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शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

हम अपना वोट आप को नहीं देंगे क्योकि आप हमारे धर्म या हमारी जाति के नहीं हो ।

आप शिक्षित हो ,ज्ञानी हो ,गुणी हो ,कोई गलत काम नहीं करते बल्कि केवल अच्छे काम ही करते हो और अपने गुणों के कारण हमारा ,समाज का और देश का बहुत भला कर सकते हो पर --

वाह रे लोकतंत्र और वाह रे आज़ादी । शायद भगत सिंह फांसी सिखों के लिए चढ़े और आज़ाद तथा बिस्मिल ब्राह्मणों के लिए शहीद हुए ।सुभाष कायस्थो के लिए और गाँधी जी बनियों के लिए लडे ।
क्यों न संविधान में संशोधन कर के सभी को जाति परिवर्तन करने की छूट दे दिया जाये अथवा पूरे देश को दलित घोसित कर दिया जाये ऊँच नीच और जातिवाद ख़त्म हो जायेगा ।नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगाने पर पाबन्दी हो जाये और नाम के आगे अगर लगाना चाहे तो केवल हिंदुस्तानी लिखे ।
क्या इससे समस्या का हल हो सकता है । और एस सी एस टी एक्ट का आतंक भी खत्म हो जायेगा ।
देश के दलित समाज को इस विचार पर आपत्ति तो नहीं है ।
क्या रास्त्रगान गाते हुए बचपन से आजतक कभी आप के दिमाग में आया की उसके शब्द क्या है और अर्थ क्या है और इसी तरह से बहुत से धर्म ग्रंथो को पढ़ते हुए भी |
सर्वोच्च नयायालय में हलफनामा देकर उससे मुकरने वाला और देश भर में दंगे करवाने और लोगो की हत्याओ का जिम्मेदार आज़ादी के इतने दिन बाद आज संवैधानिक पद पर बैठ कर उस पर सवाल उठा रहा है |
मतलब तो आप लोग भी समझ रहे होंगे |
सरकार फेल तो देखो नए नए खेल |
बनारस में 100000000 रूपये पानी में धुल गए क्या ?

बड़ी महंगी धुलाई है उनके सूट और कपड़ो की तरह ।

माँ गंगा कुपित है असत्य और फेंकने से इसलिए आने नहीं दे रही है और आसमान वाला भी उनका ताकत से साथ दे रहा है ।

आत्मचिंतन करिए हुजूर ।

इसीलिए लिख दिया ।
60 साल तक लोगो की उपेक्षा ,अंहकार से चूर और केवल लूट में मस्त रहने वाले ये अफसर अवकाश प्राप्त करते ही फिर आयोगों का अध्यक्ष क्यों बना दिए जाते है ?

60 साल में भी पेट नहीं भरा की फिर नया चारागाह तलाश लिया और उनकी तलाश राजनीतिक तकते पूरी करती है ।

जबकि राजनीतिक लोगो में भी बहुत से बहुत ज्यादा योग्य और ईमानदार लोग भी है जो तथाकथित सिद्धांतो के लिए जीवन दाव पर लगा कर बैठे है ।

पता नहीं राजनीतिक नेताओ में से अपने और अपनों के प्रति हीनता का भाव कब निकलेगा और सिद्ध चोरो के मुकाबले अपनों की ईमानदारी पर विश्वास कब पैदा होगा ?~
किसी विद्वान साथी ने टिप्पणी किया कि यकीन मानिये कि आज के दौर में स्वामी विवेकानंद ,सर्वपल्ली राधाकृष्णन से लेकर ए पी जे कलाम तक अगर किसी राजनीतिक दल के बाकायदा सदस्य बन जाये तो रसीद कटाने के अगले पल ही उनकी औकात चपरासी से भी कम हो जाएगी ।

वो खुद राजनीती में नहीं है फिर इस टिप्पणी का क्या मतलब है ?

