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सोमवार, 19 अगस्त 2019

ट्रंक काल


ट्रंक काल

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पहले भी होता था फोन

पहले तो बड़ा सा काला सा

बात किसी से होती थी

सुनते सब थे पास बैठे हुए

बाद में आये नाजुक से रंग बिरंगे

और कार्डलेस भी

पर उससे पहले

लोगो के यहाँ फ़ोन भी नहीं होते थे

लोगो के यहाँ क्या

शहर भर में

कुछ गिने चुने लोगो के यहां

होते थे फोन

और

वो बहुत रईस होने की निशानी था

गाँव क्या ब्लोक और तहसील में भी

नहीं था कोई फोन

और बुक करनी होती थी ट्रंककाल

बहुत से लोग बुक करते

और बुक करने को लाइन में लगे होते

पूरा दिन निकल जाता और पूरी रात

नहीं मिलता था फोन तब

जिसका मिल जाता था

वो विजयी भाव ओढ़ लेता था

और बाकि उसे इर्ष्या से देखते थे

ड्यूटी लगती थी परिवार के लोगो की

एक इंतजार करता था काल लगने का

और खाने या सोने चला जाता था

जी हां ट्रंककाल लगना भी तब

ईश्वर की कृपा

और किस्मत की बात थी

जब मिल जाता था फ़ोन

तो चीखना पड़ता था

की आवाज वहा तक पंहुच जाये

कई बार तो हेलो हेलो

आप सुन रहे है न

कहता ही रह जाता था आदमी

और काल कट जाती थी

कई कई बार में बात हो जाती थी

और

नहीं भी हो पाती थी

जी हा ऐसा होता था ट्रंककाल

तुम क्या जानो बाबु ट्रंक काल

जिसके हाथ में है एंडोरायड फोन

और ४ जी तथा ३ जी

उस थ्रिल को बस

महसूस कर सकते हो

अतीत में जाकर

जरा जाकर महसूसो

और सोचो की

अपनो की जिंदगी

कितनी मुश्किल थी पहले

ट्रिन ट्रिन

मिल गया मेरा ट्रंक काल

तो मिलते है ट्रंक काल के बाद

मेरा पहला फोन

जब लगा था मेरे घर नया नया फोन
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एक दिन फोन मंत्री मिल गए
और
पूछ लिया घर में फोन है
लागा जैसे कुछ अपराध
या हीनता है
घर में फोन नहीं होना
बहुत मुश्किल से मुह से निकला था
नहीं
हम कैसे रख सकते है फोन
हम तो साधारण आदमी है
कहा से देंगे उसका पैसा
उन्होंने जारी कर दिया एक आदेश
एक कमिटी का सदस्य बनाने का
और
जब आयी थी उसकी चिट्ठी
क्या ख़ुशी थी
जैसे
कितना बड़ा कुछ मिल गया
पिता जी ने
कई लोगो को जाकर बताया था
उसके बारे
कुछ दिन में लगा गया
वो लाल रंग का फोन
ये भी उन दिनों खबर थी
अख़बार के लिए
जानने वालो और
आसपास के मुहल्ले के लिए
मिलने लगी बधाइयाँ
और मांगे जाने लगे नंबर
अपने फोन तो शायद ही कभी आते हो
क्योकि अपनों के पास नहीं थे फोन
पर जब पहली बार घंटी बजी
तो सभी अजीब कशमकश में थे
की क्या करे
पिता जी ने
आगे बढ़कर उठाया था चोगा
बस इतना ही पुछा था
कौन साहब है आप
किसी अपने का फोन था
पूरा परिवार देख रहा था गर्व से
किसी आश्चर्यजनक चीज की तरह
मैंने जब पहली बार उठाया था
तो उठाने से पहले रटता रहा
की हेल्लो कहना है
पर दूसरो के तमाम फोन आने लगे
और बढ़ गयी थी रौनक घर में
कुछ दिन तो
गर्व की अनुभुती होती रही
पर फिर मुसीबत बन गया फोन
जब किसी ने चुपके से
कही बाहर का फोन मिला दिया
और आ गया बड़ा सा बिल
उस ज़माने के हिसाब से
तब ध्यान रखना पड़ता था
की सभी काल को लाक करके रखना है
पर
लोगो के फोन का कोई समय ही नहीं था
अपनी जिंदगी ही अपनी नहीं रह गयी
सुबह से रात तक कोई न कोई
आकार इन्तजार करता था
अपने फोन का
खाना पीना भी मुश्ल्किल
और
अपनी बात करना भी मुश्किल
जी हा
फोन
मुसीबत का सबब भी था तब फोन
पर स्टेटस का सिम्बल था
तो सब कुछ बर्दाश्त करते थे लोग

