं लगातार ढूढ़ रहा हूँ
और
झांक आता हूँ उनके घर की तरफ
लेकिन बस सन्नाटा ही सन्नाटा
मिलेंगे तो पूछुंगा उनके इधर के नए अनुभव
और
सुनुगा उनका खोखला ठहाका
और फिर मैं भी सर झुका कर
कुछ छुपा कर चला जाऊंगा
अपने घर की तरफ
जहा मेरे अपने इंतजार में होते है ।
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .
सोमवार, 19 अगस्त 2019
ट्रंक काल
ट्रंक काल
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पहले भी होता था फोन
पहले तो बड़ा सा काला सा
बात किसी से होती थी
सुनते सब थे पास बैठे हुए
बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे
और कार्डलेस भी
पर उससे पहले
लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे
लोगो के यहाँ क्या
शहर भर में
कुछ गिने चुने लोगो के यहां
होते थे फोन
और
वो बहुत रईस होने की निशानी था
गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी
नहीं था कोई फोन
और बुक करनी होती थी ट्रंककाल
बहुत से लोग बुक करते
और बुक करने को लाइन में लगे होते
पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात
नहीं मिलता था फोन तब
जिसका मिल जाता था
वो विजयी भाव ओढ़ लेता था
और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे
ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की
एक इंतजार करता था काल लगने का
और खाने या सोने चला जाता था
जी हां ट्रंककाल लगना भी तब
ईश्वर की कृपा
और किस्मत की बात थी
जब मिल जाता था फ़ोन
तो चीखना पड़ता था
की आवाज वहा तक पंहुच जाये
कई बार तो हेलो हेलो
आप सुन रहे है न
कहता ही रह जाता था आदमी
और काल कट जाती थी
कई कई बार में बात हो जाती थी
और
नहीं भी हो पाती थी
जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल
तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल
जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन
और ४ जी तथा ३ जी
उस थ्रिल को बस
महसूस कर सकते हो
अतीत में जाकर
जरा जाकर महसूसो
और सोचो की
अपनो की जिंदगी
कितनी मुश्किल थी पहले
ट्रिन ट्रिन
मिल गया मेरा ट्रंक काल
तो मिलते है ट्रंक काल के बाद
हा मै हूँ और मेरी तन्हाई मेरे साथ है ,मेरे सपने मेरे साथ है .जिम्मेदारियों का अहसास भी साथ है जो मुझे हारने नहीं देते .अकेलापन ओढ़े हुए मै चल रहा हूँ लगातार की कोई तों मेरी भी मंजिल होगी जहाँ मै रहूँगा और तन्हाई नहीं होगी .चलना ही जिंदगी है .