इस टिप्पणी पर क्या जवाब दूँ ? क्या सचमुच इतनी गिरावट आ गयी है ? क्या ये सभी दलों पर लागू होता है ?
क्या आप लोगो को याद है की अन्ना ,केजरीवाल और बेदी इत्यादि किसी लोकपाल ,सड़क पर कानून बनाने  ,सब सरकारी काम बेपर्दा करने इत्यादि के लिए लड़ रहे थे और आरएसएस तथा  बीजेपी इनके पीछे खड़ी थी ।

इन सब को सांप सूंघ गया और जनता भी भूल गयी ।

वाह रे देश और हम सब ।
केंद्र के अपराध के रिकार्ड बताते है की दिल्ली में रोज 5 महिलाओ के साथ बलात्कार होते है ।

 पर कैसे मान ले ? देश के टीवी उस पर चर्चा नहीं कर रहे और अखबार छाप नहीं रहे तो कैसे मान ले इसे सच ?

हा नहीं तो ।
अब ये भगवांन की गलती तो नहीं है की आप उनकी चौखट पर वर्षो से माथा रगड़ रहे हो और वो पत्थर ही बने हुए है ।
उन्होंने कब कहा माथा रगड़ने और हाजिरी देने को और ये भी कब कहा की वो पत्थर नहीं बल्कि दिल दिमाग वाले जीव है ।
बाकी भक्तो की मर्जी ।
मैं ये बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकता । किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं कर सकता । तत्काल गूगल को प्रतिबंधित कर दूँ क्या ?

कैसे बर्दाश्त कर लूँ भारत के नागरिक के रूप में ?

देखिये गूगल की हिमाकत ----दो बाते लिख दिया -

1- मोदी जी को दुनिया के 10 टॉप अपराधियों में शामिल कर दिया ।

2- मोदी जी को दुनिया के 10 स्टुपिड प्रधानमंत्रियो में शामिल कर दिया ।

कोई भी भारतीय ये बर्दाश्त कर सकता है क्या ?
मुझे तो आज ही पता चला वर्ना कब का गूगल को @

सच में मैं सच बोल रहा हूँ कोई कटाक्ष नहीं कर रहा हूँ ।
वैसे एक बात तो मानना पड़ेगा की मीडिया में बैठे हुए कुछ संवेदनशील साथियों की वजह से भी बहुत लोगो को न्याय मिल जाता है ।

ऐसा देखा जाता है की जब मीडिया के किसी ऐसे संवेदनशील साथी की निगाह ऐसे लोगो पर पड़ती है जिन्हें कोई सुन नहीं रहा या जिन्हें वो लग नहीं जानते जो न्याय करने और सुनने के लिए है और उनके मुद्दे को वो साथी मीडिया में ठीक से जगह दे देते है तो अक्सर मजबूरन उस पीड़ित को तत्काल का न्याय देना ही पड़ जाता है व्यवस्था को ।

ऐसे संवेदनशील साथियों को मेरा और सभी का सलाम जो सरोकारों से सरोकार रखते है और सीने में दिल को इस चूहा दौड़ के युग में भी मरने नहीं दिया है ।
अब जान लीजिये की नेताओ को खलनायक बनाने का संगठित प्रयास क्यों हो रहा है ।

ऐसी तकते जो लोकतंत्र को खत्म का फसीवादी व्यवस्था कायम करना चाहती है वो धीमे जहर की तरह और हनेश जी को दूध पिलाने वाली रणनीति से यह फिजा बनाने में लगी है की लोकतंत्र बुरा है और लोकतंत्र चलाने वाले बुरे है ताकि जब लोकतंत्र को खत्म करना हो तो जनता मान चुकी हो की लोकतंत्र और नेता बुरे है और उस वक्त विरोध का सामना न करना पड़े ।

जबकि सभी तंत्रो को दुनिया आज़मा कर इस निष्कर्ष पे पहुच चुकी है की लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ है और जनता इसी में अपना फैसला जब चाहे खुद कर लेती है ।

केवल नेता वो जीव है जो जनता के साथ हर सुख दुःख में खड़ा रहता है तथा केवल नेता है की उसकी पिता की लाश भी सामने हो तो भी वह लोगो की सुनता और पहले उनका काम करता है ।

बाकी  लोगो से आप सभी का क्या अनुभव है सोच कर देखिये ।

और भ्रस्ताचार की बात है तो खुद अध्ययन कर के देखिये की कर्मचारी ,ठेकेदार ,,इंजीनियर ,व्यापारी सहित सभी में कितने प्रतिशत राजनैतिक कार्यकर्ता क्या और कितने सम्पन्न हुए और उसके मुकाबले बाकी लोगो की क्या स्थिति है ।