रविवार, 18 अगस्त 2019

चिट्ठियां

जी
पहले चिट्ठियां होती थी
सूचना
और
सुख दुःख जानने का साधन
चिट्ठियां भी कई तरह की होती थी
इतना खुला था हमारा जीवन
और हमारा समाज
कि
खुले पोस्ट कार्ड पर
सब कुछ लिख कर भेज देते थे लोग
किसी से कोई धोखा नहीं होता था
क्योकि ये सस्ता होता था
पैसा नहीं होता था लोगो के पास
बस भावनाए और जुडाव होता था
एक चिट्ठी ऐसी भी होती थी
जिस पर टिकेट नहीं लगा होता था
वो भेजने वाले तीन तरह ले लोग होते थे
या तो गरीब रिश्तेदार
या दूर पढ़ रहे छात्र
या फिर वो जो चाहते थे
कि
चिट्ठी हर हालत में मिल जाये उसे
जिसके लिए भेजा है
क्योकि डाक टिकेट का पैसा
उसी से लेना होता था
इसलिए डाकिये की मजबूरी थी
पाने वाले के हाथ में चिट्ठी देना
अंतर्देशीय भी था जो बंद रहता था
पर थोडा महंगा
इसलिए या तो
उसका खर्च वहनं कर कर सकने वाले
लिखते थे इसमें
या फिर कोई गोपनीय बात होने पर
लिखा जाता था ये पत्र
गाँव में तो डाकघर और डाकिया
दोनों वाही के होते थे
पर कोई नहु झांकता था
किसी के पत्र में
किसी का पत्र तभी पढता था
जब वो खुद पढने को कहता था
रजिस्टर्ड  डाक तो
खैर विरले ही भेजते थे
खास कारणों से
चिट्ठिय भी तरह तरह की होती थी
किसी के कोने पर थोड़ी सी हल्दी का रंग
तो किसी पर लाल रंग
हल्दी किसी शुख सूचना के लिए
तो लाल रंग
आशिक के दुःख की निशानी था
और ये बताने की कोशिश
की ये खून से लिखा है
गाँव की चिट्ठियों में
सबके हालचाल पूरे गाँव सहित के साथ
गाय बैल उसकी बीमारी
जो बीमार था ठीक हुआ या नहीं
फल गाय या भैस दूध दे रही या नहीं
और कितना दूध दे रही है
कौन कौन पीता है दूध
बाबा भी पीते है या नहीं
और जिसको बच्चा होना है
उसे मिलता है या नहीं
बगीचे का क्या हाल है
कौन कौन से फल कितना लगा है
किस किस खेत की जुताई हो गयी
किस खेत में पानी लग गया
धन रोपा गया या नहीं
और कौन सी फसल कितनी होगी
इत्यादि जरूर होता था
कोई बीमार था गाँव में तो क्या हुआ
किसका इलाज हो रहा है
और मर गया तो कैसे
और
सब सुख दुःख बताने के बाद
और ये बताने के बाद की फल मर गए
सुखा पड़ गया या बाढ़ में सब बह गया
भैस या गाय मर गयी
वो बच्चा पैदा होते ही मर गया
अंत में ये जरूर लिखा होता था
अपना ध्यान रखना 
यहाँ बाकि सब कुछ ठीक ठाक है
पति पत्नी की चिट्ठिय गोपनीय होती थी
इसलिए उनका ब्यौरा भी लिखना ठीक नहीं
सारे आशिक अंत में जरूर लिखते थे
लिखा है ख़त खून से स्याही न समझाना
शहर की चिट्ठिया इतनी मजेदार नहीं होती थी
इसलिए उन पर भी क्या लिखना
हां तार भी होता था
जो बहुत ही भयानक होता था
तार आने का मतलब ही होता था
की कोई जरूर मर गया
तार खोलते वक्त पढने से पहले ही
रोना धोना शुरू हो जाता था घर में
चाहे किसी ख़ुशी को जल्दी से बताने को
भेज दिया हो किसी अपने ने
तार आने की खबर पूरे गाँव में
और
उस समय के शहरी मुहल्लों में भी
बहुत जल्दी फ़ैल जाती थी
और लोग मुह लटकाए आने लगते थे
दुःख बांटने
चिट्ठिय सहेज कर राखी जाती थी
किसी कोने में या किसी संदूक में
एक और रिवाज था
चिट्ठी आने पर
पूरे परिवार को इकट्ठा कर पढने का
पढना भी तो गाँव में कोई कोई ही
जानता था
वही सबकी चिट्ठी बांचता था
अगर दूर रह रहे पति की चिट्ठी
पत्नी के लिए होती थी
तो कुछ पढ़ कर कुछ छोड़ देता था
और कह देता था
की बाकि बात
वो अपनी मेहरारू को बता देगा
और वो आकर बता देगी
तब कुछ ऐसी ही मर्यादाये होती थी
कोई दुःख का समाचार
चिट्ठी बांचने वाले की अचानक
हिलते हुए ओठो और आँखों से
ही पता लग जाता था
क्योकि कुछ पल वो चुप हो जाता था
दुःख दूसरे का था पर सब रोते थे
जसे
पहले लड़की किसी की भी विदा होती थी
पर रोता पूरा गाँव था
फिर रोना पूरा कर वो बांचता था चिट्ठी
कुछ चिट्ठिय छुपा कर भी रख देने का रिवाज था
कुछ घर में षड़यंत्र के कारण
और कुछ हंसी ठिठोली के लिए
इतिहास में तो चिट्ठियों ने
बड़ी बड़ी क्रांतियाँ करवाई है
तो ज्ञान का प्रसार की किया है
बहुत से जाने मने लोगो की चिट्ठिया
तो आज तक रौशनी का काम करती है
अगर प्रकाशित हो गयी है
या पाण्डुलिपि के तौर पर मौजूद है
क्या होता था जब कोई अपना
कही चला जाता था
तो रोज डाकिये का इन्तजार करना
और
अकसर डाकघर तक चले जाना
पूछने के लिए
की
हमारी कोई डाक है क्या
मिल गयी तो नेमत पाने की ख़ुशी
और नहीं तो उदस होकर लौटना
कितना रोमांच था जिंदगी में
बहुत सी चिट्ठिया
असली भावना का प्रवाह होती थी
मन भी भीग जाता था और भावनाए भी
मेरे पास भी है
सहेज कर रखी हुयी कुछ चिट्ठिया
एक अपने पिता की आखिरी चिट्ठी
और कुछ अपने हमसफ़र की
जिन्हें मैं अक्सर पढता हूँ
अक्श उभर आते है हमेशा उनके
जब भी वो चिट्ठियां पढता हूँ
तो काफी दिन का  दर्द
आँखों के रास्ते बह जाता है
जी हाँ चिट्ठिया क्या होती थी
आज के लोग क्या जाने
और क्या जाने
उनके आने के इन्तजार
और
उनको बार बार पढने
तथा सहेजने का मज़ा
हो सके तो चिट्ठिया लिखिए
और न
यी पीढ़ी को लिखना सीखाइए
मोबाइल और फोन अपनी जगह है
और चिट्ठिया अपनी जगह
वाह रे चिट्ठियां