फिर अपने दिन पर हाथ रख कर खुद से पूछिए और सोचिये इस बड़ी साजिश के बारे में ।
नेताओ से इतनी नफरत होती तो नोप वाले बटन सैकड़ा तो छू लेते पर अफसोस अभी तक वो तकते अपना काम कर नहीं पाई ।

अब मेरी पोस्ट पढ़ कर समग्रता से सोच कर देखिएगा की क्या मैंने गलत लिखा है ?
दूसरा --

लगातार कहा जाता है की संसद में 168 अपराधी है ।
तो दोस्तों आप के लिए बिजली पानी या अन्य लड़ाइयाँ लड़ते हुए कौन पिटता है और कौन जेल जाता है ।

एक प्रस्ताव हो जाये की देश में कोई धरना प्रदर्शन और आन्दोलन नहीं होगा या कानून में व्यवस्था हो जाये की आन्दोलन के मुकदमे आई पी सी में नहीं लिखे जायेंगे क्योकि आई पी सी में आप अपराधी हो ही जायेंगे ।

यदि इन मुकदमो में ब्रैकिट में आन्दोलन लिखा जाता या कोई और कानून होता तो आन्दोलनकारी और छात्र नेता अपराधी नहीं कहलाते ।

और अपराधियों को तो आप पहचानते है की कौन कौन है ।

या आप ने इतनी बड़ी तादात में अपराधियों को चुन दिया या फिर आप के वोट को और चयन को अपराधी बता कर आप सब को अपराधी बताया जा रहा है ।

बिचार जरूर करियेगा । या सरकार को कानून को बदलने को कहिये की आन्दोलनकारियो के लिए अलग कानून बने ।

समझ गए न ।
कितने भी जवान शहीद हो जाये हम जवाब नहीं देंगे बल्कि बातचीत ,बिरयानी और भेट का आदान प्रदान जारी रहेगा ।

जवाब देंगे जब हमारा जनता की अदालत में इम्तहान होना होगा या शरीफ जी का फ़ौज की अदालत में ।

अभी नहीं समझ में आएगी मेरी बात !
जापान में सुनामी आई लाइट तो क्या बहुत कुछ उजड़ गया पर १ - वहा कोई छाती पर हाथ मार कर दहाड़ मार कर रोता नहीं दिखा ,२ - वहा कोई बुराई करता नहीं दिखा -३ - वहा के दुकानदारो और रेस्टोरेंट वालो ने कीमतें कम कर दिया -४- वहा लोग खुद पानी नहीं होने पर कम खर्च कर एक दूसरे की मदद करते दिखलाई पड़े -५- वहा लोग सरकार या व्यवस्था को कोसने के स्थान पर जो खुद कर सकते थे देश के लिए वो कर रहे थे -६- वहा मीडिया न तो बुराई कर रहा था ,न किसी को कोस रहा था न कोई अप्रिय दृश्य दिखा रहा था -७ - वहा सिस्टम फेल होने पर लोग पैदल या साईकिल पर चल रहे थे और एक दूसरे को सहारा दे रहे थे ,जिनकी गाड़ियाँ ठीक थी वो लोगो को उनके स्थानों पर पहुंचा रहे थे -8- दुकानों में लाइट चली गयी तो लोग सामान लेकर भागने के स्थान पर सामान वही छोड़ कर बाहर आ गए और फिर लाइन में लग गए -9-परमाणु संयत्र पर बीस लोग रुक गए बाकी सबको भेज कर ये जानते हुए की वे नहीं बचेंगे पर दिमाग में ये था की वे शायद देश को और लोगो को बचा लेंगे -१०- वहा की व्यवस्था लोगो की मदद में अपनी किसी नयी कोठी की जुगाड़ नहीं देखा रही थी। और जापान फिर खड़ा हो गया और पता नहीं कितनी बार बर्बाद हुआ और खड़ा हुआ । हम टीवी पर और देशो में भी तबाही आते और बिजली जाते देखते है वो भी जापान जैसा ही व्यव्हार करते है । ये सभी देश महान कहलाते है । कोई देश नहीं वहा की जनता और उसका चरित्र ,व्यव्हार और कार्य महान होता है । जरा सोचिये हम क्या करते है ???? क्या हम केवल भारत के निवासी है जैसे कोई किसी सराय या होटल का निवासी होता है या हम भारत के सचमुच नागरिक भी है । क्या हम सब दिल पर हाथ रख कर सोच सकते है और फैसला कर सकते है ?/ जरा सोचिये जरूर ???????????? ????????????????????/
# कितने लोगो को याद है की जिस दिन पिछले लोकसभा का परिणाम घोसित हो रहा था और मैं भाग नही बल्कि लगातार 13 घण्टे तक मुकाबला करता रहा उस मैंने लाइव कार्यक्रम में टीवी पर क्या कहा था ?

याद दिला देता हूँ ----

1- ये राजनीती शास्त्र के विद्यार्थी के रूप में देश को बता रहा हूँ न की किसी दल के नेता के रूप में कि अगर अहंकार अहमदाबाद से दिल्ली आ रहा है तो --देश अब तक का असफलतं और अयोग्यतम प्रधानंमंत्री देखने जा रहा है ।

2- ये सरकार महंगाई कम नहीं कर पायेगी बल्कि बढ़ेगी क्योकि सारे मुनाफाखोर , जमाखोर और मिलावटखोर इनके कार्यकर्ता है और शाखा में जाते है तो सरकार उन पर लगाम नहीं लगा पायेगी बल्कि उनका फायदा देखेगी ---
इनके सामने दूसरी दिक्कत ये होगी की ये जिन लोगो ने इनके चुनाव पर हजारो करोड़ खर्च किया उनका हित देखे या जिस जनता ने वोट दिया उनका ?

3-- विदेश नीति इनके लिए अज्ञानता की चीज है क्योकि इनकी सोच वैसी नहीं है । ये तो हजारो साल पहले की सोचते रहते है जबकि जरूरत काफी आगे देखने की है ।

जिन्होंने सुना हो वो क्या कहते है आज और जिन्होंने नहीं सुना वो आज इन बातो पर क्या कहेंगे ।

मैं किसी पर व्यक्तिगत हमला नहीं कर रहा हूँ बस यूँ ही उस दिन की याद दिला रहा हूँ ।
यूँ ही ।
# Indian politics
दाल से लेकर प्याज आलू सब कई गुना महंगा हो गया ( एक महीने में महंगाई कम करने वालो के राज में ),, दुनिया से कच्चा तेल आधी से कम कीमत पर आ रहा है और मनमोहन सिंह के ज़माने से महंगा बिक रहा है ( पेट्रोल 40 से कम पर बिकने की बात करने वालो की सरकार में )डॉलर ने मोदी जी की उम्र पार कर लिया है ( कुछ ऐसा ही शक किया था इन्होंने सरकार बनाने से पहले ) सीमा से रोज शहीदों की लाशे आ रही है ( एक सर के बदले 10 लाने की बात करने वालो के समय में ) ।

आज के लिए काफी है ?
मैं राम और कृष्ण को अवतार और काव्य पुरुष दोनों मानता रहा हूँ और मानता रहा हूँ की वो दोनों सबके है और कण कण में है ।

पर संघ और बीजेपी ने बताया की वो केवल उनके है और कुछ वर्ग मीटर जमीन तक सीमित है ।

तो

कुछ जातियां बता रही है की वो तो केवल उनकी जाति के है । खबरदार जो किसी ने अपना कहा ।

बहुत भ्रम फ़ैल गया भाई । इस पर भी या तो कोई आयोग बने या फिर उन्हें ही दे दिया जाये उनका पेटेंट कर के ।

क्या विचार है ?????
जिस दिन मोदी ने संसद की सीढ़ियों पर सर झुकाया था मैंने कहा था की ये जिन के सामने सर झुकाते रहे जो उनके साथ किया वही संसद के साथ करेंगे ।
भक्त से लेकर मीडिया भक्त तक अलाप रहे है की जो कभी नहीं हुआ वो हो गया एक समझौते में ।

या तो नए है या अज्ञानी नादान है ।

लालड़ेंगा और लोंगवाल शब्द सुना ही नहीं होगा ।ऐसे कई समझौते इतिहास में हुए है और उन लोगो से जिनसे संभव नहीं दीखता था और वहां जहा जीवन दूभर था ।