गुरुवार, 15 अगस्त 2019

स्वतंत्रता दिवस की बधाई

मैने #प्रधानमंत्री का आज भाषण तो नही सुना 
पर अभी उसके कुछ अंश पढे --
उनमे से 4 बातो का समर्थन करता हूँ --
बशर्ते ये खुद उनके प्रति इमानदार हो --
1- जल संजय का अभियान बहुत महत्वपूर्ण है भविष्य के लिए ।
2- जन संख्या नियन्त्रण का अभियान जरूरी है सभी के लिए 
यध्यपि दर लगातार घट रही है पर और घटनी चाहिये ।
3- एक्सपोर्ट बढ़ना चाहिये क्योकी इन 5 सालो मे बहुत घटा है और इम्पोर्ट बढा है जिससे असन्तुलन पैदा हो गया है और अर्थवयवस्था चर्मरायी है 
4- आधारभूत ढांचा विकास की कुन्जी है बशर्ते भ्रष्टाचार रहित हो ।
#वाजपेयी जी का नदियो को जोडने का सपना भुला दिया गया जबकी वो प्राथमिकता पर होना चाहिये था ।
उससे जल संकट , सिचाई संकट और बाढ के संकट से काफी मुक्ति मिलेगी ।
बेरोजगारी इस समय पिछ्ले 5 सालो की नीतियो के कारण चरम पर है । 
उसके लिए युद्ध स्तर पर प्रयास और बड़े फैसलो की जरूरत है ।
पता नही #रुपया गिर रहा है या देश की सरकार की इज्जत गिर रही है की #डालर प्रधानमंत्री जी की उम्र को पार कर गया (यही कहा गया था मनमोहन सिंह जी के समय )
#आतंकवाद केवल कश्मीर सीमा के कुछ क्षेत्र तक सीमित हो चुका है ।
बल्कि 2014 तक ही और ज्यादा टूट चुका था जो इन 5 सालो मे फिर सर उठाया पर वही तक क्योकी पी चिदंबरम ने अपनी दृढता और सूझ बूझ से उसे उसकी औकात बता दिया था ।
इसलिये आतंकवाद को दिन रात रटने और उससे देश को आतंकित करते रहने की कोई जरूरत नही है ।
कब तक कोसेंगे पहले की सरकारो को ? और ये बतायेंगे की आप कोई बहुत महान और सुपर मैं है और कोई क्रांती कर रहे है ।
आज अगर कुछ उपलब्धियां भी है तो उन सरकारो के सकारत्मक और सुविचरित फैसलो के कारण है ।
नोटबंधी खुद एक समस्या बन गयी और उसकी आशंका पहले ही दिन मनमोहन सिंह ने व्यक्त किया था लेकिन ये भी कहा था की राष्ट्र को बचाने की आइये मिलकर बात करे और हल निकाले जो मोदी जी ने नही किया और ये जो आप ने पैदा भी किया और पाला पोसा भी इसका खमियाजा देश बहुत दिन तक भोगेगा ।उस पर आप ने बोलना बन्द कर दिया ।
कोई गुजरात माडल था उसका अब कोई जिक्र ही नही करते आप ।
कोई अच्छे दिन नाम की चीज थी उस भी मौन ।
100 दिन मे विदेश से काला धन आने वाला था पर न उसकी चर्चा और न उन नामो का ही खुलासा कर रहे है आप जो विदेश से मिल चुके है ।
भ्रष्ट नेताओ और अधिकारियो तथा व्यापारियो के लिए 100दिन मे विशेष अदालते बनने वाली थी और उनपर फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह कार्यवाही होनी थी उस पर भी मौन है बल्कि उन आरोपो से घिरे लोगो की खुद की पार्टी मे शामिल कर रहे है ।
पैट्रोल 30 रूपये देने के वादे का क्या हुआ जब बाहर से अब मनमोहन से के समय से एक तिहाई दर पर कच्चा तेल आ रहा है 
15 लाख तो आप अध्यक्ष खुद ही जुमला बता चुके है 
पर 2 करोड हर साल नौकरी पर भी आप चुप है 
जी एस टी को भी आज़ादी के बराबर दर्जा दिया आप ने लेकिन उसने व्यापार की कमर तोड दी और रोज परिवर्तन करने के बावजूद अभी तक देश पटरी पर नही आ पाया है ।
विदेश नीति पर मैने 15 मई 2014 को ही आशंका व्यक्त किया था की कही सालो की मेहनत बर्बाद न हो जाये ।
ये आप का दिल और आप के लोग जानते ही है की इस मामले 
मे हम कहा खड़े है ।
मुझे लगता है कि किसी भी प्रधान मंत्री को अपने भाषण मे अपने पूर्व मे किये गये जनहित तथा देशहित के वादो के पूरा किये जाने और कहा तक हो गया बताना चाहिये 
और अन्त मे भविष्य की बडी योजनाओ की घोषणा कर उस बातो के लिए सम्पूर्ण देश का आह्वान करना चाहिये और सहयोग मांगना चाहिये जो बडी चुनौतिया है और जिसमे पूरी जनता और सभी पक्षो की भागीदारी की आवश्यकता है ।
और अन्त मे कम से कम 15 अगस्त और 26 जनवरी को राजनीती और तुच्छ राजनीती से दूर रहना चाहिये और लगना चाहिये की सम्पूर्ण देश का राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री बोल रहा है ।
अन्त मे मीडिया के लिए -
मैं 2014 से हर साल इन्तजार करता हूँ की क्या टीवी के स्क्रीन को बराबर दो भागो मे बांट कर किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री का भी लगातार पूरा भाषण दिखाया जायेगा जैसा उस वक्त किया गया था जब आधा आधा स्क्रीन पर प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी जी की दिखाया गया पूरे टाईम बल्कि कई टीवी वालो ने प्रधानमंत्री से ज्यादा मोदी जी का भाषण दिखाया था 
और तब न किसी को स्वतंत्रता दिवस की गरिमा दिखी थी और न प्रधानमंत्री की ।
इस बार नही तो अगले साल शायद ऐसा दृश्य दिखे और कोई विपक्ष का मुख्यमंत्री उसी तरह दिखे ।
खैर 45 साल की सबसे बडी बेरोजगारी दर ,घटी हुई विकास दर ,घटे एक्सपोर्ट , घटी कृषी दर , बढे भ्रष्टाचार , कारगिल युद्ध से भी ज्यादा शहीद हुये सैनिको , देश पर 52 लाख करोड से 84 लाख हो गये कर्ज ,बेरोजगार हो गये 1करोड 10लाख लोग ,प्रति मिनट होते एक बलत्कार और जुमले पर झूमते मेरे देश को इस स्वतंत्रता दिवस की भी हार्दिक शुभकामनाएं ।
अब मोदी जी है तो जो भी करेंगे या बोलेंगे वो अपनी तय राजनीती और संघ के भावी एजेण्डे के तहत ही करेंगे ।
पर हम सब याद रखे की जब संघ ,हिन्दू महासभा इत्यादि अंग्रेजो के साथ खड़े थे तो लाखो लोग जेल मे थे या फिर लाखो फाँसी घर नही थे तो पेड़ो पर फासी से शहीद कर दिये गये या अंग्रेजो की गोलिया से शहीद हो गये ।
और उनमे से कोई न तो हिन्दू राष्ट्र के लिए शहीद हुआ था ,न खालिस्तान के लिए और न भारत मे किसी अलग राष्ट्र के लिए और न फ़ासीवादी तानाशाही व्यव्स्था के और न एक पार्टी की तानाशाही के लिए ।
ये सब शहीद अपने मूल अधिकार की सुरक्षा संपन्न राष्ट्र के लिए , आजादी के लिये और लोकतंत्र के लिए शहीद हुये थे ।
और सम्पूर्ण भारत को ये लगातार याद रखते हुये हर हाल मे शहीदो के सपनो और शहादत की लाज रखना चाहिये और अपने लोकतंत्र,सम्पूर्ण आज़ादी , सम्पूर्ण अधिकार और अपने संविधान की रक्षा करना चाहिये 
सरकार चलाने को बहुमत देती है जनता पर खुद को और और शहीदो की शहादत से मिली उपलब्धियो को छीनने को नही ।
बहुमत तानाशाही करने का लाईसेंस नही बन सकता है किसी भी लोकतंत्र मे ।
पर जिन लोगो ने स्वतंत्रता अन्दोलन की पीठ मे छुरा घोपा और आज़ादी मिलने से न खुश थे ,न इस झंडे से और न संविधान तथा लोकतांत्रिक व्यव्स्था से वो ताकते रौदने और छीनने की भरपूर कोशिश पर देश को महात्मा गांधी जी की दृढता और सत्याग्रह का रास्ता अपना कर इन ताकतो का रास्ता रोका ही होगा ।
हा अच्छे अच्छा कपड़ो और लच्छेदार भाषण तथा पूरे विश्वास के साथ बोले जा रहे असत्य और जुमलो के लिए प्रधान मंत्री मोदी और उनकी सम्पूर्ण जमात को बधाई और स्वतंत्रता दिवस की भी हार्दिक बधाई ।
और भारत के अपने भाईयो और बहनो के लिए -
महात्मा गाँधी जिन्दाबाद , सुभाष चन्द्र बोस जिन्दाबाद ,भगत सिंह जिन्दाबाद , अशफाक उल्ला खां जिन्दाबाद , सभी शहीद जिन्दाबाद जी आज़ादी की लडाई मे हुये या उसके बाद होते रहे ।
इंकबाल जिन्दाबाद ।
जय हिंद जय हिंद जय हिंद । 