सोचा दुन्नो का थोड़ा ज्ञान बढ़ा ही दे ।

हो सके की भोंपू बंद हो जाये । पर संघी भोंपू तो बस एक सुर में लगातार बजना जानता है जब तक नागपुर से ट्रैक न बदला जाये ।
समाज का असली चरित्र ----------

आप के बहुत ख़ास अपनी जाति के सम्मलेन या किसी आयोजन में लाखो खर्च कर देते है ।

किसी धार्मिक आयोजन या स्थल के लिए 25 लाख से करोडो तक दे देते है ।

पर ---आप के लिए और आप की तकलीफ के लिए वो गरीब बन जाते है या खुद परेशानी में पड़ जाते है ।

सड़क पर कोई इंसान मर रहा हो तो बगल से निकल जाते है पर जाती धर्म या गाय सुवर के लिए मारने मरने पर उतारू हो जाते है ।

पार्टी में लाखो की दारु बहा देते है और लाखो का खाना फेंक देते पर प्यासे को एक बोतल पानी देने के बजाय दुत्कार देते है और भूखे को भगा देते है ।
धर्म स्थल पर केवल फूल चढाने पर लाखो खर्च कर देते है पर मंदिर के बाहर हाथ फैलाये खड़े लोगो को अपशब्द कहते है ।

रेस्टोरेन्ट में वेटर को सैकड़ो टिप देते है पर मोची से चार आने के लिए लड़ते है ।

क्या क्या लिखूं ? पोथी लिखना पड़ेगा ।

ऐसी ही कुछ बाते जानकारी में आई और कुछ बातो से प्रभावित हुआ और संबंधो का मोल इसी कसौटी पर जाना तो लिख दिया ।

दोस्तियां झूठ और फरेब का पुलंदा है बस अभिनय देखो और अभिनय करो ।
पता नहीं भारतीय राजनीती का क्या दुर्भाग्य है की भारी जन समर्थन प्राप्त हर नायक और बड़ा बनने या युगांतकारी परिवर्तन करने का अवसर खो देता है अल्प दृष्टि और छोटे सोच के लोगों के चक्कर में ।

पता नहीं जनता के साथ ये छल कब तक होता रहेगा और कार्यकर्ताओ के साथ भी ।

मंगलवार, 2 जून 2015

कभी नहीं भुलाई जा सकती है ये वाणी ------------ कबीर जिन्दा खड़े है अपने क्रान्तिकारी विचारो के साथ और उस युग की असंभव वैचारिक और सामाजिक क्रांति के साथ हमारे अन्तः में चाहे हम अभी स्वीकारे या कल स्वीकारे पर आइये आज उस फ़कीर को सर झुका कर सलाम करे ----------------- बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंथी को छाया नहीं फल लगत अति दूर । कांकर पाथर जोर के मस्जिद लयी बनाय ता चढ़ी मुल्ला बांग दे बहिरा हुआ खुदाय । माला फेरत जग फिरा फिरा न मन का फेर कर का मनका डार दे मन का मनका फेर । ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय औरहु को शीतल करे आपहु शीतल होय । माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोय एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूंगी तोय । गुरु गोविन्द दोवू खड़े काके लागू पाय बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो बताय। साई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय मैं भी भूखा न रहूँ साधू न भूखा जाए ।