सोमवार, 10 सितंबर 2018

बताशे वाला बाबा

बताशे वाला बाबा
( जीवन के झरोखे से एक कहानी )

रविवार का दिन और जाड़े की सुबह नाश्ता हो चुका था ।अखबार अभी पिताजी के कब्जे में था ।माँ नाश्ते से निपटी ही थी कि खाने की तैयारी में लग गयी थी । उधर ये फरमाइश भी की पानी गर्म हो तो सब नहाए वर्ना धूप का इंतजार करें । सूरज अभी जवान नही हुआ था पंर पूरब वाले पेड़ की डालियों और पत्तियों में से झांक रहा था और कुछ गर्मी का सा एहसास करवा रहा था ।
सब अलसाये से बैठे कुछ इधर उधर की चर्चा में व्यस्त थे कि दरवाजे की कुंडी खटकी , क्योकि 80 के आसपास घण्टी किसी किसी के यहाँ बजती थी , अधिकतर घरों में कुंडी ही खटकती थी ।
दरवाजा खोला तो सामने मिस्टर कार ( नाम थोड़ा बदल दिया है ) खड़े थे ।
थोड़ा परेशान लग रहे थे । बोला अंदर आइये तो जल्दबाजी में थे और बोले कि कुछ परेशान हूँ और कही जाने की जल्दी है । आप को लेने आया हूँ क्योकि जहाँ जाना है सुरक्षित स्थान नही लगता । जल्दी से तैयार हो जाइए और चाय पानी कुछ नही , बस चलिए ।
फिर चाय पानी के लिए मैने नहीं बल्कि मेरे पिता ने पूछा तो टालने की गरज से बोले कि बस आकर पीते है । अभी कुछ जल्दी है ।
मैं भी जल्दी से तैयार होकर उनकी बिल्कुल नई ली गयी फिएट कार में बैठ गया । तब उन्होंने बताया कि खेरागढ़ इलाके में एक गांव में चलना है , कुछ जरूरी काम है । वहाँ एक बहुत पहुंचे फकीर रहते है और सब कुछ उनका बताया हुआ सही निकलता है ।
मैंने उत्सुकता से पूछा आप का अच्छा कारोबार है फिर आप को क्या जानने की जरूरत पड़ गयी ।
मिस्टर कार ने टालना चाहा बस इतना कह कर की बताऊंगा और दूसरी बाते शुरू कर दिया ।
बातो बातो ने खेरागढ़ इलाके का वो इलाका आ गया तो कई जगह उतर उतर कर वहाँ के लोगो से कार जी कुछ पूछते और फिर आगे बढ़ते जाते और अंततः एक सुनसान जगह पर रुके और मुझे भी उतरने का इशारा किया ।
पास ही एक खेत मे एक झोपड़ी में पहुचे तो देखा वहां एक दाढ़ी वाला व्यक्ति बैठा था और दो गांव के लोग बैठे उसकी कुछ किस्सेबाजी सुन रहे थे ।
कार जी ने उसका पैर छुवा और जमीन पर ही पालथी मार कर बैठ गए । गोर चिट्टे और अमीर से दिखने वाले शख्स को देखकर वो लोग कुछ असहज हुए ये साफ दिख रहा था ।
दाढ़ी वाले ने थोड़ा हिम्मत जुटा कर पूछा बोलो बच्चा कैसे आये ? किसने भेजा यहाँ ,या यहाँ के बारे में बताया ? कार विनम्र होते हुए और कुछ दयनीय से बनकर बोले बाबा बस एक सवाल था कि मेरा काम बनेगा या नही बनेगा ?
उस तथाकथित बाबा ने लोटे में पानी भरा और उसमे बताशे डालने लगा ।
मैं उसका खेल समझ गया पंर कार की श्रध्दा के सामने कुछ नही बोलने का फैसला किया । ये भी समझ मे आ गया कि ये थोक में पहले से बताशे लेकर रखता है । आखिर यही उसकी दुकानदारी का हथियार जो है ।
वही हुआ जो विज्ञान के अनुसार होता है कि कुछ देर बाद पानी पूरा गाढ़ा मीठा हो जाने डाला जाने वाला बताशा तैरने लगा ।
बाबा बोला बच्चा तेरा काम हो जाएगा । कार ने कुछ पैसे उसके पैर के पास रख दिया जो उस समय के हिसाब से काफी था । और हम फिर गाड़ी में बैठे आगरा शहर की तरफ चल पड़े ।
अब मिस्टर कार का परिचय भी जानना जरूरी है । ये अमरीका से एक नही बल्कि डबल इंजीनियरिंग पास कर के कुछ साल पहले आगरा आये थे और पंखे के कुछ हिस्से बनाने की फैक्ट्री शुरू कर दिया था । काम बहुत अच्छा चल रहा था । इनका काम मेरे एक करीबी जानने वाले के कारण जमा और ऊँचाई पर पहुचा था । कुछ समय पहले ये एक दिन मेरे घर मेरे उस जानने वाले के साथ ही आये और चाय पीते हुए मेरे पिता की मौजूदगी में मुझे अपने साथ काम करने का आमंत्रण दिया । काफी बातचीत के बाद उनका प्रस्ताव मैने स्वीकार कर लिया ।
काफी जोर देकर मैने उनसे पूछा कि ऐसा क्या मामला है कि एक निहायत गंवार और जाहिल के पास जाना पड़ा ?
तब उन्होंने बताया कि जब वो अमरीका में थे तो वहाँ की आमदनी वही लगा दिया था और अब कुछ काम बढ़ाना चाहते है तो उन्हें पैसे की जरूरत है । पता नही उनका पैसा मिलेगा या नही और जहाँ पैसा लगा है कही वो बेईमान तो नही हो जाएंगे । लंबे समय से भारत मे रहकर उनकी ये मान्यता हो गयी थी कि कोई काम अपने आप और नियम से नही होता , कानून कुछ नही होता ,सब सिफारिश और घूस से ही होता हौ ,क्योकि यही तो देखा इन सालों में उन्होंने भारत आने के बाद ।
जब उन्होंने ये बात अपने किसी स्थानीय रिश्तेदार को बताई तो उसी ने इस बाबा के पास जाने की राय दिया ।
तब मैंने पूछा कि वैसे जहाँ आप ने पैसा लगाया है वहा से आप को कुछ कागज तो दिया गया होगा और कोई तरीका बताया गया होगा कि पैसा अगर वापस चाहिए तो कैसे मिलेगा ।
वो बोले कि हां एक पेपर है उसी में एक जग दस्तखत कर वहां भेजना है ।
मैंने पूछा कि क्या आप ने भेजा तो बोले कि वही भेज दूंगा तो मेरे पास तो कुछ रहेगा नही और वो कम्पनी मुकर गए तो पैसे मर जाएंगे ।
मैंने कहा कि उसकी फोटो रख लीजिए और जैसे वहाँ से कहा गया उसी तरह भेज कर देखिये वर्ना अमरीका हो आइयेगा क्योकि पैसा अधिक है पंर पहले उनके हिसाब से कर के देख लेना चाहिए । तो बोले कि अच्छा अभी फोटोकॉपी करवा लेते है और भेज देते है पंर कुछ गड़बड़ हुई तो आप की मेरे साथ अमरीका चलना ।
मैने कहा कि कुछ घुमाए और दिखाए तो चला चलूंगा हफ्ता दस दिन को पंर ऐसी जरूरत शायद पड़ेगी नही ।
दूसरे दिन उन्होंने वही किया पंर रोज परेशान रहते और पैसे मर जाने की शंका व्यक्त करते तो उस तथाकथित बाबा को याद कर आश्वस्त भी करते ख़ुद को ।
एक बार मैंने बताशे की कहानी और उसके विज्ञान पर बात करते हुए और ये कहने पर की आप अमरीका से इतनी पढ़ाई कर के आये है और इन बातो पंर कैसे विश्वास करते है तो कुछ झुंझला गए । मैने ही बात बदल दिया ।
कुछ दिन बाद मैं घर मे बैठा था कि कुंडी खटकी और कार जी सामने थे मिठाई का डिब्बा हाथ मे लिए हुए और खुशी से उनका चेहरा दमक रहा था ।
कुछ पूछते उससे पहले उन्होंने खुद मेरे पिताजी का पैर छूते हुए खुशी का कारण बताया कि मेरी बात सही साबित हुई और सिर्फ उनका पैसा ही नहीं आ गया बल्कि उसका पूरा इतने साल का हिसाब भी आया है और पूछा कि हिसाब में कोई दिक्कत हो तो वो सूचित करें । वो बोले जा रहे थे मेरे दिमाग मे एक  तरफ तो उनके अमरीका से डबल इंजीनियरिंग पढ़ने पर शंका हो रही थी तो दूसरी तरफ उस गंवार के सामने उनका परेशान हाल जमीन पर बैठने का दृश्य घूम रहा था ।
पर वताशे वाला सही निकल ही गया ।

रविवार, 23 जुलाई 2017

कौन उबरेगा मेरे शहर को इस श्राप से इन्तजार है आगरा को भी और मुझे भी |

कुछ लोग श्रापित होते है जैसे मैं वैसे ही लगता है की कुछ समाज ,देश और कुछ शहर भी श्रापित होते है | उसी में एक शहर है आगरा यानि मेरा शहर इतना ज्यादा श्रापित की कुछ भी कर लो इसका श्राप मिटता ही नहीं है | सालो हो गए पानी के लिए तरसते हुए ,एक अदद हवाई अड्डे के लिए तरसते ,किसी कारखाने के लिए तरसते ,तो कभी पासपोर्ट ऑफिस और कभी हाई कोर्ट के लिए लड़ते पर क्या करे श्राप आड़े आ जाता है |
वो श्राप ही शायद कारन है की आगरा के द्वारा बनाये गए सभी प्रतिनिधि को बढ़ाते और फलते फूलते जाते है पर आगरा सूखता जाता है |
श्राप जो है
कौन उबरेगा मेरे शहर को इस श्राप से
इन्तजार है आगरा को भी और मुझे भी | 

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

असंम में फिर बढ़ और लाखो लोग परेशानी में | हर वर्ष ही करेब करीब देश का बड़ा हिस्सा बाढ़ की चपेट में आता है वो चाहे बंगला देश की नदियों के कारन हो या अपने देश की नदियों के कारन ,वो भरी बारिश के कारन हो या बांधो के पानी छोड़ने के कारन पर तबाह तो हर साल vaइ लोग होते हैं |
कितने करोड़ लोग कुछ फिन बेघर हो जाते है तो कितने बंधो ,ऊचैयियो और सड़को पर प्लास्टिक के टेंट लगाकर कर तब तक की जिंदगी गिअरते है जब तक बाढ़ ख़त्म नहीं हो जाती है | बढ़ के बाढ़ यही लोग महामारियो और बीमारियों के शिकस होते है |
कभी कोइं जाकर तो देखे की कितनी मुश्किल और तबाह जिंदगी जीती है देश की ही बड़ी आबादी और इसमें बड़ी संख्या हिन्दू की ही होती है | ये अलग बात है की बाढ ही,आगजनी हो या कोई और आपदा मरता तो देश का गरीब ही है और ये आपदाए जाति और धर्म देख कर भी नही आती पर जाती और धर्म के गौरव का एहसास कर जबी वोट मिल जाता हो और पांच साल की सरकार बन जाती हो तो उनकी समस्याओ और जिंदगी के लिये कुछ करने की जरूरत भी क्या है |
आज़ादी के इतने साल बाद भी हम इन आपदाओ से अपनी जा नता को बचाने का रास्ता नहीं तलाश कर सके है | हमें फुर्सत ही नहीं है बड़े शहरो को और संवारने से और बड़ो को बनाने तथा बचने और बढाने से |
वक्त बहुत ध्यान से देख रहा है की ये उंच नीच की खाई ,उनसे ये दोहरा व्यवहार ,सत्तावो का ये दोहरा चरित्र ,कब तक चलेगा और देश सम्पूर्ण रूप से करवट कब लेगा जब उंच नीच की खाई कुछ कम हो सके और न्याय तथा सत्ता और सम्पत्ति तथा संसधानो बटवारा समानता से होगा |
फिलहाल तो मैं उन करोडो के प्रति संवेदना उअर दुःख ही व्यक्त कर सकता हूँ |
जय हिन्द |