रविवार, 31 मई 2015

एक लघु कथा (सच्ची घटना का कहानीकरण )----- :;;काम हो गया ;; बहुत परेशान थे सब ।कितनी बड़ी विपदा आ गयी थी ।पडोसी था की झुकने को तैयार ही नहीं था ।वकील साहब चाहे तो कोई तो रास्ता जरूर निकल जायेगा । वो एक बुजुर्ग था नाम रामू ही रख लेते है और उसके साथ उसका दामाद हरी सिंह ,विवाहिरा बेटी रामप्यारी और दूसरी बेटी जिसकी शादी अभी नहीं हुयी थी रामबेटी भी आई थी कचाहरी में पहली बार ये सोच कर की बाबा का भी काम हो जायेगा और शहर में चाट पकौडी भी खा लेंगे ,सिनेमा भी देख लेंगे और त्यौहार आने वाला है तो उसकी खरीददारी भी बाबा करवा देंगे । पर सिनेमा और बाजार तथा त्यौहार से बड़ा मुद्दा वकील साहब से जिरह में था की पडोसी अपने को पता नहीं क्या समझता है सा:::ल::; उसकी नाक कैसे नीची हो । घंटो हो गए वकील साहब जो राय देते उसे रामू काट देता और रामू जो कहता उसमे वकील साहब कानून का छेद बता देते । अचानक रामू की आँखे चमक उठी अपनी कुँवारी बेटी को देख कर और वो बोला की रामबेटी तू चाहे तो पडोसी से जन्म जन्म का बदला पूरा हो जतेगा ।रामबेटी बहुत खुश की उसकी भी कोई वकत है वर्ना तो बाबा कोसते ही रहते है की नाशपीटी ताड़ जैसी होती जा रही है और ब्याह नहीं हो पा रहा । घर में पडी रहती है और बदसूरत नहीं होती तो मांग लेता या भगा ही ले जाता पर मुसीबत घर से चली गयी होती । पूरा गाँव बाते बनाता है पता नहीं क्या क्या ।मैं कचहरी के और खेत के काम से चला जाता हूँ तो पता नहीं कहा कहा जाती है और क्या क्या करती है की पता नहीं क्या क्या सुनने को मिलता है करमजली कही की पैदा होते ही क्यों नहीं मर गयी । वो शादी को तैयार था उसके इतना खेत भी है बस थोड़ी उम्र ही तो ज्यादा थी पर नाटक कर दिया और शादी तय नहीं हो पाई ।देख रामप्यारी ने भी तो बड़ी उम्र वाले से शादी कर ली आज क्या तकलीफ है । अचांनक वो जाग गयी क्या क्या याद कर लिया उसने । अरे बाबा ने उसकी वकत भी समझा । बाबा बुरे नहीं है थोड़े परेशांन रहते है इसलिए बक देते है । क्यों रामबेटी का कह रही है कुछ कहूँ तो मानेगी परिवार की इज्जत के लिए और रामप्यारी तुझे भी साथ देना होगा । हां बाबा जो कहो परिवार की इज्जत के लिए जान भी दे दूंगीं । दोनों एक साथ बोल पड़ी ।रामू धीरे से वकील साहब की तरफ देख कर फुसफुसाया वकील साहब अगर मेरी बेटी छत पर सो रही हो और पडोसी गलत कर दे तब तो बात बन जाएगी । उसकी इज्जत भी जाएगी और जेल भी पक्की हो जाएगी न ।कोई पास भी नहीं बैठायेगा गाँव में तब देखूंगा की कैसे अकड़ता है । वकील भौचक्का समझ नहीं पाया इसलिए बस उसकी तरफ निहारता रहा ।सन्नाटाछा गया था कहा ।सब चुप ।वकील ने इंतजार किया की रामू कुछ और बोले और रामू मंद मंद विजयी मुस्कान के साथ कभी हरी सिंह को देखता तो कभी बेतियो को तो कभी वकील साहब को और सभी को देख रहा था तथा शायद महसूस करना चाहता था की वकील से भी ज्यादा तेज चले उसके दिमाग का क्या असर है सब पर । वकील का धैर्य जवाब दे गया तो झुंझला गया की रामू की क्या पहेली बुझा रहे साफ साफ़ क्यों नहीं बोलते की क्या कह रहे हो ।पडोसी क्यों तुम्हारे छत पर आएगा और क्यों ऐसा करेगा इज्जतदार आदमी है । कोई और बात करो । रामू फूटा मान लो वकील साहब रामबेटी के साथ मेरा दामाद हरी सिंह ही कांड कर दे और फिर रपट करवा दे की पडोसी ने मौका देख कर मेरी कुवारी बेटी से बलात्कार किया तो तुम्हे क्या दिक्कत है । तुम्हे फीस पूरी मिलेगी बस सा ** को जेल भिजवा दो और झुका दो ।क्यों रामप्यारी तोय तो दिक्कत ना ने । का फरक पडेगो एक बार में । परिवार की इज्जत की बात है । वहां सन्नाटा फ़ैल गया । वकील चुप और आँखे फटी रामबेटी की सांस रुक गयी हरी सिंह मुस्करा कर सहमती दे रहा था और रामप्यारी समझ ही नहीं पा रही थी की क्या कहे बस अपने पति की तरफ देखे जा रही थी और याद कर रही थी की कितनी बार साली से मजाक की आड़ में इसने रामप्यारी से क्या क्या हरकत की थी ।और हरी सिंह मानो किला जीत चूका हो । वकील शर्मा जी ने थूक निगला और किसी तरह अपनी कमाई का हिसाब लगाते हुए बोले कि रामू ये फैसला तो तुम्हारे परिवार को करना है पर केस तो मजबूत बनेगा और दुनिया की कोई ताकत उसे जेल जाने से नहीं रोक पायेगी ये गारंटी मेरी है ।अब इतने साल कचहरी में घास तो नहीं छीला है ।तुम लोग आपस में तय कर बता देना । कब किस रात को करना है सब बता देना क्योकि सुबह होते ही केस लिखाना पड़ेगा और दरोगा जी को भी सेट करना होगा तथा जिला अस्पताल में भी खर्च होगा मेडिकल में ताकि रपट पक्की बने फिर समझो गिरफ़्तारी और जेल क्या सजा भी पक्की । रामू ने रामबेटी की तरफ पहली बार कातर निगाह से देखा और पहली बार शायद आवाज में शहद घोल कर बोला बेटी अब घर की इज्जत तेरे हाथ में है ।रामप्यारी बोली बाबा मेरा ब्याह कैसे होगा जब बदनामी हो जाएगी तो ।पहले ही काली होने से नहीं हो रहा ।मानो रामू सब सोच कर बैठा था ।बोला की यहाँ शहर में एक चपरासी है बिरादरी का है उसकी बीबी मर गयी जहर खाकर और दो बच्चे छोड़ गयी है वो शादी कर लेगा और कुछ पैसे भी मेरे पास जमा कर देगा अच्छे बुरे वक्त के लिए । सन्नाटा ही सन्नाटा था और वकील साहब को खबर देने की कह कर बिना सिनेमा देखे बिना चाट खाए और बिना कुछ खरीदे रामू के साथ सब गाँव की तरफ चल पड़े । चार दिन बाद अख़बार में छपा की रामू की बेटी रामवेटी से छत पर बलात्कार और मेडिकल में सही भी पाया गया । पिता से बड़ी उम्र का तथाकथित कुकर्मी जो वहुत सभ्य बनता था गिरफ्तार कर जेल भेजा गया । रामू खुश वकील खुश हरी सिंह खुश पर रामप्यारी और रामबेटी दिखलाई नहीं पड़ी तब से की कौन खुश है ।रामु ने भी गाँव छोड़ दिया सबके साथ कुछ दिन के लिए की इज्जत को भी खतरा और जान को भी इसलिए बच्चो की सुरक्षा का इंतजाम कर ही घर लौटेगा फिर जान रहे या जाये पर मुकदमा पूरा अंत तक लेड़गा । पडोसी के परिवार में अधेरा हो गया और शर्म से उसकी बेटी ने आत्महत्या कर लिया ।रामू मूछो पर ताव दे कर घूम रहा है की जैसी करनी वैसी भरनी ।बाकी जांच जब आयेगी तब किसी को न्याय मिलेगा पर अभी तो रामू जीत गया । जो हुआ सो हुआ पर काम हो गया ।


समय भी क्या चीज है न्याय भी करता है और अति के साथ अन्याय भी । पता नहीं किसके साथ कब न्याय कर दे और कब किसी के अन्याय के लिए उसे रसातल में पहुंचा दे ।
इतिहास ने सभी को समान भाव से सिखाया है और सुरक्षित रहकर दस्तावेजो में ये मौका भी सुरक्षित रखा है की सभी उससे सबक ले । पर
देखते हैं कौन सा इतिहास कब उड़ान ले लेता है और कौन सा द्वारका में पैबस्त हो जाता है । इंतजार मुझे भी है और इन्तजार और लोगो को भी करना ही चाहिए क्योकि इतिहास तो बनना भी है और बदलना भी ।
इतिहास हो या समय कभी एक जैसा न रहा है और न रहेगा न मेरा न तेरा और न उसका ।
चलो आँखे बंद कर चिंतन करे की इतिहास की करवट अबकी कैसी होगी और क्या होगी ।
अभी इतिहासबोध को छोड़ ही देता हूँ ।उसका बोध भी करवाऊंगा जब बोधित हो जाऊंगा मैं इतिहास के अगले कदम से ।