मंगलवार, 27 जून 2017

कल अपने मित्र प्रोफ डॉ आर सी मिश्र नयूरो सर्जन जिन्हें मैं अपने क्षेत्र का जीनियस मानता हूँ से काफी दिन बाद मिलने गया | बहुत व्यस्त रहते है वर्ना तय तो ये था की वो मेरे घर आयेंगे और कुछ लम्बी चर्चा होगी बिना बाधा के |
पर उनकी मजबूरी है की उनका असमय उनका रहा ही नहीं | अच्छा भी रहा बहुत कुछ ज्ञान मिला और कभी मन में पीड़ा आ जाती है कई तरह की तो मैं लोगो से कहता रहां हूँ की कुछ देर किसी खतरनाक बीमारी के अस्पताल में बैठ जाओ और लोगो को देखो शायद अपनी पीड़ा बहुत छोटी लगने लगेगी |
यही मेरे साथ हुआ उन दो घंटो में जब तक वो मरीज देखते रहे और मैं तरह की मर्ज और पीडाएं देखता रहा |
और
सोचता रहा की इश्वर ने खुद मनुष्य को बनाया है अपनी कारीगरी से और पैदा किया है माँ पिता को माध्यम बना कर फिर सही सलामत क्यों नहीं पैदा किया है इतनी बीमारियाँ क्यों दे दिया है इन्सान को |
या तो पैदा ही मत करो इश्वर या फिर पूर्ण स्वस्थ ,पूर्ण सुखी ,सिर्फ अच्छाइयों के साथ सब पापा और बुराइयों से दूर क्यों अनहि रखते सभी इंसानों को ? क्यों दे दिए इतनी तरह के कष्ट की कष्ट भी शायद जार जार रो पड़ता होगा देख कर |
मुझे तो कुछ ऐसा ही लगा |
और मुझे अपनी दिक्कते बहुत छोटी लगने लगी फिर कुछ समय उनके साथ चाय पर अकेले थोड़ी सी अन्य चीजो पर चर्चा हुयी |
उनकी दी गयी जानकारियां और मेरी जानकारियां तथा वर्षो से बनी मेरी धरना बिलकुल विपरीत थी |
मुझे लगता है उसके लिए उनके साथ कुछ अधिक समय बैठने की जरूरत है |
क्योकि जरूरी नहीं की जो हम जानते है वही सत्य हो और वो नहीं सत्य कुछ और है तो स्वीकार कर लेने में बुराई भी क्या है |
देखते है क्या निकलता है और क्या होता है |
पर एक सच्चाई जरूर बता दूँ की उनकी कही काफी बाते सत्य साबित हुयी है पूर्व में |
ना ना ज्योतिष नहीं ज्ञान ,अनुभव और हजारो लोगो से मिलकर प्राप्त जानकारियों के कारण और इसके लिए उन्हें सलाम |

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

बहुत चिंतित हूँ कि क्या होगा भारत के लोकतंत्र का । जिस विचारधारा का भारत की आज़ादी की लड़ाई से कोई सम्बंध नहीं , जिनकी लोकतंत्र ,इंसान की आज़ादी और संविधान में आस्था नहीं वो जुमलों और अफ़वाह के दम पर लगातार मज़बूत होते जा रहे है और दूसरी तरफ़ अन्य राजनीतिक ताकते या तो व्यक्तिगत का शिकार हो या परिवार वाद का शिकार हो और नितांत निजी स्वार्थों में लिप्त हो सीमित दायरों  में क़ैद होती जा रही है या सीमित सोच में क़ैद है या अपने इन्हीं कारणों से अयोग्यता ,अदूरदर्शिता और अल्पज्ञानता  के बोझ तले दम तोड़ रही है और भविष्य का न तो चिंतन है उनके पास न ही वैकल्पिक संघर्ष का माद्दा ही ।
राष्ट्रीय आंदोलन से निकली कांग्रेस भी पहले ही अहंकार तले छिननभिन्न होती दिख रही  है और लगातार उसके स्तम्भ गिरते जा रहे है । जबरन अयोग्य नेतृत्व को थोपने की कोशिश और नितांत असुरक्षित लोगों का उसी को सुरक्षा कवच की तरह प्रयोग आत्मघाती बनता जा रहा है । दशकों से कांग्रेसी रहे लोग उसे छोड़ते जा रहे है और उन्हें सत्ता में बैठे  लोग लोग तो लपक ले रहे है पर कांग्रेस को कोई चिंता नहीं । कश्मीर से कन्यकुमारी तक , बंगाल से लेकर पंजाब तक और सुदूर पूर्व से लेकर गुजरात तक मजबूर मजबूर कांग्रेसियों को भगाया गया है कंफ्यूसिया कांग्रेसियों द्वारा ।
ऐसा लगता है की शतरंज के खिलाड़ी की कहानी दोहरायी जा रही है कांग्रेस में भी और बाक़ी कुछ अन्य वैसे ही नेताओं के यहाँ जिनकी आत्मप्रशंसा और सनक देश के प्रति कर्तव्यों पर भारी पड़ रही है ।
कुछ दिन पहले ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री ने कांग्रेस छोड़ और आज पता चला की गिरधर गोमांग भी सत्ता दल में है तो मैं हिल गया । कुछ और नामो के बारे में सुन रहा हूँ ।
पूर्व में ममता बनर्जी हो या मुफ़्ती मोहम्मद सईद या शरद पवार पूरे देश में अनगिनत लोगों को कांग्रेस ने खोया जो ख़ुद को साबित कर बड़े नेता सिद्ध हुए और उनके प्रदेश में उन्हें भगाने वाले बौने साबित हुए ।
पर लगता है की किसी आत्मचिंतन की ज़रूरत हीं नहीं समझती है कांग्रेस और आज़ादी के लिए तथा उसके बाद देश के लिए क़ुरबानी देने वाले अब देश ,लोकतंत्र , संविधान और आज़ादी की क़ुरबानी करने पर उतारू है ।
यही हालत अन्य नौजवान नेताओं की भी दिख रही है जो देश के पैमाने पर खड़े हो सकते थे ख़ुद भी और खड़ा कर सकते थे विकल्प भी लेकिन अयोग्यता या हीन भावना और प्रारम्भ में ही बुराइयों का शिकार होकर एक अंधेरे रास्ते पर चल पड़े है ।
समझ नहीं आता क्या होगा मेरे देश का ? क्या इसी सब को देखने के लिए लाखों लोगों ने क़ुरबानी दिया था ?
मन बेचैन है । क्या कोई बदलाव आएगा ? क्या कोई रास्ता निकलेगा ? क्या कोई विकल्प बनेगा ? 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

बड़े भाई
हां छोटे भाई
ये क्या कर रहे हो ? काम की बाते और विकास की बाते ?
क्या छोटे क्या ये ठीक नहीं
अरे क्या गजब कर रहे हो लोग गाँव घर के बाहर और अन्दर झांक कर देख रहे है और पिचले चुनाव के वादों को भी याद कर रहे है | हम दोनों कही के नहीं रहेंगे | क्या जवाब देंगे ?
तब क्या करें भाई ?
ये फालतू की बातें छोड़ो और कुछ और सोचो जिससे लोग गाँव और पड़ोस की सड़क ,नाली ,पानी ,सफाई ,नौकरी ,महंगाई ,देश के जवानों की हत्या १५ लाख ,काला  धन , नोट्बंदी सब भूल जाये | न आप का कुछ याद रहे और न मेरा |
बही तुमने तो चिंता में डाल दिया | ये तो जनता हम दोनों को सबक सिखा देगी और कोई विकल्प ढूढ़ लेगी |
कही ऐसा न हो की बिना पैसा खर्च करने वाले निर्दलीय इम्नादार लोगो को वोट देना सीखा जाये और हम लोगो की राजशाही ख़त्म हो जाये |
हां भाई बहुत बुरा हो जायेगा |
फिर
फिर क्या
वही पुँराना शुरू करते है | जातियों में जाती और गोत्र के गौरव का भाव जगाते है |
धर्म को धर्म का डर दिखाते है | धर्मस्थलो का सवाल उठाते है | धर्म की घृणा बांटते है |
हो गया काम
लेकिन ये हथकंडे तो जनता जानती है ,कही नहीं फंसी जाल में तो फेल हो जायेगा फार्मूला
तो नया शुरू करते है
कुछ नए शब्दों निकालते है की मजबूरी हो जाये लोग उसी के इर्द गिर्द चर्चा करने को |
अच्छा क्या ?
गदहा
आतंकवादी
चोर
गुंडा
जितनी गन्दी से गन्दी बात हो सके नहीं तो भद्दी भद्दी गलिया देने लगेंगे हम दोनों जोर जोर से दोनों एक दूसरे को
और इतना शोर करेंगे और करते ही रहेंगे की जनता बस तमाशबीन हो जाये
बस
इसी में वोट का टाइम निकल जायेगा
अच्छे लोग भी इस शोर में खो जायेंगे
और हम लोगो को गलियों की पसंद और नापसंद में एक बार और जनता को लामबंद करने में कामयाब हो जायेंगे ,
हम दोनों में से ही कोई जीतेगा |
हाथ मिलाओ
हां हां हां हां हां हां हां
जनता क्या हमसे ज्यादा दिमाग रखती है
जनता कही की
अरे पूरा पांच साल बचा है ,अपराध ,नाली ,पानी सड़क ,बिजली रोजगार विकास की चर्चा के लिए ,देश की सुरक्षा ,जवानों की हत्या ,आतंकवाद ,काला धन ,नोट ,रोजगार इत्यादि
कम से कम चुनाव में तो ये बाते जनता को भूल ही जाना चाहिए
बड़े बतमीज है ये जनता के लोग की एक डेढ़ महीना ये सब भूल कर केवल हम लोगो के जुमलो और झटको को सुनना चाहिए
चुनाव ख़त्म हो जाये तो फिर अपनी बैठक और चाय की दुकान और काफी हाउस में बैठ कर ,चौपाल पर खूब चर्चा करना इन  मुद्दों की और हमें खूब गालियाँ दे देना ,
वहा सुन ही कौन रहा है | तुम ही बोल रहे हो और तुम ही सुन रहे हो
सा ;;; चुनाव में याद करने लगते है | ये भी कोई तरीका है
जहा सी तमीज नहीं है इन कीड़ो मकोडो में
जाने दो भाई नाराज मत हो | अभी तो गधो को बाप बनाने का वक्त है \
एक महीना बना लो फिर इन गधो पर राज करो
अच्छा पैग बनाओ
इस नए झकास आइडिया पर ; चियर्स .
किसी ने हमें मिलते देखा तो नहीं
या बात करते सुना तो नहीं
तो तय रहा
यहाँ से निकलते ही एक दूसरे को गन्दी से गन्दी गलिया देनी है ,बिना संकोच ,बिना लिहाज
हां हां हां हां हां हा
लोकतंत्र की जय .भीडतंत्र जिंदाबाद |
इति कथा सम्पन्नम |